बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 31 अक्टूबर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर प्रतिबंध लगाने को लेकर कांग्रेस के भीतर एक बार फिर मतभिन्नता खुलकर सामने आ गई है।
सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा दिए गए बयान के बाद पार्टी के ही वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम के बेटे और सांसद कार्ति चिदंबरम ने साफ शब्दों में कहा है कि “आरएसएस पर प्रतिबंध लगाना न तो व्यावहारिक है और न ही आज के कानूनी माहौल में संभव।”
कार्ति चिदंबरम ने कहा,
“मैं भाजपा और आरएसएस की विचारधारा से सहमत नहीं हूं, लेकिन यह समझना जरूरी है कि जिस संगठन के सदस्य खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, उस पर प्रतिबंध लगाने की बात कहना वास्तविकता से दूर है। एक समय आरएसएस पर बैन जरूर लगा था, लेकिन इतिहास गवाह है कि वह ज्यादा दिन टिक नहीं पाया।”
उन्होंने आगे कहा कि किसी भी संगठन को ऐसी गतिविधियों से दूर रहना चाहिए, जिससे देश की एकता और अखंडता को खतरा हो, लेकिन केवल राजनीतिक मतभेदों के कारण किसी संस्था पर रोक लगाने की बात लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
खरगे का विवादित बयान और बेटे प्रियंक की ‘कड़ी मांग
’बता दें कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सरदार पटेल की जयंती पर एक बयान देते हुए कहा था कि “देश में कानून व्यवस्था से जुड़ी ज्यादातर समस्याओं के लिए आरएसएस जिम्मेदार है, इसलिए इस संगठन पर एक बार फिर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।”हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह उनका “व्यक्तिगत विचार” है।
इससे पहले उनके बेटे और कर्नाटक के मंत्री प्रियंक खरगे ने मुख्यमंत्री सिद्धरमैया से आग्रह किया था कि राज्य के सरकारी कर्मचारी व अधिकारी आरएसएस या उससे जुड़े संगठनों के कार्यक्रमों में भाग न लें।
यानी यह साफ दिख रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व के एक हिस्से में आरएसएस के प्रति कठोर रुख अपनाने की प्रवृत्ति बनी हुई है — लेकिन पार्टी के भीतर सभी इस बात से सहमत नहीं।
राजनीतिक विश्लेषकों की दो टूक राय:
“कांग्रेस को अब आरएसएस-विरोध छोड़ना चाहिए”
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस का बार-बार आरएसएस को निशाना बनाना उसकी “रणनीतिक भूल” साबित हो रहा है।
वरिष्ठ विश्लेषक मानते हैं कि, “खरगे साहब को पहले अपनी पार्टी में राय एक करनी चाहिए थी। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता आरएसएस पर प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हैं। इस तरह के बयान जनता में यह संदेश देते हैं कि कांग्रेस हिंदू समाज से दूरी बना रही है।”
एक अन्य विश्लेषक ने तीखा तंज कसते हुए कहा —
“कांग्रेस को अब यह समझ लेना चाहिए कि आरएसएस सिर्फ एक संगठन नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुका है। बार-बार इसे निशाना बनाकर कांग्रेस खुद अपने जनाधार को कमजोर कर रही है। आरएसएस अब हिंदू समाज का आत्मा बन चुका है, और इस आत्मा से टकराने की कीमत कांग्रेस हर चुनाव में चुका रही है।”
निष्कर्ष:
क्या कांग्रेस फिर दोहराएगी वही भूल?
कार्ति चिदंबरम का बयान स्पष्ट संकेत है कि कांग्रेस में अब भी विचारधारा और रणनीति को लेकर एकमतता नहीं है। जहां एक ओर पार्टी का शीर्ष नेतृत्व आरएसएस-विरोधी बयानबाजी से अपनी “सेक्युलर” पहचान को मजबूत करना चाहता है, वहीं कुछ नेता इसे राजनैतिक आत्मघाती कदम मान रहे हैं।कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह जनता की नब्ज समझेगी, या फिर वही पुरानी राह पर चलते हुए अपने ही नेताओं के बयानों से उलझती रहेगी?
