बी.के. झा
NSK

पटना,/ बिहार शरीफ,31 अक्टूबर
बिहार विधानसभा चुनाव के महासमर में इंडिया गठबंधन के भीतर चल रहे दोस्ताना संघर्ष ने अब नया मोड़ ले लिया है। वामपंथी राजनीति की मुखर आवाज भाकपा (माले) ने शुक्रवार को साफ ऐलान किया कि वह बछवाड़ा सीट पर भाकपा (CPI) का साथ देगी, जबकि बिहारशरीफ और राजापाकड़ में कांग्रेस प्रत्याशियों को समर्थन देगी। यह फैसला गठबंधन के भीतर तालमेल को बचाने और भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता को बनाए रखने के मकसद से लिया गया है।भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा,कुछ सीटों पर महागठबंधन के घटक दलों के बीच दोस्ताना संघर्ष है, लेकिन हमारा लक्ष्य एक है — भाजपा को सत्ता से बाहर करना और बिहार में परिवर्तन की नई शुरुआत करना। माले का समर्थन पूरी तरह गठबंधन की मजबूती के लिए है।”उन्होंने यह भी जोड़ा कि बछवाड़ा, बिहारशरीफ और राजापाकड़ जैसी सीटों पर भले ही मित्र दलों के उम्मीदवार आमने-सामने हों, लेकिन मतदाता भ्रमित न हों — गठबंधन की नीयत और दिशा साफ है। उन्होंने दावा किया,14 नवंबर को बिहार में महागठबंधन की सरकार बनेगी। जनता इस बार परिवर्तन के मूड में है।”
CPI का पलटवार: कांग्रेस प्रत्याशी को बताया “भाजपा एजेंट”इधर भाकपा (CPI) ने बछवाड़ा सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार गरीब दास को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्टी के राज्य सचिव रामनरेश पांडेय ने कहा,गरीब दास की राजनीति भाजपा की सहायता से ही चलती है।
2020 के चुनाव में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार बनकर भाजपा की मदद की थी, और 2024 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने अंदरखाने से भाजपा प्रत्याशी को फायदा पहुंचाया।”उ
न्होंने यहां तक कहा कि गरीब दास की भाजपा उम्मीदवार से हाल ही में मुलाकात की जानकारी मिली है, जो कांग्रेस प्रत्याशी के इरादों पर सवाल उठाती है। भाकपा का दावा है कि गरीब दास का परिवार वर्षों से “भाजपा समर्थक नेटवर्क” का हिस्सा रहा है।पांडेय ने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए कहा,फरवरी 2005 के चुनाव में जब राजद-कांग्रेस का गठबंधन हुआ था, तब भी कांग्रेस नेता रामदेव राय ने भाजपा से मदद लेकर बागी रुख अपनाया था। यह इतिहास दोहराया जा रहा है।”
“दोस्ताना संघर्ष” या “वैचारिक तनाव”?
बिहार में महागठबंधन का “दोस्ताना संघर्ष” अब वास्तविक वैचारिक परीक्षा बन गया है। इंडिया गठबंधन के भीतर एक ओर वैचारिक समानता और भाजपा विरोध का साझा एजेंडा है, वहीं दूसरी ओर सीटों पर स्थानीय नेताओं की निजी महत्वाकांक्षाएं तालमेल की राह में रोड़ा बन रही हैं।हालांकि माले का यह फैसला — “सीपीआई और कांग्रेस दोनों को परिस्थितिगत समर्थन” — गठबंधन के भीतर यह संदेश देने की कोशिश है कि मतभेद के बावजूद ‘मिशन भाजपा हराओ’ पर सभी एकजुट हैं।
चुनावी गणित पर असर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बछवाड़ा जैसी सीटों पर माले का समर्थन निर्णायक साबित हो सकता है, क्योंकि वहां उसका वोट बैंक ठोस और कार्यकर्ता अत्यधिक सक्रिय हैं। वहीं बिहारशरीफ और राजापाकड़ में कांग्रेस के पक्ष में माले का समर्थन विपक्षी मतों का बिखराव रोक सकता है।माले के इस ऐलान से एक ओर जहां महागठबंधन की एकता का संदेश देने की कोशिश है, वहीं यह भी स्पष्ट हुआ कि इंडिया गठबंधन की आंतरिक खींचतान अब सार्वजनिक रूप ले चुकी है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि माले का यह संतुलन साधने वाला दांव महागठबंधन के लिए वरदान साबित होता है या फिर वोट ट्रांसफर की उलझन में फंसकर नुकसान पहुंचाता है। मगर इतना तय है कि बिहार का चुनावी समर अब और ज्यादा दिलचस्प हो गया है।
