धर्मस्थलों के अधिकार और सहअस्तित्व पर मद्रास हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला “ दीप जलाने से दरगाह को क्या नुकसान?”—अदालत ने उठाया सीधा प्रश्न, मंदिर को मिली इजाजत, समुदायों के बीच समरसता का सशक्त संदेश

बी के झा

NSK

मदुरै / न ई दिल्ली, 2 दिसंबर

थिरुप्परंकुंड्रम की पवित्र पहाड़ी—जहां आस्था, इतिहास और परंपरा सदियों से साथ-साथ सांस लेती है—वहीं से एक ऐसा फैसला आया है, जिसने धर्मस्थलों के अधिकार, परंपराओं और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर एक नई रोशनी डाल दी है।मद्रास हाई कोर्ट ने अरुलमिगु सुब्रमण्या स्वामी मंदिर को उस प्राचीन स्तंभ (दीपथून) पर दीप जलाने की अनुमति दे दी, जो पहाड़ी के निचले शिखर पर स्थित है। यह वही स्थान है जिसे लेकर सालों से विवाद खड़ा किया जाता रहा था कि दीप प्रज्वलन से ऊपर स्थित सिकंदर बादशाह दरगाह के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

लेकिन अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा—

“दीप जलाने से किसी दरगाह, किसी समुदाय या किसी धार्मिक अधिकार को कोई क्षति नहीं होती।”प्राचीन अधिकार, आधुनिक न्याय—1920 के फैसले का हवाला न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन ने ऐतिहासिक दस्तावेज खंगालते हुए कहा कि 1920 के दशक में प्रिवी काउंसिल ने जिस सीमा-निर्धारण का आदेश दिया था, उसमें वाला क्षेत्र दरगाह को कभी सौंपा ही नहीं गया था।उन्होंने कहा—दरगाह सबसे ऊपरी शिखर पर हैमंदिर का प्रांगण और दीपथून निचले शिखर के हिस्से में आता हैदोनों स्थलों के बीच स्थापत्यिक, स्थानिक और धार्मिक दूरी इतनी है कि किसी का काम दूसरे के अधिकार से टकरा ही नहीं सकता न्यायालय ने यह भी जोड़ा कि—

“सिर्फ इसलिए कि दो धर्मस्थल पास-पास हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि एक परंपरा दूसरे को बाधित करती है।”कार्तिगई दीपम्—प्रकाश का पर्व, पूरा परिसर रोशन होकोर्ट ने मंदिर प्रशासन को आदेश दिया कि—“इस वर्ष से कार्तिगई दीपम पर दीपथून पर भी दीप प्रज्वलित किया जाए।”और इसका कारण बताते हुए न्यायालय ने एक सुंदर व्याख्या दी—कार्तिगई प्रकाश पर्व है। जैसे घर में पूजा कक्ष ही नहीं, पूरा घर उजाला मांगता है, वैसे ही मंदिर परिसर का हर अंग इस पवित्र ज्योति में शामिल होना चाहिए।”

यह टिप्पणी सिर्फ धार्मिक परंपरा का सम्मान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दर्शन का शानदार उदाहरण है।दरगाह प्रबंधन का दावा खारिज—‘नुकसान का प्रमाण कहां?’दरगाह प्रशासन की ओर से यह तर्क दिया गया कि दीप जलाने से उनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।लेकिन अदालत ने सख्त शब्दों में कहा—“आप यह नहीं बता सके कि दीप से आपको नुकसान कैसे और किस रूप में होगा।”इसके उलट न्यायालय ने संकेत दिया कि—

यदि दीप न जले,यदि परंपरा रोकी जाए,यदि मंदिर अपने अधिकारों से वंचित रहे,तो मंदिर का ही अधिकार संकट में पड़ सकता है।मंदिर प्रशासन पर भी अदालत की ने यह भी कहा कि मंदिर प्रशासन को अपने अधिकारों की रक्षा में अधिक सक्रिय होना चाहिए।यह काम भक्तों और कार्यकर्ताओं को न करना पड़े। मंदिर प्रशासन को अपनी प्राचीन परंपराओं की रक्षा में संवेदनशील होना चाहिए।”इसके साथ ही अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि आदेश पालन में कोई बाधा न आए।मदुरै पुलिस आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया गया है।

निर्णय का व्यापक संदेश—धर्मस्थल साथ रह सकते हैं, बिना संघर्ष केयह फैसला सिर्फ दीप जलाने से जुड़ा निर्णय नहीं—यह एक सिद्धांत स्थापित करता है:**आस्था का अधिकार सीमाओं में परिभाषित होता हैअधिकार टकराने पर नहीं, समझने पर सुरक्षित रहते हैंपरंपराएं किसी दूसरे धर्म का विरोध नहीं, बल्कि अपनी आत्मा का उत्सव हैं**

थिरुप्परंकुंड्रम की पहाड़ी अब सिर्फ दो धर्मस्थलों का निवास नहीं—यह सह-अस्तित्व, समरसता और न्यायपूर्ण परंपराओं का जीवित उदाहरण बनकर खड़ी है।

निष्कर्ष

मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला बताता है कि—धर्म के रास्ते अलग हो सकते हैं, प्रकाश की दिशा एक ही होती है।और जब प्रकाश पर्व पर दीप जलता है, तो वह किसी को बांटता नहीं—बल्कि उजाला सबमें बराबर बांटता है।

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