“ग्रेटर बांग्लादेश” साजिश का खुलासा: यूनुस सरकार की चाल में पाकिस्तान-तुर्की भी शामिल, असम पर नज़र!— भारत के पूर्वोत्तर को अपने नक्शे में जोड़ने की प्रतीकात्मक कोशिश, खुफिया एजेंसियां सतर्क

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/ढाका ,4 नवंबर

दक्षिण एशिया के राजनीतिक गलियारों में इस समय हलचल मच गई है। बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार पर आरोप है कि वह “ग्रेटर बांग्लादेश” के नाम से एक खतरनाक वैचारिक और भू-राजनीतिक योजना पर काम कर रही है।

इस योजना के तहत कथित तौर पर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों —

विशेषकर असम — को अपने प्रभाव क्षेत्र में शामिल करने की मंशा जताई गई है।इस खुलासे ने भारत की सुरक्षा एजेंसियों को चौकन्ना कर दिया है, क्योंकि यह महज एक प्रतीकात्मक कलाकृति नहीं, बल्कि ढाका की नई सत्ता के अंदर छिपे भूराजनीतिक सपनों का संकेत माना जा रहा है।

तुर्की और पाकिस्तान के साथ ‘तीन देशों का नया समीकरण’ रिपोर्ट्स के अनुसार, ढाका में कुछ दिन पहले मोहम्मद यूनुस ने तुर्की के एक संसदीय प्रतिनिधिमंडल को एक विशेष कलाकृति — “आर्ट ऑफ ट्रायम्फ” — भेंट की।

संयोग नहीं, बल्कि साज़िश की बू इसलिए भी आई क्योंकि ठीक यही कलाकृति कुछ दिन पहले उन्होंने एक पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी को भी भेंट की थी।इस कलाकृति में एक “ग्रेटर बांग्लादेश” का नक्शा दिखाया गया था, जिसमें असम और भारत के कुछ पूर्वोत्तर हिस्से बांग्लादेश के भूभाग के रूप में दर्शाए गए थे।

खुफिया सूत्रों ने इसे एक “प्रतीकात्मक इशारे” के बजाय “विचारधारा और नीति का संकेत” बताया है।

खुफिया सूत्र बोले — यह ‘कला’ नहीं, वैचारिक संदेश था

एक वरिष्ठ खुफिया अधिकारी के अनुसार —

यह कोई कला प्रदर्शन नहीं था, बल्कि इस्लामी देशों को संदेश देने की एक योजनाबद्ध कोशिश थी। इसका मकसद यह दिखाना है कि बांग्लादेश अब सिर्फ एक सीमित राष्ट्र नहीं, बल्कि क्षेत्रीय नेतृत्व की भूमिका का सपना देख रहा है।

रिपोर्टों के मुताबिक, इस “ग्रेटर बांग्लादेश” दस्तावेज़ में भविष्य की युद्ध रणनीति, प्रशासनिक ढांचे और विजय के बाद की नीति तक के प्रारूप शामिल हैं। यानी, यह किसी कलाकार की कल्पना नहीं, बल्कि ढाका की अंतरिम सरकार की रणनीतिक सोच का प्रतिबिंब है।

तुर्की की भूमिका संदिग्ध —

दक्षिण एशिया में ‘इस्लामी प्रभाव’ का नया अभियानसाल 2024 से तुर्की दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी अखिल-इस्लामी पहुँच (Pan-Islamic Influence) को मजबूत करने की कोशिशों में जुटा है।खास तौर पर ढाका के साथ उसके रक्षा, ड्रोन तकनीक और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को लेकर संबंध बढ़े हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह सब “नरम विस्तारवाद (Soft Expansionism)” की रणनीति के तहत हो रहा है, जिसमें धार्मिक जुड़ाव के बहाने राजनीतिक प्रभाव जमाने की कोशिश की जा रही है।

पाकिस्तान भी ‘खेल’ में सक्रिय

बांग्लादेश में तुर्की के बाद अब पाकिस्तानी खुफिया तंत्र (ISI) भी सक्रिय बताया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, यूनुस सरकार की कई अंतरराष्ट्रीय मुलाकातों में पाकिस्तानी सलाहकारों की मौजूदगी देखी गई है।दिलचस्प बात यह है कि यूनुस और पाकिस्तान के बीच संपर्क उन्हीं चैनलों के माध्यम से बढ़ रहे हैं, जो 1971 के बाद से भारत के पूर्वोत्तर में अलगाववाद को हवा देने के लिए इस्तेमाल होते रहे हैं।

भारत की खुफिया एजेंसियां सतर्क

रिपोर्टों के अनुसार, भारत की सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे घटनाक्रम पर “कड़ी नजर” रखे हुए हैं।राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिष्ठान (National Security Establishment) का मानना है कि “ग्रेटर बांग्लादेश” की यह वैचारिक योजना सीमा पार उकसावे और आंतरिक अस्थिरता फैलाने की भूमिका निभा सकती है।विशेष रूप से असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल को लेकर खुफिया निगरानी बढ़ा दी गई है।

विश्लेषण: ‘

ग्रेटर बांग्लादेश’ —

इतिहास की गूंज या भविष्य की चेतावनी?

विशेषज्ञ मानते हैं कि “ग्रेटर बांग्लादेश” का विचार नया नहीं है। यह 1971 के बाद से कट्टर राष्ट्रवादी धड़ों में समय-समय पर उभरता रहा है, लेकिन अब यह राज्य-स्तरीय संकेतों के रूप में सामने आना चिंताजनक है।

दरअसल, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार घरेलू अस्थिरता, इस्लामी राजनीति और अंतरराष्ट्रीय दबावों से जूझ रही है। ऐसे में, “राष्ट्रीय गौरव” के नाम पर पड़ोसी देशों से साझा इस्लामी एजेंडा बनाना उसके लिए समर्थन जुटाने का तरीका हो सकता है। टिप्पणी अगर बांग्लादेश का “ग्रेटर बांग्लादेश” सपना महज प्रतीकात्मक भी है, तो भी यह भारत के लिए रणनीतिक और वैचारिक खतरे का संकेत है।

असम, त्रिपुरा और पूर्वोत्तर भारत में पहले से मौजूद घुसपैठ और जनसांख्यिकीय असंतुलन की पृष्ठभूमि में यह योजना कहीं ज़्यादा गंभीर रूप ले सकती है।भारत के लिए अब सिर्फ सीमाओं की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि सीमाओं के भीतर वैचारिक सुरक्षा भी उतनी ही ज़रूरी हो गई है।

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