बी के झा
NSK





पटना / नई दिल्ली, 13 दिसंबर
बिहार के उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री सम्राट चौधरी के एक बयान ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। लालू प्रसाद यादव से जुड़ी जब्त संपत्तियों में स्कूल खोलने के उनके ऐलान ने न सिर्फ सत्तापक्ष और विपक्ष को आमने-सामने ला खड़ा किया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या कानून-व्यवस्था और सामाजिक न्याय के नाम पर राजनीतिक प्रतीकों को निशाना बनाया जा रहा है, या सचमुच जनहित की एक नई परिकल्पना सामने रखी जा रही है?एक निजी न्यूज चैनल के कार्यक्रम मतना
सम्राट चौधरी ने कहा कि केंद्रीय जांच एजेंसियों द्वारा अटैच की गई संपत्तियों का उपयोग समाज के हित में किया जाएगा। उन्होंने दावा किया कि लालू प्रसाद यादव से जुड़ी एक इमारत, जो वर्षों से बंद पड़ी है, को रंग-रोगन कर उसमें स्कूल खोला जाएगा। उनके शब्दों में, “इससे जनता को फायदा होगा और लालू जी को भी अच्छा लगेगा।” यह टिप्पणी राजनीतिक हलकों में आग की तरह फैल गई।संपत्ति, जांच और राजनीतिक संदेश
सम्राट चौधरी ने अपने बयान में 950 करोड़ रुपये के कथित चारा घोटाले और अन्य मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि सीबीआई और ईडी द्वारा कई संपत्तियां अटैच की गई हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह पहल केवल लालू परिवार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि अपराधियों, माफियाओं और अवैध संपत्ति अर्जित करने वालों पर भी समान रूप से लागू होगी।
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. (डॉ.) अशोक कुमार मानते हैं कि यह बयान प्रशासनिक निर्णय से अधिक एक राजनीतिक संदेश है। उनके अनुसार, “यह एनडीए सरकार की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें कानून-व्यवस्था को चुनावी विमर्श के केंद्र में रखा जा रहा है।
लालू यादव बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक रहे हैं, ऐसे में उनका नाम लेना स्वाभाविक रूप से सुर्खियां बनाता है।”अपराध, माफिया और स्पीडी ट्रायल का दावागृह मंत्री के बयान का दूसरा बड़ा पहलू था—
अपराधियों के खिलाफ सख्ती। सम्राट चौधरी ने साफ कहा कि बिहार में अब अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं है। बालू माफिया, भूमि माफिया, परीक्षा माफिया और सूदखोरों के खिलाफ कार्रवाई होगी और तीन से छह महीने के भीतर स्पीडी ट्रायल के जरिए सजा दिलाई जाएगी।कानून के जानकार और पूर्व लोक अभियोजक इस दावे को महत्वाकांक्षी मानते हैं।
उनका कहना है, “स्पीडी ट्रायल की बात हर सरकार करती है, लेकिन इसके लिए पुलिस, अभियोजन और न्यायपालिका—तीनों का मजबूत समन्वय जरूरी है। केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति से यह संभव नहीं होता।”
जेडीयू का समर्थन, आरजेडी का तीखा विरोध सत्ताधारी गठबंधन के सहयोगी दल जेडीयू ने सम्राट चौधरी के बयान का समर्थन किया है। जेडीयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि जब्त संपत्तियों का इस्तेमाल स्कूल, छात्रावास और अनाथालय खोलने में होना चाहिए। उनके अनुसार, “अगर संपत्तियां अवैध तरीके से अर्जित की गई हैं, तो उनका उपयोग समाज के कमजोर वर्गों के लिए होना चाहिए।”वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने इस बयान को राजनीतिक दिखावा करार दिया है।
पार्टी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि बिहार में पहले से मौजूद कई स्कूल बदहाल स्थिति में हैं। “नई घोषणाएं करने से पहले सरकार को मौजूदा स्कूलों की स्थिति सुधारनी चाहिए। यह सब असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है,” उन्होंने कहा।शिक्षा बनाम राजनीति: असली सवाल क्या है?शिक्षाविद और सामाजिक चिंतक इस पूरे विवाद को शिक्षा व्यवस्था के व्यापक संकट से जोड़कर देखते हैं।
पटना विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के अनुसार, “अगर सरकार सचमुच शिक्षा को प्राथमिकता देती है, तो केवल भवन खोलना पर्याप्त नहीं है। शिक्षकों की नियुक्ति, बुनियादी ढांचा और गुणवत्ता पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।”वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में बिहार की राजनीति में एक नए नैरेटिव को जन्म दे सकता है—
अपराध से अर्जित संपत्ति बनाम जनकल्याण। एक वरिष्ठ पत्रकार के शब्दों में, “यह बयान भावनात्मक और प्रतीकात्मक है। सवाल यह है कि क्या यह नीति में बदलेगा या केवल चुनावी बयान बनकर रह जाएगा।
”निष्कर्ष
सम्राट चौधरी का यह बयान बिहार की राजनीति में सिर्फ एक विवाद नहीं, बल्कि एक संकेत है कि आने वाले दिनों में कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और शिक्षा—तीनों मुद्दे एक साथ राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहेंगे। जब्त संपत्तियों में स्कूल खोलने का विचार जितना आकर्षक है, उतना ही जटिल भी।
आखिरकार, जनता यही देखना चाहती है कि क्या यह घोषणा कागजों से निकलकर जमीन पर उतरती है, या फिर यह भी बिहार की राजनीति के लंबे वादों की सूची में शामिल हो जाएगी ?
