बी के झा
NSK



दरभंगा ( बिहार ) 19 जनवरी
भारतीय इतिहास में कुछ रियासतें केवल सत्ता या संपत्ति के कारण नहीं, बल्कि अपने वैचारिक कद, सांस्कृतिक योगदान और मौन त्रासदियों के कारण याद रखी जाती हैं। दरभंगा राज उन्हीं में से एक था।हाल ही में 96 वर्ष की आयु में महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के साथ ही इस राजवंश की जीवित स्मृति भी इतिहास के पन्नों में समा गई। उनके जाने के साथ समाप्त हुआ एक ऐसा अध्याय, जिसमें असीम वैभव था, अनकहे रहस्य थे और धीरे-धीरे होता हुआ पतन भी।
निजी ट्रेन, निजी टर्मिनल और शाही वैभव
बीसवीं सदी के आरंभ में दरभंगा राज भारत की सबसे समृद्ध और प्रभावशाली रियासतों में गिना जाता था।बिहार और बंगाल में फैले सैकड़ों वर्ग मील क्षेत्र, लगभग 4,495 गांव, और इतनी अपार संपदा कि दरभंगा के महाराजा को उस समय भारत का तीसरा सबसे धनी व्यक्ति माना जाता था।नरगोना, रामबाग, राजनगर और बेला के महल यूरोपीय स्थापत्य शैली की भव्यता से दमकते थे।महाराजा के पास निजी रेलवे सैलून और निजी रेलवे टर्मिनल था, जहां उनकी विशेष ट्रेन सीधे महल तक आती थी।शाही गैराज में रोल्स-रॉयस, बेंटले और पैकार्ड जैसी गाड़ियां खड़ी रहती थीं—यह वैभव उस दौर केऔपनिवेशिक भारत में भी असाधारण था।
राजवंश की नींव: महाराजा रामेश्वर सिंह
इस वैभवशाली राज की नींव रखी महाराजा रामेश्वर सिंह ने, जिन्होंने 1898 से 1929 तक शासन किया।वे केवल एक सामंत नहीं, बल्कि शिक्षित और प्रगतिशील दृष्टि वाले शासक थे। उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी और अपनी पत्नी को छपरा, मुंगेर और भागलपुर जैसे जिलों में प्रशासनिक भूमिकाओं में साथ रखा—जब पर्दा प्रथा समाज की कठोर सच्चाई थी।
हालांकि समाज के विरोध के कारण उन्हें कुछ समय पीछे हटना पड़ा, लेकिन जैसे-जैसे उनका प्रभाव बढ़ा, उनकी पत्नी पुनः सार्वजनिक जीवन में उनके साथ दिखाई देने लगीं।अपने समय में यह कदम सामाजिक क्रांति से कम नहीं था।
युवा महाराजा कामेश्वर सिंह: राज से राष्ट्र तक
28 नवंबर 1907 को जन्मे महाराजा कामेश्वर सिंह ने मात्र 21 वर्ष की आयु में गद्दी संभाली।वे उस पीढ़ी के राजा थे, जो केवल राजसी ठाठ के नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और आधुनिक विचारधारा के परिचायक थे।23 वर्ष की उम्र में उन्होंने लंदन में आयोजित राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में भाग लिया। वे भारत की संविधान सभा के सदस्य बने और उस संविधान के निर्माण में योगदान दिया, जिसने आगे चलकर उनके ही शाही अधिकारों को समाप्त कर दिया—यह लोकतंत्र के प्रति एक असाधारण नैतिक प्रतिबद्धता थी।वे महात्मा गांधी से गहरे प्रभावित थे। कहा जाता है कि उन्होंने एक प्रसिद्ध अंग्रेज चित्रकार से गांधीजी का चित्र भी बनवाया था।उन्होंने राज्यसभा में सेवा दी, राष्ट्रीय मंचों पर बिहार का प्रतिनिधित्व किया और ऐसे कानूनी संघर्ष लड़े, जिनसे संविधान में संशोधन तक हुए।लेकिन सार्वजनिक जीवन की चमक के पीछे उनका निजी जीवन गहरे अंतर्विरोधों और पीड़ा से भरा था।
पहली महारानी: मौन त्रासदी की डायरी
महारानी राजलक्ष्मी देवी महाराजा की पहली पत्नी थीं। एक किशोर वधू के रूप में वे दरभंगा आईं, बिना यह जाने कि उनका वैवाहिक जीवन एक लंबा, शांत और दर्दनाक एकांत बन जाएगा।1925 से उन्होंने नियमित रूप से डायरी लिखनी शुरू की।लगभग 34 वर्षों तक इन डायरियों में महल की ऊंची दीवारों के भीतर की दुनिया दर्ज होती रही।1934 में—जिन कारणों का आज तक आधिकारिक खुलासा नहीं हुआ—महाराजा और महारानी राजलक्ष्मी के बीच अलगाव हो गया।इसके बाद वे 42 वर्षों तक महल परिसर में ही रहीं।उनकी डायरियां आज भी इतिहासकारों के लिए एक ऐसा दस्तावेज़ हैं, जो शायद एक दिन बताएगा कि 1934 में वास्तव में क्या हुआ था।
