बी के झा
NSK




औरंगाबाद/पटना / न ई दिल्ली, 31 जनवरी
बिहार में “सुशासन”, “महिला सम्मान” और “कानून का राज” के सरकारी नारों के बीच ज़मीनी हकीकत एक बार फिर इन दावों को कठघरे में खड़ा कर रही है। एक ओर नालंदा में खाकी वर्दी पहने थानेदार द्वारा महिला के बाल खींचकर पीटने का वीडियो वायरल है, तो दूसरी ओर औरंगाबाद में जामा मस्जिद के पास एक केमिस्ट की सरेआम गोली मारकर हत्या।दोनों घटनाएं अलग-अलग हैं, लेकिन सवाल एक—
क्या बिहार में कानून अब नागरिकों की सुरक्षा कर पा रहा है, या खुद डर का पर्याय बन गया है?
नालंदा: जब रक्षक ही बना भक्षक
नालंदा जिले के थरथरी थाना क्षेत्र से सामने आया वीडियो बिहार पुलिस के इतिहास के सबसे शर्मनाक दृश्यों में गिना जा रहा है। वायरल फुटेज में थानाध्यक्ष संजय कुमार सिंघानिया वर्दी की हनक दिखाते हुए एक महिला के बाल खींचते और थप्पड़ मारते साफ नजर आते हैं।
क्या है पूरा मामला?
पुलिस टीम न्यायालय के आदेश पर रामवचन गोप की गिरफ्तारी के लिए रात के अंधेरे में पहुंची थी। गिरफ्तारी के दौरान परिजनों, खासकर महिलाओं ने विरोध किया।नियम साफ है—महिलाओं से निपटने के लिए महिला पुलिस कर्मी आगे रहेंगी।लेकिन वीडियो में कानून की किताबें जमीन पर पड़ी दिखती हैं और थानेदार खुद हाथापाई करता नजर आता है।
थानेदार की सफाई
थानाध्यक्ष का कहना है कि पुलिस पर हमला करने की कोशिश की गई।लेकिन सवाल यह है—क्या किसी भी परिस्थिति में एक महिला के साथ सरेआम मारपीट जायज़ हो सकती है?
महिला सम्मान के दावों पर तमाचा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना केवल एक अफसर की “व्यक्तिगत गलती” नहीं, बल्कि सिस्टम की मानसिकता को उजागर करती है।एक वरिष्ठ शिक्षाविद कहते हैं—“जब मुख्यमंत्री खुद महिला सशक्तिकरण के ब्रांड एंबेसडर बनते हैं और ज़मीन पर पुलिस महिलाओं को पीटती है, तो संदेश बेहद खतरनाक जाता है।”
कानूनविदों के अनुसार, यह मामला—IPC की धाराओं मानवाधिकार उल्लंघन पुलिस मैनुअल की खुली अवहेलना तीनों के दायरे में आता है।अब सवाल यह नहीं कि वीडियो वायरल हुआ, बल्कि यह कि बिना वीडियो के ऐसे कितने मामले दबा दिए जाते हैं?
औरंगाबाद: दुकान बंद की, जिंदगी बंद हो गई
दूसरी तस्वीर औरंगाबाद से है—और भी भयावह।
क्या हुआ?
स्थान: जामा मस्जिद के पास मृतक: मोहम्मद जुनैद, मेडिकल दुकानदार समय: शुक्रवार रात करीब 10:20 बजे दुकान बंद कर जुनैद पास की पान दुकान पर गया।तभी बाइक से आए दो अपराधियों ने पिस्तौल निकाली और 3–4 गोलियां दाग दीं।
इलाज के लिए ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही मौत।
हत्या के बाद बवाल
हत्या के बाद आक्रोशित लोगों ने—संदिग्ध युवक के घर पर हमला पथराव कार क्षतिग्रस्त स्थिति संभालने के लिए कई थानों की पुलिस, एसपी, एसडीपीओ को मौके पर डेरा डालना पड़ा।
“यह जंगलराज नहीं तो क्या है?”
हत्या की वजह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक हलकों में सवाल तीखे हैं।
एक राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं—“दिनदहाड़े गोली मार दी जाती है, रात में पुलिस महिला को पीटती है और सरकार कहती है—सब कंट्रोल में है। इसे जंगलराज नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे?
”विपक्ष का हमला
विपक्षी दलों ने नीतीश सरकार पर निशाना साधते हुए कहा—अपराध अब अपवाद नहीं, नियम बन चुका है।
पुलिस या तो बेबस है या बेलगाम जवाबदेही का तंत्र पूरी तरह फेल एक विपक्षी नेता ने तंज कसा—“पहले जंगलराज का डर दिखाकर वोट लिए गए, अब वही जंगलराज सरकारी संरक्षण में लौट आया है।”
कानूनविदों की चेतावनी: डर का राज लोकतंत्र के लिए खतरनाक
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि—जब पुलिस पर भरोसा टूटता है और अपराधी बेखौफ होते हैं तो समाज न्याय से नहीं, बदले से चलने लगता है, जैसा कि औरंगाबाद में दिखा।
बड़ा सवाल: कार्रवाई होगी या फाइल दबेगी?
नालंदा में—क्या थानेदार पर सिर्फ तबादला होगा?
या आपराधिक मुकदमा दर्ज होगा?
औरंगाबाद में—क्या हत्यारे जल्द पकड़े जाएंगे?
या मामला “जांच जारी है” की फाइल में चला जाएगा?
निष्कर्ष
नालंदा की पिटाई और औरंगाबाद की गोली—दोनों मिलकर एक ही कहानी कहते हैं—
बिहार में आज सवाल अपराध का नहीं, भरोसे का है।
और जब भरोसा टूटता है, तब सबसे बड़ा खतरा लोकतंत्र को होता है।
