चार दिनों में 12 रैलियां करेंगे प्रधानमंत्री मोदी; बिहार चुनाव में “धुआंधार प्रचार” की डेट फाइनल, शाह बोले—20 साल का रिकॉर्ड टूटेगा

बी के झा

NSK

पटना‌/ नई दिल्ली, 18 अक्टूबर

बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, राजनीतिक माहौल हर दिन गरमाता जा रहा है। एनडीए के “विजय मिशन 2025” को लेकर अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद चुनावी रणभूमि में उतरने वाले हैं। पार्टी ने उनका धुआंधार प्रचार अभियान तय कर दिया है — जिसमें महज़ 12 दिनों में 4 दिन के भीतर 12 विशाल रैलियां होंगी।

मोदी की ताबड़तोड़ रैलियां — 23 अक्टूबर से 3 नवंबर तक गूंजेगी “मोदी लहर”भाजपा सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी 23 अक्टूबर से 3 नवंबर तक बिहार के विभिन्न जिलों में 12 जनसभाओं को संबोधित करेंगे।

वे हर दिन तीन-तीन चुनावी सभाओं में शामिल होंगे —> 23 अक्टूबर — सासाराम, भागलपुर और गया

28 अक्टूबर — पटना, मुजफ्फरपुर और दरभंगा

1 नवंबर — पूर्वी चंपारण, समस्तीपुर और छपरा

3 नवंबर — पश्चिम चंपारण, सहरसा और अररियाइन सभाओं को लेकर पार्टी ने ज़मीनी स्तर पर तैयारियां तेज़ कर दी हैं।

भाजपा और एनडीए के कार्यकर्ताओं को बूथ-स्तर पर सक्रिय किया जा रहा है।

शाह का दावा — “इस बार एनडीए 20 साल का रिकॉर्ड तोड़ेगा”गृह मंत्री अमित शाह, जिन्हें भाजपा का ‘चाणक्य’ कहा जाता है, ने अपने बयान में कहा —बिहार में इस बार एनडीए अब तक के सभी बहुमत के रिकॉर्ड को तोड़ेगा।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बिहार में सुशासन और विकास की जीत निश्चित है।

शाह के मुताबिक, प्रधानमंत्री मोदी का बिहार के साथ रिश्ता सिर्फ राजनीति का नहीं, विकास की आस्था का है।पीएम बनने के बाद से मोदी अब तक 55 बार बिहार का दौरा कर चुके हैं और लाखों करोड़ की योजनाएं राज्य को समर्पित की हैं —पटना एयरपोर्ट का नया टर्मिनल, पूर्णिया एयरपोर्ट, दरभंगा एम्स, और गंगा नदी पर कई ब्रिज इसकी मिसाल हैं।

वरिष्ठ शिक्षाविद का विश्लेषण — “मोदी सम्माननीय हैं, पर शाह की रणनीति ने गठबंधन को नुकसान पहुंचाया”चुनावी हलचल के बीच हमारी टीम की मुलाकात पटना विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ शिक्षाविद से हुई।जब उनसे पूछा गया कि प्रधानमंत्री मोदी के सक्रिय प्रचार से क्या बिहार की राजनीति का रुख बदल सकता है, तो वे मुस्कुराते हुए बोले —प्रधानमंत्री मोदी का सम्मान बिहार में ही नहीं, पूरे विश्व में है। लेकिन अमित शाह की आक्रामक रणनीति ने एनडीए को वैचारिक रूप से कमजोर किया है।

उन्होंने कई ऐसे निर्णय लिए जिनसे गठबंधन को नुकसान हुआ है।”उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लोकप्रियता कभी बिहार में निर्विवाद थी, लेकिन उनकी पार्टी के दो-तीन नेताओं ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ में उनकी छवि को धूमिल किया है।

नीतीश कुमार आज भी व्यक्तिगत रूप से सम्मानित हैं, परंतु उनकी पार्टी की आंतरिक राजनीति ने जनता में भ्रम पैदा कर दिया है,”

उन्होंने कहा।“

भाजपा अब अपना भविष्य चिराग पासवान में देख रही है — पर यह बिहार का ‘स्वर्ण मतदाता’ स्वीकार नहीं करेगा, ”शिक्षाविद ने भाजपा के भीतर नई राजनीतिक सोच पर भी सवाल उठाया।

भाजपा अब अपने भविष्य को चिराग पासवान जैसे युवा चेहरों में तलाश रही है। पर बिहार के ‘स्वर्ण मतदाता वर्ग’ (शिक्षित, मध्यमवर्गीय, नैतिक आधार वाले मतदाता) इस सोच को सहज स्वीकार नहीं करेंगे। क्योंकि उन्हें बिहार की राजनीति में स्थिरता और शुचिता चाहिए, न कि करिश्माई प्रचार।

उन्होंने कहा कि लोजपा (रामविलास) और भाजपा समर्थित पासवान गुट ने कई जिलों में “राजनीतिक दादागीरी” का माहौल बना दिया है — खासकर दरभंगा और छपरा जैसे इलाकों में।

दरभंगा में भाजपा विधायक और चिराग समर्थित कुछ लोगों द्वारा सरकारी अफसरों को दबाव में रखकर जमीन रजिस्ट्री जैसे मामले हुए हैं। प्रशासन चुप है। जनता इसे देख रही है,”

उन्होंने कहा।“प्रशांत किशोर समझदार हैं, लेकिन अभी वक्त चाहिए”

जब उनसे जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर के बारे में पूछा गया, तो शिक्षाविद ने कहा —प्रशांत किशोर पढ़े-लिखे और समझदार व्यक्ति हैं। वे राजनीति को नारेबाज़ी नहीं, नीति के ज़रिए बदलना चाहते हैं। पर बिहार में परिवर्तन कोई एक दिन की प्रक्रिया नहीं है। उन्हें अभी वक्त चाहिए। और अगर वे इस बार कुछ सीटें जीत भी जाते हैं, तो अंततः भाजपा के साथ ही खड़े होंगे।”“

बिहार अब बदलाव चाहता है — लेकिन दिशा अभी अस्पष्ट है

”शिक्षाविद ने अंत में कहा —बिहार की जनता भाजपा, जेडीयू या राजद — किसी से भी अंधभक्ति नहीं करती। वह अनुभवों से सीखती है। आज लोग भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी और गठबंधन की आंतरिक कलह से ऊब चुके हैं।

बिहार परिवर्तन चाहता है — पर किस दिशा में, यह 14 नवंबर की मतगणना ही बताएगी।”

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री मोदी की यह 12 रैलियां बिहार की राजनीति में एनडीए के लिए निर्णायक मोड़ साबित होंगी या नहीं,यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी।पर इतना तय है कि इस बार का चुनाव केवल “मोदी बनाम विपक्ष” नहीं, बल्कि“विकास बनाम विश्वासघात”,“प्रचार बनाम व्यवहार”और “संविधान बनाम सत्ता-समझौते” का संग्राम बनने जा रहा है।

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