बी के झा
NSK

पटना/अमौर, 22 नवंबर
बिहार की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प मोड़ देखने को मिल रहा है। AIMIM प्रमुख असदुद्दुदीन ओवैसी, जो अक्सर नीतीश कुमार सरकार और उसकी नीतियों पर तीखे हमले करते नजर आते थे, अब अचानक सहयोग के सुर में नज़र आ रहे हैं। अमौर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने घोषणा की कि वे अपने सभी पांच विधायकों के लिए स्थायी पार्टी कार्यालय खोलेंगे, जहां विधायक सप्ताह में दो दिन जनता से मिलेंगे और अपनी लाइव लोकेशन भी उन्हें भेजेंगे।लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा बयान वह रहा, जिसमें उन्होंने कहा कि—“हम नई बिहार सरकार को बधाई देते हैं। हम उनके साथ सहयोग करने को तैयार हैं, मगर सीमांचल के साथ न्याय होना चाहिए।”यह ‘सहयोग की पेशकश’ राजनीति के गलियारों में कई सवाल छोड़ गई है।
क्या वाकई AIMIM समर्थन देने को तैयार है?
या यह सीमांचल में बढ़ते प्रभाव को मजबूत करने की रणनीति है?
ओवैसी–नीतीश समीकरण: अचानक क्यों नरम पड़े AIMIM प्रमुख?राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ओवैसी का यह रुख महज़ ‘अचानक बदला हुआ दिल’ नहीं, बल्कि सोची-समझी राजनीतिक चाल है। पटना और राजगीर तक सीमित विकास मॉडल पर निशाना साधते हुए ओवैसी ने साफ किया कि सीमांचल की अनदेखी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
विश्लेषक कहते हैं कि:सीमांचल की बढ़ती राजनीतिक जागरूकता,AIMIM का मुस्लिम बहुल इलाकों में स्थिर होता जनाधार,और 2025 के चुनाव में मिली पांच सीटों की मजबूती,—ओवैसी को एक नए आत्मविश्वास से भर रही है। ऐसे माहौल में सहयोग की पेशकश वास्तव में दबाव की राजनीति भी हो सकती है।
विश्लेषकों की राय: ‘यह प्रेम नहीं, शक्ति–संतुलन की राजनीति है
’राजनीतिक विश्लेषक प्रो. आर.के. मिश्रा कहते हैं—“ओवैसी का नीतीश के प्रति अचानक नरम पड़ना वैसा ही है जैसे विपक्ष सत्ता को देखकर अपने तेवर संयत कर ले। यह प्रेम नहीं, सीमांचल में अपनी प्रासंगिकता बढ़ाने की कोशिश है। AIMIM अपने विधायकों को सख्त अनुशासन में रखकर यह संदेश देना चाहती है कि वह ‘डिलीवरी–आधारित’ राजनीति कर सकती है।”
एक अन्य वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक नीलिमा सिंह मानती हैं—“2020 में AIMIM के चार विधायकों का टूटकर RJD में जाना ओवैसी की राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंचा था। 2025 में फिर से पांच सीटें जीतना उनके लिए मनोवैज्ञानिक जीत है। अब वे यह दिखाना चाहते हैं कि इस बार विधायकों पर उनकी ‘पकड़ मजबूत’ है। इसी लिए वे लाइव लोकेशन और नियमित मीटिंग जैसे कदमों की घोषणा कर रहे हैं।”
क्या सीमांचल बन रहा है नया राजनीतिक रणक्षेत्र?
यह बात अब किसी से छिपी नहीं कि सीमांचल में AIMIM लगातार पैठ बना रही है।इस बार जब एनडीए ने सीमांचल में 14 सीटें जीतीं और AIMIM पाँच—तो यह क्षेत्र सत्ता की तरफ से भी नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता।ओवैसी का यह कहना कि—“विकास केवल पटना और राजगीर तक सीमित नहीं रहना चाहिए”—
सीधा संदेश है कि सीमांचल अब सुनने वाला नहीं, बोलने वाला इलाका बन रहा है।उनकी यह शर्त कि “सीमांचल को उसका न्याय मिले तभी समर्थन पर विचार”—दरअसल बिहार की सत्ता पर भविष्य में दबाव बनाने का हथियार है।
समर्थन की राजनीति—या दबाव की रणनीति?
स्थिति साफ है—AIMIM पाँच सीटों के साथ सीमांचल में निर्णायक खिलाड़ी बनना चाहती है।ओवैसी की भाषा सहयोगी जरूर है, पर शर्तें साफ हैं—सीमांचल को प्राथमिकतातेज़ विकासभ्रष्टाचार पर कार्रवाईऔर सत्ता की नीतियों पर AIMIM की भागीदारीयह समर्थन नहीं, सहयोग की कड़ी शर्तों के साथ पेश की गई राजनीतिक साझेदारी है।
निष्कर्ष:
ओवैसी का प्रस्ताव—शह या मात?नीतीश कुमार, जिन्होंने दशकों तक राजनीति को संतुलन की कला से चलाया है, वे ओवैसी के इस प्रस्ताव को कैसे लेते हैं—यह देखने वाली बात होगी।
हालाँकि राजनीतिक विश्लेषकों की राय साफ है—“ओवैसी का ‘नीतीश प्रेम’ राजनीतिक नहीं, रणनीतिक है।”सीमांचल की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही।जहाँ कभी चुप्पी और उपेक्षा का बोलबाला था, वहीं अब AIMIM जैसी पार्टियां अपने आक्रामक रुख और जनाधार की शक्ति के साथ नई राजनीतिक दिशा तय कर रही हैं।आगे की राजनीति में यह क्षेत्र बिहार की सत्ता-समीकरण में ‘किंगमेकर’ भी बन सकता है।
