आर्थिक यथार्थ की राह, कूटनीतिक संतुलन की तलाश: भारत से 50,000 टन चावल खरीदेगा बांग्लादेश

बी के झा

NSK

ढाका/नई दिल्ली, 24 दिसंबर

भारत–बांग्लादेश संबंधों में बीते महीनों से चली आ रही तल्खी के बीच ढाका से आया एक अहम संकेत यह बताता है कि अंतरिम सरकार व्यवहारिक कूटनीति और आर्थिक तर्क के रास्ते रिश्तों को पटरी पर लाने की कोशिश कर रही है। बांग्लादेश सरकार ने भारत से 50,000 टन चावल खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसे केवल एक व्यापारिक फैसला नहीं, बल्कि दोनों देशों के रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने की एक सावधानीपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।

यूनुस सरकार का संदेश: राजनीति अलग, अर्थव्यवस्था अलग बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के वित्त सलाहकार सालेहुद्दीन अहमद ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस भारत के साथ तनावपूर्ण संबंधों को सहज बनाने के लिए प्रयासरत हैं।उन्होंने कहा—“हम आर्थिक हितों को राजनीतिक बयानबाजी से अलग रखते हैं। व्यापारिक फैसले लागत और लाभ के आधार पर होते हैं, न कि भावनाओं या दबावों पर।”

अहमद के अनुसार, भारत से चावल खरीदना आर्थिक रूप से अधिक फायदेमंद है। उन्होंने तुलना करते हुए बताया कि वियतनाम से चावल आयात करने पर प्रति किलो लगभग 10 टका अधिक खर्च आता है। ऐसे में भारत से आयात करना बांग्लादेश के लिए व्यावहारिक विकल्प है।क्या रिश्ते सचमुच सबसे निचले स्तर पर हैं?

यह बयान ऐसे समय आया है जब कई कूटनीतिक विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि 1971 के बाद पहली बार भारत–बांग्लादेश संबंध सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं।दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजनयिकों को तलब किया ढाका और नई दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन हुए मीडिया और राजनीतिक मंचों पर तीखी बयानबाजी देखने को मिली हालांकि सालेहुद्दीन अहमद इस आकलन से पूरी तरह सहमत नहीं दिखे।

उन्होंने कहा—“स्थिति उतनी खराब नहीं है, जितनी दिखाई जाती है। कुछ बयान और घटनाएं होती हैं, जिन्हें पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता।”

राजनीतिक विश्लेषण:

मजबूरी की दोस्ती या समझदारी का कदम?राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला मजबूरी और समझदारी—दोनों का मिश्रण है।एक वरिष्ठ रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ के अनुसार—“बांग्लादेश जानता है कि भारत को नजरअंदाज कर क्षेत्रीय स्थिरता संभव नहीं। चीन या अन्य विकल्प तात्कालिक हो सकते हैं, लेकिन भौगोलिक और आर्थिक सच्चाई भारत से जुड़ी है।

”विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यूनुस सरकार घरेलू अस्थिरता और आर्थिक दबाव के बीच पड़ोस में शांति चाहती है।

शिक्षाविदों की राय:

आर्थिक कूटनीति की वापसी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शिक्षाविद इसे ‘इकोनॉमिक डिप्लोमेसी’ की वापसी मानते हैं।ढाका विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के मुताबिक—“राजनीतिक असहमति के बावजूद व्यापारिक रिश्तों को जीवित रखना परिपक्व लोकतंत्रों की पहचान है। बांग्लादेश उसी दिशा में बढ़ता दिख रहा है।”

भारत का रुख:

संयम और प्रतीक्षा भारत के विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि नई दिल्ली इस फैसले को सकारात्मक संकेत के रूप में देख रही है।सूत्रों के अनुसार—“भारत हमेशा से पड़ोस पहले की नीति पर कायम रहा है। यदि बांग्लादेश व्यावहारिक और सहयोगपूर्ण रुख अपनाता है, तो भारत भी संवाद और सहयोग के लिए तैयार है।

”हालांकि मंत्रालय यह भी स्पष्ट करता है कि भारत किसी भी तरह की भारत-विरोधी बयानबाजी या हिंसक घटनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया

बांग्लादेश के विपक्षी दलों ने इस फैसले पर मिश्रित प्रतिक्रिया दी है।कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है कि—“भारत से चावल खरीदना आर्थिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि राष्ट्रीय सम्मान और संप्रभुता से समझौता न हो।”वहीं भारत में विपक्षी दलों ने सरकार से आग्रह किया है कि—“

बांग्लादेश के साथ संवाद में सख्ती और संवेदनशीलता—दोनों का संतुलन बनाए रखा जाए।”बाहरी ताकतों पर चेतावनी सालेह उद्दीन अहमद ने साफ कहा कि बांग्लादेश किसी भी तरह की कड़वाहट नहीं चाहता।

उन्होंने चेताया—“यदि कोई बाहरी तत्व भारत और बांग्लादेश के बीच तनाव भड़काने की कोशिश करता है, तो वह दोनों देशों के हितों के खिलाफ होगा।”उनका यह बयान उन आशंकाओं की ओर इशारा करता है, जिनमें क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

निष्कर्ष:

चावल से आगे की कूटनीति भारत से 50,000 टन चावल की खरीद एक साधारण व्यापारिक सौदा नहीं है। यह संकेत है कि ढाका फिलहाल टकराव नहीं, तालमेल चाहता है।हालांकि यह देखना अभी बाकी है कि—क्या यह कदम दीर्घकालिक रिश्तों में बदलेगा?या फिर यह केवल आर्थिक जरूरतों तक सीमित रहेगा?

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि राजनीतिक शोर के बीच आर्थिक समझदारी ने एक बार फिर दरवाज़ा खटखटाया है—

और गेंद अब दोनों राजधानियों के पाले में है।

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