कुछ तो गड़बड़ है: मद्रास हाई कोर्ट की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

बी के झा

NSK

नई दिल्ली , 12 दिसंबर

करूर दुर्घटना केस में उठे गंभीर सवाल, विशेषज्ञ बोले—“न्यायिक व्यवस्था में बेवजह हस्तक्षेप लोकतंत्र के लिए खतरा”**तमिलनाडु के करूर में अभिनेता-से-राजनीतिक नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कजगम (TVK) के कार्यक्रम में हुई भीषण भगदड़, जिसमें 41 लोगों की जान चली गई थी, अब न्यायपालिका के भीतर ही एक बड़े विवाद का केंद्र बन गई है।इस त्रासदी से जुड़े मामलों के लिस्टिंग से लेकर सुनवाई तक, मद्रास हाई कोर्ट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं।“हाई कोर्ट में कुछ गलत हो रहा है…” —

सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट की समीक्षा के बाद कहा—हाई कोर्ट में कुछ गलत हो रहा है। यह सही प्रैक्टिस नहीं है…

रिपोर्ट सामने है।

”सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर में ही इस रिपोर्ट को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था, यह जानने के लिए कि करूर, जो मदुरै बेंच के अधिकार क्षेत्र में आता है, उसकी सुनवाई चेन्नई बेंच ने क्यों और कैसे की?इसके साथ ही कोर्ट ने रिपोर्ट को सभी पक्षों के बीच साझा करने का आदेश दिया और उनसे जवाब मांगा।विरोधाभासी आदेश और ‘अनुचित हस्तक्षेप’ पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल सुप्रीम कोर्ट ने तीन प्रमुख विसंगतियों की ओर इशारा किया—

1. करूर से जुड़े मामले को चेन्नई बेंच ने क्यों संभाला, जबकि अधिकार क्षेत्र मदुरै का था?

2. सिर्फ राजनीतिक रैलियों की गाइडलाइंस मांगने वाली याचिका पर चेन्नई बेंच ने कैसे SIT गठित कर दी?

3. दोनों बेंचों के उसी दिन आए ‘विरोधाभासी आदेश’ न्यायिक अनुशासन का उल्लंघन क्यों नहीं माने जाएं?

मदुरै बेंच ने CBI जांच से इंकार किया,वही चेन्नई बेंच ने पुलिस SIT गठित कर दी।सुप्रीम कोर्ट इसे “ज्यूरिडिक्शनल कन्फ्यूज़न और प्रक्रिया का उल्लंघन” मान रही है।

विशेषज्ञों की राय शामिल करते हुए विस्तृत विश्लेषण

वरिष्ठ अधिवक्ता अरविन्द कुमार सिंह बोले—“यह न्यायिक अंकुश की अनदेखी है”

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अरविन्द कुमार ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा—

अगर किसी हाई कोर्ट में अधिकार क्षेत्र का पालन न हो और दो बेंचों से परस्पर विरोधी आदेश आ जाएं, तो यह न्यायिक अनुशासन पर गंभीर प्रहार है। मद्रास हाई कोर्ट में जो हुआ है, वह सामान्य त्रुटि नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर गहरी असंगति का संकेत है।”उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की तीखी प्रतिक्रिया यह संकेत है कि—

अब न्यायिक व्यवस्था में राजनीतिक या प्रशासनिक प्रभाव की छाया दिखे तो उसे सीधा हटाया जाएगा। करूर केस सिर्फ एक त्रासदी नहीं, बल्कि न्यायिक प्रणाली की परीक्षा भी है।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय—“दबाव की राजनीति का असर दिख रहा है”

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि—यह मामला सिर्फ कानूनी तकनीक का नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति में बढ़ते दबाव और प्रभाव का प्रत्यक्ष उदाहरण है। जब दो न्यायिक आदेश सरकार, अभिनेता-राजनीति और प्रशासनिक प्रतिष्ठान के आसपास केंद्रित मुद्दे पर टकरा जाएं, तो संदेह स्वाभाविक है कि कहीं न्यायिक प्रक्रिया बाहरी दबावों से तो प्रभावित नहीं हो रही।”

एक विश्लेषक ने कहा—सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप न्यायिक संतुलन को बहाल करने की कोशिश है।”

शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया—“न्यायिक शुचिता की रक्षा आवश्यक”देश के प्रमुख विधि शिक्षाविदों का कहना है—हाई कोर्ट की दो बेंचों का एक ही दिन विरोधाभासी आदेश देना बेहद चिंताजनक है। इससे न्यायव्यवस्था में जनता का विश्वास कम होता है।

न्यायालय को यह सुनिश्चित करना ही होगा कि अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया का कड़ाई से पालन हो।”वरिष्ठ पत्रकारों की टिप्पणी—“करूर त्रासदी को राजनीतिक रंग न दें

”वरिष्ठ पत्रकारों ने कहा—41 लोगों की मौत की त्रासदी न्याय की मांग करती है। लेकिन जब मामले की सुनवाई ही विवादों में घिर जाए—कौन बेंच सुनेगी, कौन नहीं—तो आमजन से लेकर पीड़ितों का विश्वास डगमगाता है। चेन्नई और मदुरै बेंच के बीच पैदा हुए टकराव ने न्याय की रफ्तार धीमी की है।”

एक वरिष्ठ संपादक ने लिखा—सुप्रीम कोर्ट ने बहुत समय पर दखल दिया, वरना यह मामला सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन का मैदान बन जाता।CBI जांच की निगरानी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि—CBI जांच की निगरानी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज अजय रस्तोगी की अध्यक्षता वाली तीन-सदस्यीय समिति ही करेगीऔर दो ऐसे वरिष्ठ IPS अधिकारियों को शामिल किया जाएगा जो तमिलनाडु के मूल निवासी न होंइस आदेश में बदलाव की तमिलनाडु सरकार की मौखिक अपील कोर्ट ने ठुकरा दी।

निष्कर्ष:

न्यायिक प्रक्रिया की मर्यादा पर सुप्रीम कोर्ट का कठोर रुख क्रूर भगदड़ त्रासदी में न्याय की दिशा में यह मामला अब सिर्फ एक दुर्घटना की जांच नहीं रहा, बल्कि—

न्यायिक अधिकार क्षेत्र,प्रक्रियात्मक अनुशासन,राजनीतिक प्रभाव,और न्यायिक स्वतंत्रता पर एक बड़े विमर्श का रूप ले चुका है।सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि—

जो भी गड़बड़ी है, उसे उजागर भी किया जाएगा और सुधारा भी जाएगा… चाहे वह कहीं भी हो।

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