कोर्ट में टकराए लालू के दोनों उत्तराधिकारी खामोशी में गूंजती सत्ता की जंग, तेजस्वी के इशारे ने खोली राजद की अंदरूनी परतें

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 9 जनवरी

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट शुक्रवार को सिर्फ लैंड फॉर जॉब मामले की सुनवाई का मंच नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल की भावी राजनीति की नब्ज भी वहीं टटोल ली गई। अदालत की गैलरी में लालू प्रसाद यादव के दोनों पुत्र—तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव—का आमना-सामना हुआ, लेकिन यह टकराव शब्दों का नहीं, सत्ता-संतुलन और उत्तराधिकार की अदृश्य जंग का था।

कुछ सेकंड की यह मूक भेंट राजद के भीतर लंबे समय से दबी उस दरार को उजागर कर गई, जिसे सार्वजनिक मंचों पर अक्सर ‘पारिवारिक एकजुटता’ के आवरण में ढकने की कोशिश की जाती रही है।इशारा और अस्वीकार—नेतृत्व की भाषातेजस्वी यादव ने बड़े भाई की ओर इशारों में हालचाल पूछा। यह इशारा महज औपचारिक शिष्टाचार नहीं था, बल्कि सत्ता के केंद्र से निकला संकेत था—“सब ठीक है?

”तेज प्रताप यादव ने न जवाब दिया, न मुस्कुराए। उनका सख्त चेहरा यह साफ कर गया कि सवाल स्वास्थ्य का नहीं, सम्मान और भूमिका का है।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह दृश्य तेजस्वी यादव के निर्विवाद नेतृत्व की उस सच्चाई को रेखांकित करता है, जिसमें तेज प्रताप खुद को हाशिए पर महसूस करते रहे हैं।

मीसा की खामोशी: मध्यस्थ नहीं, मूक दर्शक

इस पूरे घटनाक्रम में मीसा भारती का मौन बेहद अर्थपूर्ण रहा। न उन्होंने दोनों भाइयों के बीच संवाद का प्रयास किया, न ही कोई प्रतिक्रिया दी। यह खामोशी संकेत देती है कि परिवार के भीतर संतुलन साधने की भूमिका अब लगभग समाप्त हो चुकी है।राजनीति में चुप्पी अक्सर सबसे बड़ा बयान होती है—और मीसा की चुप्पी यह बताती है कि विवाद अब केवल व्यक्तिगत नहीं, संरचनात्मक हो चुका है।

संजय यादव: सत्ता का अदृश्य ध्रुव

तेज प्रताप यादव की असहजता का केंद्र एक बार फिर संजय यादव रहे। तेजस्वी यादव के साथ उनकी मौजूदगी ने पुराने मतभेदों को फिर सतह पर ला दिया। तेज प्रताप कई बार संजय यादव को राजद का ‘जयचंद’ कह चुके हैं—यह आरोप केवल व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पार्टी की रणनीतिक दिशा पर हमला है।रोहिणी आचार्य द्वारा चुनावी हार के बाद संजय यादव के प्रभाव पर उठाए गए सवालों ने इस अंदरूनी संघर्ष को और गहरा कर दिया। यह साफ है कि राजद में संघर्ष अब परिवार बनाम परिवार नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्र बनाम उपेक्षित धड़े का रूप ले चुका है।पहले भी दिखी है दरार

पटना एयरपोर्ट का वह दृश्य, विधानसभा चुनाव के दौरान का वायरल वीडियो—

ये सभी संकेत थे कि संबंध सामान्य नहीं हैं। फर्क बस इतना है कि तब कैमरे थे, आज अदालत की दीवारें।राजनीति में स्थान और समय बदलते रहते हैं, लेकिन भाव वही रहते हैं—और कोर्ट परिसर में दिखा तनाव उसी निरंतरता का प्रमाण है।कानूनी संकट और सियासी उत्तराधिकार लैंड फॉर जॉब केस ने लालू परिवार को कानूनी तौर पर एक मंच पर जरूर ला दिया है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह केस उनके बीच की दूरियों को और स्पष्ट कर रहा है। तेजस्वी यादव खुद को पार्टी का निर्विवाद चेहरा स्थापित कर चुके हैं, जबकि तेज प्रताप अब भी अपने हिस्से की भूमिका और सम्मान की तलाश में दिखते हैं।यह सवाल अब केवल यह नहीं रह गया कि केस में फैसला क्या होगा—असल सवाल यह है कि राजद की राजनीति में जगह किसकी होगी और किस कीमत पर?

खामोशी जो बहुत कुछ कह गई अदालत परिसर में बोले गए शब्द भले कम थे, लेकिन संदेश स्पष्ट था—राजद की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि उसके भीतर चल रही वह अदृश्य लड़ाई है, जो सही समय आने पर सार्वजनिक विस्फोट का रूप ले सकती है।

कोर्ट में उस दिन सिर्फ कानून नहीं, बल्कि लालू परिवार की राजनीतिक विरासत भी कटघरे में खड़ी दिखी।

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