दूसरी महारानी: आधुनिकता की अल्पायु चमक
1934 में ही महाराजा ने दूसरा विवाह किया। महारानी कामेश्वरी प्रिया शिक्षित, आत्मविश्वासी और आधुनिक विचारों वाली थीं।महाराजा ने विशेष रूप से महाराष्ट्र से गंगा बाई को बुलवाया, ताकि वे महारानी को सामाजिक और प्रशासनिक जीवन के लिए प्रशिक्षित कर सकें।महारानी कामेश्वरी प्रिया ने राजनेताओं, राजघरानों और प्रशासनिक बैठकों में महाराजा का साथ दिया। वे दरभंगा राज की कार्यप्रणाली को समझने लगीं और महाराजा उनसे अत्यंत प्रसन्न थे।लेकिन यह साथ अल्पकालिक रहा—सात-आठ वर्षों के भीतर ही उनका निधन हो गया।
अंतिम महारानी: कामसुंदरी देवी
दूसरी पत्नी की मृत्यु के बाद महाराजा ने लगभग दो वर्षों तक पुनर्विवाह से इंकार किया।अंततः राजमाता के आग्रह पर 1943 (कुछ स्रोत 1940) में उनका तीसरा विवाह हुआ। कल्याणी जी, जो विवाह के बाद महारानी काम सुंदरी देवी कहलाईं, महाराजा से काफी छोटी थीं। वे आधुनिक सामाजिक जीवन में पूरी तरह सहज नहीं थीं, लेकिन उनमें फोटोग्राफी का गहरा शौक था।1943 से 1962 तक—लगभग 19 वर्षों तक—उन्होंने महाराजा के साथ भारत की सबसे बड़ी रियासतों में से एक का संचालन किया।यह वही दौर था जब भारत आज़ादी की दहलीज़ पर था और फिर स्वतंत्रता के बाद के राजनीतिक-सामाजिक उथल-पुथल से गुजर रहा था।महारानी ने कैमरे के ज़रिये महल जीवन को दर्ज किया और मिथिला की पारंपरिक रानी की भूमिका निभाई।
महाराजा की रहस्यमय मृत्यु
1 अक्टूबर 1962 को महाराजा दुर्गा पूजा के लिए दरभंगा पहुंचे।वे कलकत्ता के मिडलटन स्ट्रीट स्थित दरभंगा हाउस से अपने निजी रेलवे सैलून द्वारा नरगोना पैलेस पहुंचे।54 वर्ष की उम्र में वे स्वस्थ, प्रसन्न और सक्रिय दिखाई दे रहे थे।लेकिन उसी सुबह वे अपने सुइट के बाथरूम में बाथटब में मृत पाए गए।यह खबर न केवल भारत, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चौंकाने वाली थी।एक स्वस्थ व्यक्ति की ऐसी अचानक मृत्यु—वह भी बिना किसी जांच के—आज तक सवालों के घेरे में है।उसी दिन, दोनों महारानियों की उपस्थिति में, माधवेश्वर में अंतिम संस्कार कर दिया गया।मृत्यु का कारण हृदयाघात बताया गया।कोई जांच नहीं हुई। कोई सवाल दर्ज नहीं हुए।दिलचस्प तथ्य यह है कि महाराजा ने 5 जुलाई 1961 को, मृत्यु से ठीक एक वर्ष पहले, अपनी वसीयत लिख दी थी—मानो उन्हें किसी अनहोनी का आभास हो।उत्तराधिकार और अकेली रानी महाराजा की कोई संतान नहीं थी।उनके भाई राजा बहादुर विश्वेश्वर सिंह पहले ही दिवंगत हो चुके थे, जिनके तीन पुत्र थे।वसीयत में दोनों महारानियों के जीवनयापन की व्यवस्था की गई।
दिल्ली स्थित दरभंगा हाउस के सरकारी अधिग्रहण के बाद, महारानी कामसुंदरी देवी एक छोटे आउटहाउस में रहने लगीं।दरभंगा में वे लगभग 1980 तक नरगोना पैलेस में रहीं, फिर उनके लिए कल्याणी हाउस बनाया गया।
अंतिम विदाई: एक युग का अवसान
96 वर्ष की आयु में महारानी कामसुंदरी देवी का निधन हुआ।उनके साथ ही समाप्त हो गया दरभंगा राज का अंतिम जीवित अध्याय—
एक ऐसा अध्याय जिसमें अपार वैभव था, अनकहे रहस्य थे और इतिहास की गहरी छायाएं थीं।दरभंगा राज अब सत्ता में नहीं है, लेकिन उसकी कहानी—
वैभव, त्याग, रहस्य और पतन की यह गाथा—भारतीय इतिहास में सदैव दर्ज रहेगी।
