तुर्किए फिर कश्मीर राग अलापने लगा: अंकारा संसद में एर्दोगान सरकार का भारत-विरोधी सुर तेज

बी के झा

नई दिल्ली / अंकारा, (तुर्किश ) 28 नवंबर

भारत की कूटनीतिक चेतावनियों और बार-बार की गई आपत्तियों के बावजूद तुर्किए एक बार फिर पाकिस्तान के साथ खड़े होने की अपनी पुरानी प्रवृत्ति पर लौट आया है। ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के दौरान इस्लामी एकजुटता के नाम पर पाकिस्तान का खुला समर्थन कर चुके तुर्किए ने अब कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाकर भारत की संप्रभुता और कूटनीतिक मर्यादाओं को चुनौती देने की कोशिश की है।अंकारा संसद में कश्मीर का अचानक उल्लेखअंकारा में 2026 के बजट सत्र के दौरान तुर्किए के विदेश मंत्री हकान फिदान ने दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय विवादों का उल्लेख करते हुए कश्मीर का मुद्दा हवा में उछाल दिया।

उन्होंने कहा—“कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय कानून और संवाद के आधार पर हल किया जाना चाहिए।”यह बयान न सिर्फ भारत की स्थिति के विरोध में है, बल्कि पाकिस्तान के पक्ष को दोहराने की कोशिश भी है। भारत का स्पष्ट मत रहा है कि“कश्मीर भारत का आंतरिक विषय है, और इस पर किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं।”

पाकिस्तान की हां में हां—तुर्किए की पुरानी नीतियह पहली बार नहीं है जब तुर्किए ने पाकिस्तान के हित में भारत की विदेश नीति पर चोट की हो।ऑपरेशन सिंदूर के दौरानसंयुक्त राष्ट्र में भाषणों मेंअंतरराष्ट्रीय मंचों पर एर्दोगान सरकार बार-बार कश्मीर मुद्दे को पाकिस्तान की तरफ झुककर पेश करती रही है।कूटनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि तुर्किए “इस्लामी भाईचारे” की राजनीति को अपने भू-राजनीतिक एजेंडे से जोड़कर चल रहा है, जिसमें भारत को अक्सर निशाना बनाया जाता है।

भारत का स्टैंड: “शिमला समझौते के बाद तीसरे पक्ष की दखल का सवाल ही नहीं”भारत की नीति स्पष्ट और सुस्पष्ट रही है—1972 के शिमला समझौते और 1999 के लाहौर घोषणापत्र के बाद कश्मीर भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय विषय है।किसी भी तीसरे देश, चाहे वह तुर्किए हो या संयुक्त राष्ट्र, की मध्यस्थता को भारत ने हमेशा सख्ती से खारिज किया है।

विदेश नीति

विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्किए का यह बयान एक “डिप्लोमैटिक प्रोपेगेंडा” है, जिसका लक्ष्यभारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका को चुनौती देनापाकिस्तान को नैरेटिवल सपोर्ट देनाऔर इस्लामी देशों में अपनी नेतृत्व छवि बनाए रखना है है एर्दोगान की दोहराई हुई रणनीति एर्दोगान इससे पहले भी संयुक्त राष्ट्र समेत कई मंचों पर कश्मीर का उल्लेख कर चुके हैं, और हर बार उनका सुर “मध्यस्थता”, “UN प्रस्ताव”, और “संवाद” के इर्द-गिर्द घूमता रहा है—जो पाकिस्तान के नैरेटिव से हूबहू मेल खाता है।हालाँकि, भारत ने हमेशा दो टूक कहा है—“कश्मीर भारत का हिस्सा है। भारत में जो संविधान लागू होता है, वह जम्मू-कश्मीर में भी लागू होता है—और रहेगा।”

कूटनीतिक स्तर पर क्या संकेत?

कई जानकार मानते हैं कि तुर्किए की यह सक्रियता तीन कारणों से प्रेरित है—

1. पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बचाए रखना

2. भारत की पश्चिमी एशिया में बढ़ती भूमिका से असहज होना

3. तुर्किए की घरेलू राजनीति में एर्दोगान का इस्लामी राष्ट्रवादी कार्ड खेलनाभारत–तुर्किए संबंध पिछले कई वर्षों से तनावपूर्ण बने हुए हैं, और कश्मीर जैसे विषयों पर तुर्किए की बयानबाज़ी भविष्य में इन्हें और जटिल बना सकती है।निष्कर्ष: तुर्किए की “कश्मीर डिप्लोमेसी” जारी,

भारत अपनी नीति पर अडिग

एर्दोगान सरकार भले ही कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के सुर में सुर मिला रही हो, लेकिन भारत की स्थिति कहीं अधिक मजबूत, स्थिर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य है।

भारत के कड़े रुख के कारण तुर्किए की यह बयानबाजी सिर्फ राजनीतिक प्रतीकवाद भर रह जाती है।फिलहाल, यह स्पष्ट है—तुर्किए कश्मीर पर अपनी पुरानी लकीर नहीं छोड़ रहा, और भारत अपनी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करने वाला।

NSK

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