क्या हम सचमुच एक मृत समाज बनते जा रहे हैं?’ सेंगर को जमानत पर राहुल गांधी का तीखा प्रहार, न्याय-व्यवस्था पर उठे गहरे सवाल

बी के झा

नई दिल्ली, 24 दिसंबर

उन्नाव दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए जा चुके पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद देश की राजनीति, न्यायिक विमर्श और सामाजिक चेतना एक बार फिर उथल-पुथल में है। इस फैसले को लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का बयान महज राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि भारतीय समाज और न्याय व्यवस्था के आईने में खुद को देखने की चुनौती बन गया है।राहुल गांधी ने तीखे शब्दों में कहा—“बलात्कारियों को जमानत और पीड़िताओं को डर के साए में जीने के लिए मजबूर करना—क्या यही न्याय है?

ऐसी अमानवीय घटनाओं के साथ हम सिर्फ ‘मृत अर्थव्यवस्था’ नहीं, बल्कि एक ‘मृत समाज’ बनते जा रहे हैं।”फैसला क्या है और विवाद क्यों?

दिल्ली हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा काट रहे कुलदीप सिंह सेंगर की सजा अस्थायी रूप से निलंबित करते हुए, उसकी अपील पर अंतिम निर्णय आने तक जमानत दे दी। अदालत ने यह तर्क दिया कि सेंगर सात साल से अधिक जेल में बिता चुका है।

लेकिन सवाल यह है कि—क्या सजा की अवधि ही न्याय का एकमात्र पैमाना है?

क्या पीड़िता की सुरक्षा, मानसिक स्थिति और लगातार मिल रही धमकियां गौण हो जाती हैं?यहीं से यह मामला कानूनी आदेश से आगे बढ़कर नैतिक और सामाजिक बहस में बदल गया है।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय: ‘यह सिर्फ एक केस नहीं’राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी का बयान केवल सरकार पर हमला नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के प्रति बढ़ते अविश्वास की अभिव्यक्ति है।एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं—“जब एक प्रभावशाली दोषी को राहत मिलती है और पीड़िता बार-बार न्याय की गुहार लगाती है, तो समाज के भीतर यह संदेश जाता है कि ताकतवरों के लिए कानून अलग है।

वरिष्ठ अधिवक्ता: ‘कानूनी रूप से संभव, नैतिक रूप से असहज’कानूनविदों का मत अपेक्षाकृत संतुलित है।

सर्वोच्च न्यायालय के एक वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद कुमार सिंह के अनुसार—“कानून में सजा निलंबन और जमानत का प्रावधान है, लेकिन ऐसे मामलों में अदालतों को यह भी देखना चाहिए कि इससे पीड़िता पर क्या प्रभाव पड़ेगा। न्याय सिर्फ प्रक्रिया नहीं, भरोसा भी है।”कुछ अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि इस तरह के फैसलों में पीड़िता की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट दिशानिर्देश जरूरी हैं।

महिला आयोग की चिंता: ‘पीड़िता फिर असुरक्षित’महिला आयोग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस फैसले के बाद पीड़िता की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता है।एक वरिष्ठ महिला अधिकार कार्यकर्ता ने कहा—“न्याय तब अधूरा रह जाता है, जब पीड़िता को हर फैसले के बाद फिर डरने पर मजबूर होना पड़े।”

महिला संगठनों ने सरकार से मांग की है कि—पीड़िता को पूर्ण सुरक्षाऔर मामले की तेज सुनवाई सुनिश्चित की जाए।

वरिष्ठ पत्रकारों का सवाल: ‘न्याय किसके लिए?’वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि यह मामला मीडिया, समाज और सत्ता—तीनों के लिए आत्ममंथन का क्षण है।एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं—“अगर एक बलात्कार पीड़िता को सालों तक संघर्ष करना पड़े और दोषी बार-बार राहत पाए, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को चोट है।

”हिन्दू संगठनों और सामाजिक चिंतकों की प्रतिक्रिया कुछ सामाजिक और हिन्दू संगठनों ने भी इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उनका कहना है कि—“धर्म, राजनीति या पहचान से ऊपर उठकर पीड़िता के साथ खड़ा होना ही सच्ची सामाजिक जिम्मेदारी है।”

सरकार की प्रतिक्रिया: ‘कानून अपना काम कर रहा है’सरकारी पक्ष का कहना है कि—“न्यायपालिका स्वतंत्र है और सरकार न्यायिक निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करती। पीड़िता की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।”हालांकि विपक्ष का तर्क है कि संवेदनशील मामलों में सरकार की नैतिक भूमिका भी होती है, सिर्फ औपचारिक बयान नहीं।

निष्कर्ष:

‘मामला सेंगर से बड़ा है’उन्नाव मामला अब सिर्फ एक व्यक्ति या एक जमानत आदेश तक सीमित नहीं है। यह सवाल बन चुका है—

क्या हमारी न्याय प्रणाली पीड़ित-केंद्रित है?क्या ताकत और पद अब भी कानून पर भारी हैं?और क्या हम सचमुच उस समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जिसे राहुल गांधी ने “मृत समाज” कहा?

इस बहस का उत्तर अदालतों से ज्यादा समाज और सत्ता की संवेदनशीलता तय करेगी।क्योंकि न्याय सिर्फ फैसला नहीं, विश्वास का नाम है—और वही आज सबसे ज्यादा कठघरे में खड़ा दिख रहा है।

NSK

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