तेल अवीव से यरुशलम तक: कूटनीति, संस्कृति और रणनीति का संगम, नरेंद्र मोदी के इज़रायल दौरे का दूसरा दिन और रात्रिभोज की वह झलक जिसने चौंकाया

बी के झा

NSK

तेल अवीव / नई दिल्ली, 26 फरवरी

भारत और इज़रायल के रिश्तों में एक और अध्याय जुड़ गया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दो-दिवसीय दौरे के दूसरे दिन रणनीतिक बैठकों, ऐतिहासिक स्मारकों और उच्चस्तरीय संवादों में व्यस्त रहे। पहले दिन एयरपोर्ट पर इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का प्रोटोकॉल तोड़कर स्वागत और इज़रायली संसद में संबोधन ने कूटनीतिक संकेत स्पष्ट कर दिए थे—यह संबंध अब केवल औपचारिक नहीं, बल्कि सामरिक और सांस्कृतिक साझेदारी में बदल चुका है।

रात्रिभोज की वह कूटनीतिक ‘सॉफ्ट पावर’ झलक

डिनर के दौरान नेतन्याहू ने भारतीय पारंपरिक परिधान पहनकर प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया। यह केवल परिधान परिवर्तन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक सम्मान का प्रतीक था। सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो में नेतन्याहू ने हिंदी में संदेश लिखते हुए इसे “मित्रता का संकेत” बताया।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह ‘सॉफ्ट डिप्लोमेसी’ का सशक्त उदाहरण है—जहां प्रतीकात्मक gestures रिश्तों को भावनात्मक गहराई देते हैं। एयरपोर्ट पर उनकी पत्नी द्वारा भगवा परिधान पहनना भी इसी सांस्कृतिक संकेत की कड़ी माना जा रहा है।

दूसरा दिन: स्मृति और रणनीति

प्रधानमंत्री मोदी और नेतन्याहू ने यरुशलम स्थित Yad Vashem में होलोकॉस्ट पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी। यह दौरा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि इतिहास और मानवीय संवेदनाओं को सम्मान देने का संदेश था।इसके बाद प्रधानमंत्री ने इज़रायल के राष्ट्रपति इसाक हरजोग से मुलाकात की। रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कृषि-तकनीक और जल प्रबंधन सहित कई क्षेत्रों में समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर की संभावना जताई गई।

रक्षा विशेषज्ञों की नजर: सामरिक गहराई

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-इज़रायल संबंधों की असली मजबूती रक्षा सहयोग में है। ड्रोन तकनीक, मिसाइल सिस्टम, साइबर सुरक्षा और खुफिया सहयोग—ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां दोनों देश एक-दूसरे के पूरक हैं।एक पूर्व सैन्य अधिकारी का विश्लेषण:“इज़रायल भारत को अत्याधुनिक रक्षा तकनीक देता है, जबकि भारत एक बड़ा रणनीतिक और आर्थिक भागीदार है। यह साझेदारी क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को भी प्रभावित करती है।”पश्चिम एशिया में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों—ईरान, खाड़ी देशों और अब्राहम समझौतों—के बीच भारत संतुलन साधते हुए इज़रायल के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया: संतुलन पर सवाल

विपक्षी दलों ने जहां सांस्कृतिक और कूटनीतिक पहल की सराहना की, वहीं कुछ नेताओं ने यह प्रश्न उठाया कि क्या भारत पश्चिम एशिया में अपनी पारंपरिक ‘संतुलन नीति’ से हट रहा है?

उनका कहना है कि फिलिस्तीन मुद्दे पर भारत की ऐतिहासिक भूमिका और अरब देशों के साथ संबंधों को भी समान महत्व मिलना चाहिए।हालांकि सरकार का स्पष्ट रुख है कि भारत “मल्टी-अलाइनमेंट” की नीति पर चलता है।

सभी पक्षों से मित्रता, लेकिन राष्ट्रीय हित सर्वोपरि।

सरकार का पक्ष: ‘रणनीतिक साझेदारी का स्वर्णकाल’

विदेश मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, यह दौरा दोनों देशों के बीच 360-डिग्री साझेदारी को मजबूत करने वाला है। सरकार का दावा है कि कृषि-तकनीक और जल प्रबंधन में इज़रायल के मॉडल से भारत के कई राज्यों को सीधा लाभ मिल रहा है।AI और स्टार्टअप सहयोग को भविष्य का स्तंभ बताया जा रहा है, जिससे युवाओं और तकनीकी क्षेत्र को नई संभावनाएं मिलेंगी।कूटनीति का व्यापक संदेशनेसेट में प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन और सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किया जाना इस बात का संकेत है कि इज़रायल भारत को केवल एक साझेदार नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर प्रभावशाली शक्ति के रूप में देख रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह दौरा तीन स्तरों पर संदेश देता है:रणनीतिक – रक्षा और तकनीक में गहराई।आर्थिक – व्यापार और निवेश का विस्तार।सांस्कृतिक – प्रतीकों के माध्यम से भावनात्मक जुड़ाव।

निष्कर्ष:

मित्रता का नया अध्याय

तेल अवीव के रात्रिभोज से लेकर यरुशलम के स्मारक तक—यह दौरा केवल कूटनीतिक कैलेंडर की एक प्रविष्टि नहीं, बल्कि भारत-इज़रायल संबंधों के विकसित होते आयामों का प्रमाण है।जहां एक ओर रक्षा विशेषज्ञ इसे सामरिक मजबूती का संकेत मानते हैं, वहीं राजनीतिक विश्लेषक इसे भारत की उभरती वैश्विक भूमिका का प्रतीक बताते हैं।

अंततः, यह यात्रा यह दर्शाती है कि 21वीं सदी की कूटनीति में केवल समझौते ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सम्मान और व्यक्तिगत विश्वास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

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