बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 4 मार्च
उत्तर-पश्चिमी दिल्ली में एक 13 वर्षीय बच्ची की कस्टडी को लेकर विवाद ने गंभीर कानूनी और संवैधानिक सवाल खड़े कर दिए हैं। 51 वर्षीय पिता ने आरोप लगाया है कि दिल्ली पुलिस के 10 से अधिक जवानों ने उनकी बेटी को “जबरन उठाकर” ले जाया, जबकि मामला अदालत में लंबित था। पुलिस की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सीमित है; एक वरिष्ठ अधिकारी ने जांच की बात कही है।
घटनाक्रम:
बाजार से CWC दफ्तर और फिर चिल्ड्रन्स होमपिता का दावा है कि मंगलवार दोपहर करीब 2:30 बजे वे अपनी बेटी के साथ बाजार में थे, तभी कुछ लोग—जिनमें सादे कपड़ों में भी कर्मी शामिल थे—उन्हें घेरकर ले गए। उनका आरोप है कि फोन छीन लिया गया और उन्हें एक कार में बैठा दिया गया।आरोप के अनुसार बच्ची को बाल कल्याण समिति (CWC) के पश्चिमी कार्यालय ले जाया गया, जहां उसे लगभग एक घंटे तक बंद कमरे में रखा गया और बाद में चिल्ड्रन्स होम भेज दिया गया। पिता का कहना है कि उन्हें बच्ची की वर्तमान लोकेशन और सेहत के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई।
कानूनी पेंच:
फैमिली कोर्ट, CWC और POCSOमामला
पति-पत्नी के बीच कस्टडी विवाद से जुड़ा है। फैमिली कोर्ट ने हाल में बच्ची की कस्टडी मां को दी थी। दूसरी ओर, पिता का कहना है कि पहले के आदेशों के तहत बच्ची तीन वर्षों से उनके साथ रह रही थी और उसे पुलिस सुरक्षा भी मिली हुई थी, क्योंकि उसने अपनी मां के साथ रहने वाले एक पारिवारिक सदस्य के खिलाफ POCSO Act के तहत शिकायत दर्ज कराई थी।पिता का तर्क है कि Juvenile Justice Act के तहत CWC को बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) को प्राथमिकता देनी चाहिए और बच्चे की इच्छा की अनदेखी नहीं की जा सकती।बच्ची ने फैमिली कोर्ट के आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में यह दलील दी गई है कि POCSO पीड़िता के मामले में निचली अदालत की अधिकार-सीमा पर प्रश्नचिह्न है। सुनवाई आंशिक रूप से हुई और अगली तारीख तय थी, किंतु अदालत के अवकाश के बीच कार्रवाई हो जाने का आरोप लगाया गया है।
पुलिस का पक्ष
दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि मामले की जांच की जा रही है। आधिकारिक बयान में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कार्रवाई किस आदेश के अनुपालन में की गई और क्या सभी प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं—जैसे महिला पुलिस अधिकारी और चाइल्ड काउंसलर की उपस्थिति—का पालन हुआ।
कानूनविदों की राय: प्रक्रिया ही न्याय की रीढ़
वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मत है कि कस्टडी विवाद में अदालत के आदेश सर्वोपरि होते हैं, परंतु जहां समानांतर रूप से POCSO और जुवेनाइल जस्टिस से जुड़े आदेश हों, वहां संस्थाओं के बीच समन्वय अत्यंत आवश्यक है।कानूनविदों के अनुसार:बच्चे की इच्छा और सुरक्षा सर्वोच्च मानक हैं।बल प्रयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए और उसका विस्तृत रिकॉर्ड अनिवार्य है।मजिस्ट्रियल जांच से तथ्यों की निष्पक्ष पड़ताल हो सकती है।वे यह भी जोड़ते हैं कि न्यायालयों के अवकाश के दौरान तात्कालिक कार्रवाई की आवश्यकता हो तो उसके ठोस कारण सार्वजनिक रिकॉर्ड में होने चाहिए।
शिक्षाविदों की दृष्टि: संवेदनशीलता बनाम संस्थागत कठोरता
बाल-अधिकार के क्षेत्र में कार्यरत शिक्षाविदों का कहना है कि कस्टडी के मामलों में प्रशासनिक दक्षता के साथ भावनात्मक संवेदनशीलता भी जरूरी है। 13 वर्ष की आयु में बच्ची की मनोवैज्ञानिक स्थिति, उसकी गवाही और विश्वास-परक माहौल—इन सबका ध्यान रखना चाहिए।एक प्रोफेसर का कहना है, “संस्थाएं यदि ‘कानूनी पालन’ को ही अंतिम लक्ष्य मान लें और बच्चे की आवाज़ को गौण कर दें, तो न्याय अधूरा रह जाता है।”
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: जवाबदेही की मांग
विपक्षी दलों ने इस घटना पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि आरोप सही हैं तो यह प्रक्रिया की गंभीर चूक है और उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। कुछ नेताओं ने दिल्ली सरकार से स्पष्ट रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।सत्ता पक्ष के सूत्रों का कहना है कि मामला न्यायालयों में लंबित है और तथ्यों के सामने आने से पहले निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।व्यापक प्रश्नयह विवाद कई मूलभूत प्रश्न उठाता है—जब विभिन्न अदालतों और संस्थाओं के आदेश परस्पर प्रभावित करते हों, तो अंतिम प्राथमिकता किसे मिले?
क्या बच्चे की इच्छा को पर्याप्त महत्व दिया गया?
क्या बल प्रयोग और गोपनीयता के बीच संतुलन बना रहा?
निष्कर्ष:
न्याय की कसौटी पर संस्थाएं
कस्टडी विवाद केवल कानूनी तकनीक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना की भी परीक्षा है। इस प्रकरण में अदालतों, CWC और पुलिस—सभी की भूमिका जांच के दायरे में है।
अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इसी में है कि आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, प्रक्रियाएं पारदर्शी हों और सबसे बढ़कर—
एक नाबालिग के अधिकार और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बने रहें।
