एनडीए की आंधी में उड़ा महागठबंधन, बिहार में बीजेपी का ‘मेगा उदय’, पहली बार राज्य की नंबर-1 पार्टी बनी भाजपा

बी के झा

पटना, 14 नवंबर

बिहार की राजनीति ने वह दिन देख लिया है, जिसे कई वर्षों से केवल कयासों में सुना जाता था। एनडीए ने न सिर्फ़ जीत दर्ज की, बल्कि ऐसी जीत दर्ज की जिसे राजनीतिक भूचाल कहा जाए तो गलत नहीं होगा।राज्य में एनडीए 200 से अधिक सीटों पर बढ़त बनाए हुए है और इसी के साथ एक ऐतिहासिक परिवर्तन सामने आया है

बीजेपी पहली बार बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।बीजेपी का ऐतिहासिक उदय —

पहली बार नंबर-1 पार्टीइलेक्शन कमिशन के आंकड़ों के अनुसार:बीजेपी – 77 सीटें जीतकर 12 पर आगेजेडीयू – 62 सीटें जीतकर 23 पर आगेआरजेडी – 18 जीत, 7 पर आगेलोजपा (आर) – 15 जीत, 4 पर आगेकांग्रेस – 3 जीत, 3 पर आगेएआईएमआईएम – 5 जीतहम – 4 जीत, 1 पर आगेआरएलएम – 2 जीत, 2 पर आगेसीपीआई(एमएल) – 1 जीत, 1 पर आगेजन सुराज (PK) – शून्ययह वही बिहार है जहां कभी भाजपा तीसरी–चौथी पायदान पर खड़ी होती थी। लेकिन इस बार जनता ने न सिर्फ़ एनडीए को, बल्कि भाजपा को सीधे सत्ता नेतृत्व के केंद्र में खड़ा कर दिया है।

महागठबंधन बुरी तरह धराशायीतेजस्वी यादव की आरजेडी, कांग्रेस, वाम दल—all combined—इस चुनाव में एनडीए की आंधी में उड़ते हुए दिखे।शुरुआती घंटों में जिस बढ़त का सपना महागठबंधन ने देखा था, दोपहर आते-आते वह हवा की तरह गायब हो चुका था।जहां एनडीए का ग्राफ आसमान छू रहा था, वहीं महागठबंधन का ग्राफ ज़मीन में धँसता गया।बड़े चेहरे — कौन चमका, कौन डूबाजीत की सूचीअनंत सिंह (मोकामा) — धमाकेदार जीतभाई वीरेंद्र (मनेर) — जीततेजस्वी यादव (राघोपुर) — जीतडिप्टी सीएम विजय सिन्हा (लखीसराय) — बड़ी जीतपीछे चलने वालेखेसारी लाल यादव (छपरा) — लगातार पीछेभोजपुरी सुपरस्टार की एंट्री को लेकर जो शोर था, वह नतीजों में फीका पड़ता दिखा।इन नतीजों ने साफ कर दिया है कि बिहार में जनता जातीय या सिनेमाई स्टारडम के बजाय स्पष्ट राजनीतिक संदेश के आधार पर मतदान कर चुकी है।

बीजेपी की जीत का मनोवैज्ञानिक असर — सत्ता का केंद्र बदल गयायह चुनाव सिर्फ़ सीटों का खेल नहीं था।यह चुनाव था:नेतृत्व की विश्वसनीयता का‌ विकास बनाम वंशवाद का जंगलराज बनाम शासन स्थिरता का और सबसे अधिक—

बिहार में भाजपा के दीर्घकालिक उदय का एनडीए के भीतर भी सत्ता संतुलन पूरी तरह बदल चुका है।पहली बार ऐसा हुआ है कि बीजेपी बिना किसी गठबंधन दबाव के बिहार की राजनीति का केंद्रीय स्तंभ बन गई है।जातीय राजनीति पर विकास की जीत इस चुनाव में बिहार की जनता ने कई पुराने मिथक तोड़े हैं।

जहां महागठबंधन ने MY फार्मूले पर भरोसा किया, वहीं एनडीए को मिला वोट जातीय दायरे से ऊपर था।चुनाव नतीजे यह बताते हैं कि:युवा वोटरों ने निर्णायक भूमिका निभाईमहिला वोटरों ने NDA को मजबूत समर्थन दियापहली बार ग्रामीण इलाक़ों में भाजपा को भारी समर्थन मिलायह संकेत है कि बिहार की राजनीति नई दिशा में बढ़ रही है।

राजनीतिक निष्कर्ष — बिहार एक नए अध्याय में प्रवेश कर चुका है

1. बीजेपी पहली बार राज्य की सबसे बड़ी पार्टी

2. एनडीए 200 सीटों के पार बढ़त

3. महागठबंधन का लगभग सफाया

4. भारी चेहरे जीते, कई नामी चेहरे पीछे

5. राज्य की राजनीति की कमान अब भाजपा के हाथ में बिहार की जनता ने वोट के माध्यम से बता दिया है कि यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, राजनीतिक संस्कार और प्राथमिकताओं के पुनर्निर्माण का चुनाव था।

एनडीए की यह आंधी आने वाले वर्षों में बिहार की दिशा और दशा दोनों को गहराई से प्रभावित करेगी—और सत्ता का केंद्र अब निर्णायक रूप से बदल चुका है।

NSK

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