बी के झा
दरभंगा ( बिहार ) 12 फरवरी
दरभंगा के विश्वविद्यालय थाना क्षेत्र अंतर्गत सुंदरपुर इलाके में छह साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या की दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे बिहार को झकझोर दिया है। इस जघन्य अपराध के बाद जहां एक ओर समाज में गुस्सा और शोक है, वहीं दूसरी ओर जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने इस घटना को लेकर राज्य की कानून-व्यवस्था पर तीखा और सीधा हमला बोला है।पीड़ित परिवार से मुलाकात के बाद प्रशांत किशोर ने स्पष्ट शब्दों में कहा—“बिहार में बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। यहां अधिकारियों का जंगलराज चल रहा है।”
उन्होंने परिवार को न्याय दिलाने का भरोसा दिया, लेकिन साथ ही प्रशासनिक तंत्र की भूमिका पर गंभीर सवाल भी खड़े किए।“
घटनाएं नहीं रुक रहीं, सिर्फ बयान बदल रहे हैं
”मीडिया से बातचीत में प्रशांत किशोर ने कहा कि यह कोई एक घटना नहीं है।उन्होंने बीते दो–तीन महीनों में सामने आई घटनाओं की श्रृंखला गिनाई—पटना में नीट छात्रा की संदिग्ध मौत मधेपुरा, खगड़िया, पूर्णिया और अब दरभंगा में दुष्कर्म के बाद हत्या जैसी घटनाएं उनका कहना था कि“अपराधी पकड़े जाएं, यह जरूरी है, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि अपराध के खिलाफ आवाज उठाने वालों को ही जेल भेजा जा रहा है।”
पुलिस कार्रवाई पर सवाल: “अपराध के बाद विरोध करने वाले ही अपराधी?
”प्रशांत किशोर ने आरोप लगाया कि दरभंगा की इस घटना के बाद जब स्थानीय लोग शांतिपूर्ण तरीके से सड़क पर उतरे और प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन किया, तो पुलिस ने पहले उन्हीं लोगों पर कार्रवाई की।उन्होंने कहा—दरभंगा में छह लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया,लेकिन किसी भी पुलिसकर्मी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई,जबकि यदि इतनी भयावह घटना हुई ही नहीं होती, तो पुलिस से झड़प की नौबत ही क्यों आती?
उनका आरोप है कि लगातार छापेमारी और गिरफ्तारियों से पूरे इलाके में डर का माहौल बन गया है और आम लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।“
असली दोषियों को सजा दो, डरे हुए लोगों को नहीं”
प्रशांत किशोर ने सरकार से मांग की कि—जिन 30 से अधिक लोगों के फरार या डर के मारे छिपे होने की बात कही जा रही है,उनके खिलाफ अंधाधुंध कार्रवाई न की जाए,बल्कि असली दोषियों की पहचान कर उन्हें जल्द से जल्द कठोर सजा दी जाए।उन्होंने कहा कि“एक तरफ इतनी दर्दनाक घटना हुई है और दूसरी तरफ पुलिस की कार्रवाई आम लोगों में असुरक्षा को और बढ़ा रही है। यह प्रशासनिक संवेदनहीनता का साफ उदाहरण है।”
गृहमंत्री पर सीधा हमला: “कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त”
प्रशांत किशोर ने इस मामले में सीधे भाजपा कोटे से उपमुख्यमंत्री सह गृहमंत्री सम्राट चौधरी को निशाने पर लिया।उनका आरोप था—जब से बिहार की कानून-व्यवस्था की कमान सम्राट चौधरी के हाथों में आई है,राज्य में अपराध, भ्रष्टाचार, रंगदारी और जमीन कब्जे के मामलों में बेहिसाब बढ़ोतरी हुई है,और यह सब गृहमंत्री के संरक्षण में फल-फूल रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय: “यह सिर्फ अपराध नहीं, सत्ता की परीक्षा है”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला अब केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा।एक वरिष्ठ विश्लेषक के अनुसार—“जब बच्चों के खिलाफ अपराध बढ़ते हैं और सरकार की प्रतिक्रिया कठोर के बजाय रक्षात्मक दिखती है, तो जनता का भरोसा टूटता है। यह सत्ता के नैतिक आधार की परीक्षा होती है।”उनका कहना है कि प्रशांत किशोर का यह बयान सीधे तौर पर 2025–26 की राजनीतिक जमीन तैयार करने की रणनीति का हिस्सा भी है, जहां कानून-व्यवस्था बड़ा मुद्दा बनने वाला है।
कानूनविदों का सवाल: जवाबदेही तय क्यों नहीं?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि दुष्कर्म और हत्या जैसे जघन्य अपराधों में पुलिस की शुरुआती भूमिका सबसे अहम होती है।उनका सवाल है—
क्या घटना के बाद त्वरित कार्रवाई हुई?
क्या पीड़ित परिवार को पर्याप्त सुरक्षा और संवेदनशील व्यवहार मिला?
क्या पुलिसिया कार्रवाई प्रदर्शनकारियों पर केंद्रित थी या अपराधियों पर?
एक वरिष्ठ अधिवक्ता कहते हैं—“न्याय सिर्फ सजा से नहीं, बल्कि प्रक्रिया की निष्पक्षता से भी होता है।
”शिक्षाविदों और समाजसेवियों की चिंता:
बच्चों की सुरक्षा पर बड़ा संकट
शिक्षाविद और बाल अधिकारों से जुड़े समाजसेवी इस घटना को सामाजिक विफलता मानते हैं।उनका कहना है कि—बच्चों की सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं,बल्कि स्कूल, समाज और प्रशासन — तीनों की साझा जिम्मेदारी है।
स्थानीय समाजसेवियों का आरोप है कि ऐसी घटनाओं के बाद प्रशासन पीड़ित के दर्द से ज्यादा अपनी छवि बचाने में जुट जाता है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया: “बिहार फिर उसी रास्ते पर?
”विपक्षी दलों ने इस घटना को लेकर सरकार पर तीखा हमला किया है।उनका कहना है कि—यदि बेटियों के लिए न्याय मांगने वालों को जेल भेजा जा रहा है,तो यह स्थिति लोकतंत्र और कानून दोनों के लिए खतरनाक संकेत है।
निष्कर्ष:
सवाल सिर्फ अपराध का नहीं, शासन की संवेदनशीलता का
दरभंगा की यह घटना बिहार के लिए एक और चेतावनी है।छह साल की बच्ची के साथ हुआ यह अपराध केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्किराज्य की कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक संवेदनशीलता और राजनीतिक जवाबदेही की कठोर परीक्षा है।
प्रशांत किशोर के शब्दों में उठाया गया सवाल अब समाज के सामने है—क्या बिहार की बेटियां सुरक्षित हैं, या फिर सुरक्षा सिर्फ कागजों और बयानों तक सीमित रह गई है?
इस सवाल का जवाब केवल बयान से नहीं, बल्कि न्याय, पारदर्शिता और जिम्मेदारी से ही मिलेगा।
NSK

