बी के झा
नई दिल्ली/बेंगलुरु, 23 नवंबर
कर्नाटक की राजनीति में कई दिनों से चल रही सियासी सरगर्मी पर शनिवार को अचानक ब्रेक लगा, जब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात के बाद साफ कर दिया कि राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की कोई योजना नहीं है। CM ने बताया कि खरगे ने उन्हें न सिर्फ “कार्यकाल जारी रखने” को कहा है, बल्कि आगामी कर्नाटक बजट की तैयारियाँ भी शुरू करने के निर्देश दिए हैं।इस बयान के साथ ही कांग्रेस के भीतर पिछले कुछ हफ्तों से चल रही हलचल, दबी कलह और ‘नेतृत्व बदल’ चर्चाओं को एक झटके में शांत करने की कोशिश की गई है।
मुलाकात में क्या हुआ?
खरगे से मुलाकात के बाद सिद्धारमैया ने कहा—“मैं उनके बुलावे पर दिल्ली गया था। उन्होंने मुझे अगले बजट की तैयारी पर फोकस करने को कहा है। नेतृत्व परिवर्तन एक मनगढ़ंत कहानी है।”वहीं डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार, जिनके समर्थक उन्हें ‘सीएम इन-वेटिंग’ बताने लगे थे, उन्होंने भी सिद्धारमैया को बधाई देकर ‘सब ठीक है’ का संकेत दिया।सिद्धारमैया ने सख्त लहजे में यह भी कहा कि अगर उन्हें विधायकों के दिल्ली दौरे की वजह जाननी होती, तो वह खुफिया विभाग से पता कर लेते।उनका बयान साफ इशारा देता है—नेतृत्व चुनौती अभी खत्म हो चुकी है।
पृष्ठभूमि:
आखिर सियासी तूफ़ान उठा क्यों?कांग्रेस के 15 से अधिक विधायकों ने पिछले हफ्तों में दिल्ली जाकर खरगे से मुलाकात की थी।उनकी मांग थी कि—
ढाई साल सिद्धारमैया पूरे कर चुके हैं
अब अगले ढाई साल के लिए डीके शिवकुमार को कमान दी जाएकर्नाटक मॉडल में दो-पहिए वाली सत्ता की यह डील पहले दिन से हिलती रही है, पर पहली बार इतना बड़ा समूह दिल्ली पहुंचा था, जिससे राजनीतिक गर्मी बढ़ गई।
बीजेपी का हमला:बीजेपी ने सिद्धारमैया-खरगे मुलाकात को “कांग्रेस की मजबूरी और अंदरूनी फूट” करार दिया।बीजेपी प्रवक्ता मालविका बोले—“कांग्रेस सिर्फ कुर्सी बचाने में लगी है। कर्नाटक में प्रशासन ठप है और मंत्री दिल्ली में लाइन लगाते घूम रहे हैं। यह सरकार जनता नहीं, समझौतों से चल रही है।”पूर्व सीएम बसवराज बोम्मई ने कहा—“अगर सब ठीक था तो सिद्धारमैया को दिल्ली भागने की क्या जरूरत थी? शिवकुमार समर्थकों का दबाव अभी भी मौजूद है। ये आग सिर्फ दबाई गई है, बुझी नहीं।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय:राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह मुलाकात स्थिति संभालने का एक अस्थायी समाधान है।पूरा विवाद फिलहाल “कूल्ड स्टोरेज” में गया है, खत्म नहीं हुआ।राजनीतिक टिप्पणीकार अश्विन महादेव के अनुसार—“कर्नाटक में डबल पावर सेंटर हैं—सिद्धारमैया और शिवकुमार। दोनों की ताकत ज़मीन पर बराबर है। कांग्रेस के पास अभी लोकसभा हार के बाद विकल्प नहीं था, इसलिए बदलाव टाला गया है।”एक अन्य विश्लेषक का मत—“यदि बजट सफल रहा, तो सिद्धारमैया सुरक्षित। अगर असंतोष बढ़ा, तो 2026 के पहले वापसी से इनकार नहीं किया जा सकता।”
कांग्रेस की राहत, लेकिन असंतोष जिंदा
नेतृत्व संकट पर तात्कालिक विराम
बजट पर फोकस का निर्देश
भावी नगरपालिका चुनावों में संयुक्त रणनीतिलेकिन—
कई विधायक पहले ही कैबिनेट पद की मांग कर चुके
शिवकुमार गुट सक्रिय, भविष्य में दबाव जारी रहने के संकेत
निष्कर्ष
सिद्धारमैया–खरगे मुलाकात ने एक बार फिर यह साबित किया कि कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व “कुर्सी की लड़ाई” को सार्वजनिक होने नहीं देना चाहता।फिलहाल कर्नाटक में सियासी थर्मामीटर सामान्य दिख रहा है, पर यह भी उतना ही सच है कि कांग्रेस की सत्ता दो आधार स्तंभों पर टिकी है—और दोनों की महत्वाकांक्षाएँ अभी भी बरकरार हैं।तूफान थम गया है, पर लहर अभी भी चल रही है।
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