जम्मू-कश्मीर में सत्ता का टकराव — CM उमर अब्दुल्ला Vs LG मनोज सिन्हा बुलडोज़र कार्रवाई पर ‘गरम’ हुई राजनीति, आरोप– प्रत्यारोपों से सियासी तापमान चढ़ा

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/श्रीनगर/जम्मू, 28 नवंबर

जम्मू-कश्मीर की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। बुलडोज़र कार्रवाई को लेकर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उपराज्यपाल (LG) मनोज सिन्हा के बीच तीखा टकराव खुलकर सामने आ गया है।चुनी हुई सरकार और LG प्रशासन के बीच “शक्ति संघर्ष” की यह पहली सार्वजनिक भिड़ंत मानी जा रही है।उमर अब्दुल्ला ने आरोप लगाया—“बिना चुनी हुई सरकार से पूछे बुलडोज़र चलाया गया। यह हमें बदनाम करने और जनता के सामने जलील करने की सुनियोजित साजिश है।”उधर, LG प्रशासन इस आरोप को खारिज करते हुए कह रहा है कि “कानून के मुताबिक कार्रवाई हुई है और किसी को राजनीतिक रूप से निशाना नहीं बनाया गया।”

बुलडोज़र एक्शन: विवाद का केंद्र क्या है?जम्मू के एक पत्रकार अरफाज के घर को अधिकारियों ने “अवैध कब्ज़ा” बताकर ध्वस्त कर दिया।लेकिन घटना ने राजनीतिक भूचाल ला दिया।पीडीपी चीफ महबूबा मुफ्ती ने इसे “NC सरकार के एंटी-बुलडोज़र बिल को असेंबली में खारिज करने का नतीजा” बताया।उन्होंने कहा—“ये कोई सीमा के गांव नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर के मध्यवर्गीय परिवार हैं जिनके घर पलक झपकते ही मलबा बना दिए गए।

उमर अब्दुल्ला का सीधा वार —“LG के लोग अपनी मर्जी से चल रहे हैं बुलडोज़र”**श्रीनगर में मीडिया से बातचीत में CM उमर अब्दुल्ला ने कहा—“राजभवन से लगाए अफसर चुनी हुई सरकार को बताए बिना कार्रवाई कर रहे हैं।”“हमसे बिना पूछे अधिकारियों की पोस्टिंग होती है, फिर वही अफसर अपने तरीके से बुलडोज़र चलाते हैं।”“क्या जम्मू में सिर्फ एक जगह अवैध कब्ज़ा था? सिर्फ एक समुदाय को क्यों निशाना बनाया गया?”“मैंने पूरी फाइलें मंगाई हैं। देखना चाहता हूँ कि कहीं इसके पीछे किसी का मज़हब तो कारण नहीं।”उन्होंने इसे “चुनी हुई सरकार को कमजोर करने की कोशिश” बताया।

LG कार्यालय का ‘साइलेंट लेकिन सख्त’ संदेशआधिकारिक बयान तो नहीं आया, लेकिन प्रशासनिक सूत्रों ने कहा:“कार्रवाई कानून और दस्तावेज़ों के आधार पर हुई है।”“भूमि अतिक्रमण हटाना सरकार की प्राथमिकता है, इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप अस्वीकार्य है।”प्रशासन ने यह भी संकेत दिया कि “जनहित” में शुरू हुई कार्रवाई किसी राजनीतिक एजेंडे से नहीं जुड़ी।

राजनीतिक नेताओं की प्रतिक्रियाएँ —संपूर्ण राज्य में सियासी भूचाल**महबूबा मुफ्ती (PDP)“एक गरीब पत्रकार का 40 साल पुराना घर तोड़कर संदेश दिया जा रहा है कि यहां भी बुलडोज़र राज लागू होगा। यह खतरनाक मिसाल है।”सज्जाद लोन (PC)“यह चुनी हुई सरकार की अधिकार-हिन्ता है। CM को बताए बिना यह कार्रवाई प्रशासनिक अराजकता को जन्म देती है।”जितेंद्र सिंह (BJP)“अवैध कब्ज़ा हटाना प्रशासन का अधिकार है। अगर किसी ने अवैध निर्माण किया है, तो कानून अपना काम करेगा। इसे राजनीति से न जोड़ा जाए।”गुलाम नबी आज़ाद (DPAP)“राज्य दो सत्ता केंद्रों के बीच फंसा है—इससे जनता का ही नुकसान होगा। बुलडोज़र आखिरी कदम होना चाहिए, पहला नहीं।

राजनीतिक विश्लेषक क्या कहते हैं?राजनीति विशेषज्ञ प्रो. नदीम चट्ठा के अनुसार—“यह टकराव केवल बुलडोज़र का नहीं, बल्कि सत्ता-संतुलन का है।पहली बार चुनी हुई सरकार और LG प्रशासन का अधिकार क्षेत्र सार्वजनिक रूप से टकराया है। आने वाले दिनों में ‘कौन असली सरकार’ का सवाल और गहराएगा।”वरिष्ठ विश्लेषक रुचि कालिया कहती हैं—“अगर बुलडोज़र कार्रवाई एक समुदाय के खिलाफ लक्षित दिखती है, तो यह सरकार के लिए राजनीतिक जोखिम बनेगा।उमर इसे ‘साजिश’ और ‘टारगेटिंग’ बताकर नैरेटिव कंट्रोल करना चाहते हैं।”

क्या कश्मीर में दो सत्ता केंद्र बन गए हैं?

इस विवाद ने तीन गंभीर सवाल खड़े कर दिए—1. क्या प्रशासन, CM को दरकिनार कर फैसले ले रहा है?

2. क्या बुलडोज़र कार्रवाई राजनीतिक उपकरण बनती जा रही है?

3. क्या LG–सरकार टकराव आने वाले समय में नीतिगत गतिरोध पैदा करेगा?विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्य में अभी भी “डुअल पावर स्ट्रक्चर” मौजूद है—और यही संघर्ष का मूल कारण है।

निष्कर्ष —

बुलडोज़र की आवाज़ ने खोला सत्ता संघर्ष का दरवाज़ा

जम्मू-कश्मीर में बुलडोज़र एक्शन अब सिर्फ अवैध कब्जे की कार्रवाई नहीं रहा—वह राजनीतिक प्रतीक बन चुका है।उमर अब्दुल्ला और LG मनोज सिन्हा के बीच बढ़ती दूरीराज्य की राजनीतिक स्थिरता और प्रशासनिक तालमेल दोनों के लिए चुनौती बन सकती है।आगे आने वाले दिनों में इस मुद्दे परअदालत, विधानभवन और सड़क—तीनों मोर्चों पर गर्मी बढ़ना तय है।

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