बी के झा
NSK

नई दिल्ली/ इस्लामाबाद, 26 दिसंबर
ऑपरेशन सिंदूर अब केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि पाकिस्तान के सामरिक मानस में स्थायी भय का प्रतीक बन चुका है। भारत द्वारा किए गए सटीक और निर्णायक हवाई हमलों ने न सिर्फ आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया, बल्कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान की उस आत्मछवि को भी तोड़ा, जो वर्षों से “रणनीतिक संतुलन” के भ्रम पर टिकी थी। अब उसी डर की छाया में पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा (LoC) के पास एंटी-ड्रोन सिस्टम की बड़े पैमाने पर तैनाती शुरू कर दी है।
राजनीतिक और रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम रक्षा तैयारियों से ज्यादा मनोवैज्ञानिक असुरक्षा को दर्शाता है।एलओसी पर नई तैनाती: रक्षा या घबराहट?
रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के अग्रिम इलाकों—रावलकोट, कोटली और भीमबर सेक्टर—में कम से कम 30 डेडिकेटेड काउंटर-अनमैन्ड एरियल सिस्टम (C-UAS) तैनात किए हैं। इनमें इलेक्ट्रॉनिक (जैमिंग) और काइनेटिक (हार्ड-किल) सिस्टम का मिश्रण शामिल है, जिनके बारे में दावा है कि वे 10 किलोमीटर तक ड्रोन की पहचान कर सकते हैं।
हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का आकलन अलग है।एक वरिष्ठ रक्षा विश्लेषक के अनुसार,“ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यही चीनी-निर्मित एंटी-ड्रोन सिस्टम प्रभावी साबित नहीं हुए थे। भारत ने जहां चाहा, जैसे चाहा, वैसा प्रहार किया। तकनीक से ज्यादा निर्णायक प्रशिक्षण, इंटेलिजेंस और रणनीति होती है।
”्ऑपरेशन सिंदूर: क्यों नहीं गया डर?अप्रैल में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने मई की शुरुआत में ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। यह कार्रवाई सीमित नहीं, संदेशात्मक थी—PoK से लेकर पाकिस्तान के भीतर तक लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों को निशाना बनाया गया। जवाब में पाकिस्तान ने तुर्की ड्रोन से जम्मू-कश्मीर से गुजरात तक हमले की कोशिश की, जिसे भारत ने नाकाम कर दिया और पलटवार में पाकिस्तानी एयरबेस तबाह कर दिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है,“युद्धविराम के बाद भी पाकिस्तान की गतिविधियां बताती हैं कि वह आश्वस्त नहीं है। एंटी-ड्रोन सिस्टम लगाना दरअसल यह स्वीकारोक्ति है कि भारत की वायु-प्रधान रणनीति से वह अब भी डरा हुआ है।”
‘ऑपरेशन जारी है’:
भारत का स्पष्ट संदेश
भारत ने साफ कर दिया है कि ऑपरेशन सिंदूर खत्म नहीं हुआ, बल्कि यह एक सतत रणनीतिक स्थिति है। पाकिस्तान की ओर से किसी भी उकसावे को ‘एक्ट ऑफ वॉर’ माना जाएगा। यह बयान केवल कूटनीतिक चेतावनी नहीं, बल्कि सैन्य तत्परता का संकेत भी है।
शिक्षाविदों और सामरिक अध्येताओं के अनुसार,“भारत ने अब ‘रिएक्टिव डिटरेंस’ से आगे बढ़कर ‘प्रोएक्टिव डिटरेंस’ की नीति अपना ली है।
हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया:
निर्णायक नीति का समर्थन देश के कई हिंदू संगठनों ने एलओसी पर पाकिस्तान की घबराहट को भारत की नीति की सफलता बताया है। एक संगठन के प्रवक्ता ने कहा,“पहलगाम जैसे हमलों का जवाब अब केवल बयान नहीं, बल्कि कार्रवाई से दिया जा रहा है। यही वजह है कि पाकिस्तान आज अपने ही इलाके में सुरक्षा कवच लगा रहा है।”उनका कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख ही नागरिकों की सुरक्षा की गारंटी है।विपक्ष का सवाल: सतर्कता और संवाद दोनों जरूरी
विपक्षी दलों ने जहां सेना की क्षमता और साहस की सराहना की है, वहीं उन्होंने सीमा पर बढ़ते सैन्यीकरण को लेकर सतर्क रहने की सलाह भी दी है।एक विपक्षी नेता ने कहा,“राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन क्षेत्रीय स्थिरता के लिए कूटनीतिक चैनल खुले रहना भी जरूरी है।
”रक्षा विशेषज्ञों की चेतावनी:
सिस्टम से ज्यादा सोच अहम
रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि एंटी-ड्रोन सिस्टम लगाना पाकिस्तान को सीमित राहत दे सकता है, लेकिन यह रणनीतिक कमजोरी नहीं छुपा सकता।“ड्रोन युद्ध में जीत तकनीक से नहीं, नेटवर्क, सॉफ्टवेयर, इंटेलिजेंस और निर्णय-गति से मिलती है—और फिलहाल इसमें भारत आगे है।”
निष्कर्ष:
डर की दीवारें एलओसी पर लगे एंटी-ड्रोन सिस्टम पाकिस्तान की सुरक्षा का नहीं, बल्कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद पैदा हुए डर का स्मारक हैं। भारत ने यह साफ कर दिया है कि अब आतंकवाद का जवाब सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा।
सवाल यह नहीं कि पाकिस्तान ने कितने सिस्टम लगाए हैं, सवाल यह है कि क्या वह उस डर से उबर पाएगा—
जो भारत की अगली कार्रवाई की आशंका से पैदा हुआ है।
