बी के झा
NSK


नई दिल्ली, 12 दिसंबर
कांग्रेस के भीतर एक बार फिर सियासी बेचैनी गहराई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा बुलाई गई महत्वपूर्ण रणनीतिक बैठक से शशि थरूर के लगातार तीसरी बार अनुपस्थित रहने ने न सिर्फ सवाल खड़े किए, बल्कि पार्टी नेतृत्व की चिंता भी बढ़ा दी है। इस बार दिलचस्प बात यह रही कि चंडीगढ़ के सांसद मनीष तिवारी भी बैठक में नहीं पहुंचे, जिससे कांग्रेस की आंतरिक असहमति और स्पष्ट दिखाई देने लगी है।क्या यह महज़ संयोग है या संकेत?दिल्ली के संसद भवन एनेक्सी में आयोजित इस बैठक में शीतकालीन सत्र की रणनीति, विपक्षी एकजुटता और सरकार को घेरने के मुद्दों पर चर्चा हुई। अधिकतर सांसद मौजूद थे, लेकिन थरूर और तिवारी दोनों की गैरहाज़िरी ने राजनीतिक गलियारों में नई अटकलें पैदा कर दी हैं।
सोशल मीडिया टाइमलाइन के अनुसार, थरूर बैठक से एक दिन पहले कोलकाता के एक कार्यक्रम में थे। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह केवल ‘शेड्यूल क्लैश’ नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर बढ़ते वैचारिक मतभेदों का संकेत है।राजनीतिक विश्लेषकों की राय: “थरूर का ‘दूरी बनाना’ रणनीतिक है, आकस्मिक नहीं”दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. समरेश पटनायक कहते हैं—”
थरूर बार-बार बैठक से नदारद रहकर यह जता रहे हैं कि वह ‘फॉलोअर’ नहीं, बल्कि ‘फैक्टर’ हैं। वह मोदी सरकार की नीतियों की तारीफ कर चुके हैं, जिससे कांग्रेस की पारंपरिक विचारधारा की रेखाएं धुंधली होती दिखती हैं। ये अनुपस्थिति भविष्य की एक बड़ी राजनीतिक चाल का भी संकेत हो सकती है।”वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अपूर्वानंद मिश्रा का मत है—”
कांग्रेस आज दो धाराओं में बंटी दिखती है—एक राहुल गांधी केंद्रित नेतृत्व और दूसरी ‘थिंक-टैंक’ धारा, जिसका चेहरा शशि थरूर व मनीष तिवारी जैसे नेता हैं। दोनों का एक साथ अनुपस्थित रहना ‘संदेश’ है कि असहमति अब दबकर नहीं, खुलकर सामने आएगी।”शिक्षाविदों ने जताई चिंता: “विपक्ष को मजबूत आवाज़ की ज़रूरत, न कि बिखरे नेतृत्व की”जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की राजनीति शिक्षाविद डॉ. रश्मि वर्मा कहती हैं—
“यह समय विपक्ष के संगठनात्मक अनुशासन का है। संसद के महत्वपूर्ण सत्र में कांग्रेस के भीतर ऐसी असहमति उसकी विश्वसनीयता को कमजोर कर सकती है। अगर शशि थरूर जैसे बौद्धिक नेता दूरी बढ़ाते हैं तो कांग्रेस की वैचारिक रीढ़ कमजोर होगी।”
विपक्षी दलों ने उठाए तीखे सवाल भाजपा का तंज:भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा—”कांग्रेस अपने ही घर को नहीं संभाल पा रही। राहुल गांधी नेतृत्व कर नहीं सकते—यह बात उनके ही सांसद बता रहे हैं।”टीएमसी की प्रतिक्रिया:टीएमसी नेता कुनाल घोष बोले—”
कांग्रेस का यह आंतरिक असंतोष विपक्षी एकता को नुकसान पहुंचाता है। थरूर जैसे नेता को वह सम्मान नहीं मिलता जिसके वह हकदार हैं।”आप की टिप्पणी:आप नेता संजय सिंह ने कहा—
“कांग्रेस में फैसला राहुल गांधी करते हैं, लेकिन असहमति का स्पेस निल है। यह लोकतांत्रिक पार्टी का लक्षण नहीं है।”कांग्रेस का आधिकारिक रुख: “कुछ भी असामान्य नहीं”पार्टी सूत्रों ने बताया कि—”
शशि थरूर का कार्यक्रम पहले से तय था। यह राजनीति नहीं, महज़ तकनीकी कारण था।”लेकिन अंदरखाने यह भी माना जा रहा है कि थरूर की “बौद्धिक स्वतंत्रता” और “अलग राजनीतिक छवि” पार्टी रणनीति के साथ कई बार असहज तालमेल पैदा करती है।क्या यह कांग्रेस की ‘आंतरिक तकरार’ का नया अध्याय है?पिछले एक महीने में:•
तीन रणनीतिक बैठकों में थरूर गैर-हाज़िर रहे•
मनीष तिवारी की भी अनुपस्थिति• थरूर द्वारा कई बार मोदी सरकार की नीतियों की खुली प्रशंसा• केरल कांग्रेस में थरूर बनाम वेणुगोपाल का टकराव•
केरल चुनाव 2026 में थरूर की महत्वाकांक्षाएं ये सभी घटनाएँ मिलकर यह संकेत दे रही हैं कि कांग्रेस के भीतर ‘सहमति नहीं, संघर्ष’ की स्थिति है।
क्या थरूर अगला बड़ा कदम उठा सकते हैं?
विश्लेषकों के अनुसार चार संभावनाएँ बनती हैं:
1. कांग्रेस से दूरी बनाकर अपना अलग राजनीतिक मार्ग अपनाएं
2. यूडीएफ के भीतर अधिक बड़ी भूमिका की मांग रखें
3. केरल में सीएम फेस के रूप में खुद को प्रोजेक्ट करें
4. कांग्रेस हाईकमान को आंतरिक सुधार के लिए अप्रत्यक्ष दबाव डालें
निष्कर्ष: ‘
दूरी’ से ज्यादा ‘संकेत’ है यह शशि थरूर की अनुपस्थिति अब केवल ‘ग़ैर हाज़िरी’ नहीं, बल्कि ‘राजनीतिक संकेत’ बन चुकी है।और मनीष तिवारी की गैरहाज़िरी ने इस संकेत को और अधिक स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस के भीतर एक नई राजनीति आकार ले रही है—
जहाँ असहमति दबाई नहीं, जताई जा रही है।आने वाले महीनों में कांग्रेस को यह तय करना होगा कि क्या वह इस असहमति को संभाल पाएगी या यह उसके भीतर नई दरारें पैदा करेगी।
