ट्रंप का टैरिफ बोझ, वैश्विक उथल-पुथल और भारत का बजट दांव अनिश्चित दुनिया में स्थिरता की खोज करता बजट 2026

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 1 फरवरी

जब दुनिया एक बार फिर संरक्षणवाद, टैरिफ युद्ध और भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रही है, ऐसे समय में भारत का बजट 2026 केवल एक वार्षिक लेखा-जोखा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक दस्तावेज बनकर उभरा है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के साथ ही भारतीय उत्पादों पर बढ़े शुल्क, पश्चिम एशिया और यूक्रेन से लेकर दक्षिण चीन सागर तक फैली अस्थिरता, और वैश्विक मांग में सुस्ती—इन सबके बीच भारत सरकार के सामने सवाल है:

क्या सीमित संसाधनों में भी विकास की रफ्तार कायम रखी जा सकती है?

सरकार का पक्ष: “लोकलुभावन नहीं, दीर्घकालिक समाधान”

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण की पंक्तियों के बीच सरकार की मंशा साफ झलकती है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के शब्दों में,“यह बजट चुनावी नहीं, बल्कि अगले 25 वर्षों की नींव रखने वाला है।”सरकार ने राजकोषीय घाटे को जीडीपी के लगभग 4.4 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य दोहराया है। ऐसे समय में, जब कर कटौतियों से खजाने पर करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त दबाव है, यह संदेश दिया गया कि अनुशासन से समझौता नहीं होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “दीर्घकालिक समाधान” वाले दृष्टिकोण को यह बजट आगे बढ़ाता दिखता है—कम खर्च, ज्यादा भरोसा और संरचनात्मक सुधार।

अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषण: भारत का संतुलनकारी दांव

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रो. (डॉ.) अरुण सहगल मानते हैं कि बजट 2026 को वैश्विक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता।“ट्रंप का टैरिफ दबाव केवल व्यापारिक मुद्दा नहीं, बल्कि रणनीतिक संकेत है।

भारत का जवाब टकराव नहीं, बल्कि विविधीकरण है।

”यूरोपीय संघ के साथ प्रस्तावित ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ और अन्य बहुपक्षीय समझौते इसी रणनीति का हिस्सा हैं। बजट में निर्यात प्रोत्साहन, वैकल्पिक बाजारों की तलाश और लॉजिस्टिक्स सुधारों पर जोर इसी वैश्विक संतुलन नीति को दर्शाता है।

शिक्षाविदों की राय: सुधार बनाम संसाधन

अर्थशास्त्री और शिक्षाविद मानते हैं कि सरकार के पास बड़े पैमाने पर खर्च की गुंजाइश सीमित है। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संजय वर्मा के अनुसार,“यह बजट खर्च से ज्यादा नीति संकेतों का बजट है। निजी निवेश को खींचना अब सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

”श्रम कानूनों में लचीलापन, कर संरचना में सरलता और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को खोलने की पहल—

ये सभी संकेत देते हैं कि सरकार निजी क्षेत्र को विकास का इंजन मानकर चल रही है।

कानूनविदों का दृष्टिकोण: स्थिरता से भरोसा

कानूनी विशेषज्ञ इस बजट को नीति-निरंतरता के लिहाज से अहम मानते हैं। वरिष्ठ कानूनविद मनीष तिवारी के अनुसार,“वैश्विक निवेशक घोषणाओं से ज्यादा स्थिर कानून और स्पष्ट नियम चाहते हैं। बजट में यही संदेश देने की कोशिश है।

”टैक्स विवादों में कमी, रेगुलेटरी स्पष्टता और कॉन्ट्रैक्ट एनफोर्समेंट पर जोर

भारत की छवि को ‘विश्वसनीय निवेश गंतव्य’ के रूप में मजबूत करता है।

रक्षा विशेषज्ञ: आत्मनिर्भरता से रणनीतिक सुरक्षा

बजट 2026 में रक्षा उत्पादन और निर्यात पर विशेष नजर है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक जरूरत भी है।“जब दुनिया में सप्लाई चेन हथियार बन जाती है, तब आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन ही असली सुरक्षा कवच है,”एक पूर्व सैन्य अधिकारी का कहना है।निवेश नियमों में ढील और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा भारत को रक्षा उपकरणों के आयातक से निर्यातक बनाने की दिशा में कदम माना जा रहा है।

विपक्ष का हमला: “आम आदमी कहां?”

हालांकि विपक्ष इस बजट को लेकर आक्रामक है। कांग्रेस और वाम दलों का आरोप है कि सरकार ने महंगाई, बेरोजगारी और ग्रामीण संकट पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।एक विपक्षी नेता ने कहा,“यह बजट कॉरपोरेट भरोसे का है, आम आदमी की जेब का नहीं।”उनका तर्क है कि सीमित खर्च के नाम पर सामाजिक सुरक्षा और कल्याण योजनाओं को हाशिये पर रखा गया है।

निष्कर्ष:

शोर नहीं, संकेतों का बजट

बजट 2026 शायद बड़े लोकलुभावन ऐलानों के लिए याद न रखा जाए, लेकिन यह भारत की रणनीतिक सोच को जरूर रेखांकित करता है। ट्रंप के टैरिफ दबाव और वैश्विक अनिश्चितता के बीच सरकार ने यह दांव खेला है कि सुधार, स्थिरता और भरोसा ही भारत को सुरक्षित रखेंगे।यह बजट एक संदेश है—

दुनिया चाहे जितनी अस्थिर हो, भारत अपने रास्ते पर ठहराव नहीं, बल्कि संतुलित गति से आगे बढ़ना चाहता है।

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