ग्रीनलैंड पर ट्रंप की नजर: ‘नो कमेंट’ से उभरा युद्ध का साया, यूरोप के हाथ में 10 ट्रिलियन डॉलर का दबाव हथियार

बी के झा

वॉशिंगटन/कोपेनहेगन / नई दिल्ली, 20 जनवरी

वैश्विक राजनीति एक बार फिर अनिश्चितता के खतरनाक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर अपने इरादे फिर स्पष्ट कर दिए हैं, लेकिन इस बार उनके शब्दों से ज्यादा उनकी चुप्पी दुनिया को बेचैन कर रही है। जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के लिए सैन्य बल का इस्तेमाल करेगा, तो उनका जवाब था— “नो कमेंट।”राजनीतिक गलियारों में इस ‘नो कमेंट’ को सीधा इनकार नहीं, बल्कि रणनीतिक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

क्यों ग्रीनलैंड ट्रंप की रणनीति का केंद्र बना?

ग्रीनलैंड भले ही बर्फ से ढका निर्जन द्वीप प्रतीत हो, लेकिन इसकी भौगोलिक और सामरिक अहमियत असाधारण है। यह आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका, रूस और चीन के बीच उभरती प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है। ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि “जब तक अमेरिका का ग्रीनलैंड पर पूरा नियंत्रण नहीं होगा, तब तक दुनिया सुरक्षित नहीं रह सकती।”ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड पर चीन और रूस की बढ़ती गतिविधियां अमेरिका और पश्चिमी गठबंधन के लिए दीर्घकालिक खतरा हैं। यही वजह है कि उन्होंने डेनमार्क और यूरोपीय देशों पर दबाव बनाने के लिए टैरिफ हथियार का भी खुलकर जिक्र किया है।

नोबेल शांति पुरस्कार और बदली हुई भाषा

गौर करने वाली बात यह भी है कि ट्रंप ने हाल ही में कहा कि नोबेल शांति पुरस्कार से नजरअंदाज किए जाने के बाद अब उन्हें “पूरी तरह से शांति” की बाध्यता महसूस नहीं होती। यह बयान उनके कूटनीतिक रवैये में आए बदलाव का संकेत माना जा रहा है—जहां संवाद के बजाय दबाव और शक्ति की भाषा हावी होती दिख रही है।

यूरोप को फटकार, यूक्रेन का हवाला

एनबीसी को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने यूरोप को साफ संदेश देते हुए कहा कि उसे ग्रीनलैंड पर बयानबाजी छोड़कर यूक्रेन-रूस युद्ध पर ध्यान देना चाहिए।उनके शब्दों में, “यूरोप देख सकता है कि यूक्रेन युद्ध से उसे क्या हासिल हुआ। उसे वहीं फोकस करना चाहिए।”इस बयान को कई विश्लेषक यूरोप की सामरिक स्वतंत्रता पर सवाल के रूप में देख रहे हैं।

यूरोप का ‘साइलेंट वेपन’: 10 ट्रिलियन डॉलर की पूंजी

ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी के बीच यूरोप के पास एक ऐसा हथियार है, जो बंदूक या मिसाइल नहीं, बल्कि पूंजी है।अमेरिकी ट्रेजरी के आंकड़ों के मुताबिक,यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और नॉर्वे के निवेशकों के पास अमेरिकी बॉन्ड, शेयर और अन्य परिसंपत्तियों में 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की हिस्सेदारी है।यही कारण है कि अब वैश्विक बाजारों में एक गंभीर चर्चा चल पड़ी है—क्या यूरोप अमेरिकी परिसंपत्तियों को ‘वैपनाइज’ कर सकता है?

बॉन्ड और शेयर बिकवाली का खतरा

यदि यूरोपीय देश अमेरिकी बॉन्ड और इक्विटी की बड़े पैमाने पर बिकवाली करते हैं, तो इससे:अमेरिका की उधार लागत बढ़ सकती हैशेयर बाजारों में भारी दबाव आ सकता हैडॉलर की स्थिति कमजोर हो सकती हैडॉयचे बैंक के चीफ करेंसी स्ट्रैटेजिस्ट जॉर्ज सरावेलोस के अनुसार, अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी उसका विशाल बाहरी वित्तीय घाटा है, जिसे वह विदेशी पूंजी से ही संभालता है।

लेकिन यूरोप भी फंसा है

हालांकि, यह रास्ता यूरोप के लिए भी आसान नहीं है।अधिकांश अमेरिकी परिसंपत्तियां निजी यूरोपीय निवेशकों के पास हैंबड़े पैमाने की बिकवाली से यूरोपीय फंड्स को खुद भारी नुकसान हो सकता है राजनीतिक कारणों से जानबूझकर निवेश प्रदर्शन खराब करना जोखिम भरा कदम होगा इसीलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि यह विकल्प फिलहाल टेल रिस्क है—यानी अंतिम और बेहद आक्रामक कदम।

बाजारों में दिखने लगी हलचल

तनाव का असर बाजारों में साफ दिखाई देने लगा है।अमेरिकी इक्विटी फ्यूचर्स दबाव मेंयूरोपीय शेयर कमजोर डॉलर में नरमी वहीं सोना, स्विस फ्रैंक और यूरो जैसे सुरक्षित विकल्प मजबूतयह परिदृश्य ट्रंप के पिछले टैरिफ फैसलों के बाद दिखे ‘सेल अमेरिका ट्रेड’ की याद दिलाता है।

आगे क्या?

यूरोपीय संघ ने फिलहाल अमेरिका के साथ जुलाई में हुए व्यापार समझौते की मंजूरी रोकने का प्रस्ताव रखा है और 93 अरब यूरो के अमेरिकी सामान पर टैरिफ लगाने पर विचार चल रहा है। जर्मनी ने सबसे सख्त जवाब के लिए तैयार रहने की बात कही है।लेकिन बड़ा सवाल अब भी कायम है—

क्या ट्रंप की ‘नो कमेंट’ रणनीति भविष्य के किसी बड़े सैन्य या आर्थिक टकराव का संकेत है?ग्रीनलैंड भले ही दूर हो, लेकिन वहां उठती हलचल की गूंज अब पूरी दुनिया की राजनीति और बाजारों में सुनाई देने लगी है।

NSK

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