बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 6 जनवरी
देश की न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ते दबाव और कानून निर्माण की प्रक्रिया में व्यावहारिक तैयारी की कमी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने मंगलवार को केंद्र सरकार से तीखे और दूरगामी सवाल किए। एक अहम सुनवाई के दौरान CJI ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्पेशल कानून बनाते समय यह क्यों नहीं सोचा जाता कि उसका असर अदालतों, जजों और पूरी न्याय प्रणाली पर क्या पड़ेगा।CJI की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब अदालतें पहले से ही लंबित मामलों के बोझ से जूझ रही हैं और नए कानून उस बोझ को और बढ़ा रहे हैं।
चेक बाउंस मामलों ने “सिस्टम को जाम” कर दियाCJI ने हाल ही में आई एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ दिल्ली में ही धारा 138 (चेक बाउंस) के मामलों ने पूरे न्यायिक ढांचे को लगभग जाम कर दिया है।उन्होंने दो टूक कहा—“आप कानून तो बना देते हैं, लेकिन उन मामलों को संभालने के लिए न तो नई अदालतें बनाते हैं, न जज नियुक्त करते हैं और न ही ढांचा मजबूत करते हैं।”CJI के अनुसार, बिना पूर्व अध्ययन और प्रभाव आकलन के बनाए गए कानून न्याय की गति को धीमा कर देते हैं और अदालतों को प्रशासनिक संकट में डाल देते हैं।
कर्नाटक जातिगत हिंसा केस: जमानत से इनकार, ट्रायल पर जोर यह टिप्पणी कर्नाटक में जातिगत हिंसा से जुड़े एक गंभीर आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई। इस मामले में आरोपी पर ‘टाइगर गैंग’ का सक्रिय और प्रभावशाली सदस्य होने का आरोप है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी हफ्ता वसूली और जबरन वसूली जैसे अपराधों में लिप्त रहा है और उसे गैंग का रिंग लीडर बताया गया है।सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल आरोपी को जमानत देने से इनकार कर दिया, लेकिन ट्रायल को तेज़ी से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए।
“जेल में भी ऐश कर रहा होगा” — CJI की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान CJI की एक टिप्पणी ने खासा ध्यान खींचा। उन्होंने कहा—“वो तो रिंगलीडर है, जेल के अंदर भी अच्छे मजे कर रहा होगा। हमें पता है जेलों में क्या होता है।”इस पर आरोपी के वकील ने कड़ी आपत्ति जताई और कोर्ट को बताया कि आरोपी गंभीर रूप से बीमार है और उसका किडनी ट्रांसप्लांट हो चुका है।इस पर CJI ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा—“तो फिर जेल उसके लिए रिकवरी करने की कितनी सुरक्षित और आरामदायक जगह है।”
गवाहों के पलटने का मुद्दा: कोर्ट की चिंता प्रॉसिक्यूशन ने बताया कि आरोपी के खिलाफ कुल 12 जबरन वसूली के मामले दर्ज हैं, जिनमें से 8 मामलों में गवाह पलट गए, जिसके चलते आरोपी बरी हो गया। सरकार ने आशंका जताई कि अगर आरोपी को जमानत मिली, तो शेष मामलों में भी गवाह प्रभावित हो सकते हैं।सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिया कि मुख्य और आंखों देखे गवाहों के बयान पहले दर्ज किए जाएं,ट्रायल साप्ताहिक आधार पर चले,और उसके बाद ही जमानत पर पुनर्विचार किया जाए।अगर ट्रायल एक साल से अधिक खिंचता है, तो आरोपी को फिर से जमानत याचिका दाखिल करने की छूट दी गई है।
कानून के जानकार: “यह न्यायिक नीति पर चेतावनी है”संवैधानिक कानून विशेषज्ञों का मानना है कि CJI की टिप्पणी केवल एक केस तक सीमित नहीं है।एक वरिष्ठ अधिवक्ता के अनुसार—“यह टिप्पणी संसद और सरकार के लिए स्पष्ट संदेश है कि कानून बनाते समय जजों की संख्या, अदालतों की क्षमता और प्रक्रियागत बोझ का आकलन जरूरी है।”
राजनीतिक विश्लेषक: नीति और न्याय के बीच खाई उजागर राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह टिप्पणी नीति-निर्माण और न्यायिक ढांचे के बीच तालमेल की कमी को उजागर करती है।उनके अनुसार—“सरकारें कानून बनाकर राजनीतिक संदेश तो दे देती हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी पूरी तरह अदालतों पर डाल दी जाती है।”
सरकार की प्रतिक्रिया: सुधार की दिशा में प्रयास जारीसरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार न्यायिक सुधारों पर काम कर रही है, ई-कोर्ट्स, डिजिटल फाइलिंग और फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स जैसे कदम इसी दिशा में उठाए गए हैं।सरकारी पक्ष का तर्क है कि लंबित मामलों की समस्या केवल कानून निर्माण से नहीं, बल्कि दशकों पुरानी संरचनात्मक कमियों से जुड़ी है।
विपक्ष:
“CJI ने वही कहा जो हम वर्षों से कह रहे हैं”विपक्षी दलों ने CJI की टिप्पणी का समर्थन करते हुए कहा कि सरकार कानून तो तेजी से बनाती है, लेकिन न्यायिक ढांचे को मजबूत करने में विफल रहती है।एक विपक्षी नेता ने कहा—“यह सिर्फ अदालतों की नहीं, बल्कि आम नागरिकों की समस्या है, जिन्हें वर्षों तक न्याय का इंतजार करना पड़ता है।
निष्कर्ष
इस पूरे मामले के बहाने CJI ने एक बार फिर व्यवस्था के मूल सवाल को सामने रख दिया है—क्या बिना तैयारी के बनाए गए कानून वास्तव में न्याय दिलाते हैं, या न्याय को और दूर कर देते हैं?
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक केस पर फैसला नहीं, बल्कि नीति-निर्माण और न्याय व्यवस्था के बीच संतुलन की मांग है। अब देखना यह है कि सरकार इस चेतावनी को संरचनात्मक सुधार में बदलती है या नहीं।
