बी के झा
NSK

नई दिल्ली
4 अक्टूबर 2025
राजनीति के अखाड़े में जहां हर रोज़ आरोप-प्रत्यारोप, कटाक्ष और छींटाकशी का शोर सुनाई देता है, वहां किसी विपक्षी नेता द्वारा सत्तापक्ष की खुलकर सराहना करना दुर्लभ दृश्य होता है। मगर इस बार ऐसा हुआ है—और जिसने भी यह देखा, वह हैरान रह गया।दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज ने मोदी सरकार के रेल मंत्रालय की साफ-सफाई व्यवस्था की खुलकर प्रशंसा की है। यह वही भारद्वाज हैं, जो अक्सर भाजपा और केंद्र सरकार पर अपने तीखे बयानों के लिए सुर्खियों में रहते हैं। लेकिन इस बार उन्होंने मानो राजनीति की जंग को किनारे रख, वास्तविकता को स्वीकार किया और सार्वजनिक रूप से तारीफ की।”जो अच्छा है, उसे स्वीकारना चाहिए”नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर-1 पर स्लीपर क्लास वेटिंग हॉल का दौरा करते हुए सौरभ भारद्वाज ने एक वीडियो जारी किया। वीडियो में वह कहते दिखे—”मैं आज नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हूं। कई बार मैंने रेलवे विभाग और खासकर मंत्री अश्विनी वैष्णव की आलोचना की है कि रेल दुर्घटनाएं बहुत हुईं और यह सच्चाई है। मगर आज मैं प्लेटफॉर्म नंबर एक के स्लीपर क्लास वेटिंग रूम में गया। मैंने वहां का शौचालय इस्तेमाल किया और यह मेरी उम्मीद से कहीं बेहतर था। साफ-सुथरा, व्यवस्थित और वहां पर सफाई के लिए एक कर्मचारी तैनात था। मुझे लगा कि रेलवे ने इस व्यवस्था में सचमुच सुधार किया है। जो चीज़ अच्छी हो, उसे स्वीकारना भी चाहिए।”आलोचक से प्रशंसक तक का सफरभारद्वाज ने यह भी जोड़ा कि उनकी आलोचनाएं बेबुनियाद नहीं रहीं—रेल हादसे और खामियां आज भी चिंता का विषय हैं। लेकिन जब कोई विभाग कुछ बेहतर करता है, तो विपक्ष का दायित्व भी है कि वह उसे खुले दिल से स्वीकारे।राजनीति के माहौल में जहां विपक्ष और सत्तापक्ष शायद ही कभी एक-दूसरे की तारीफ करते हों, भारद्वाज का यह कदम न केवल चौंकाने वाला है बल्कि सकारात्मक संदेश भी देता है।राजनीति से परे, नागरिक दृष्टि सेयह दृश्य भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण है, जहां आलोचक भी स्वीकार करता है कि सुधार हुए हैं। शायद यही स्वस्थ लोकतंत्र की असली पहचान है—जहां सच्चाई को, चाहे वह विरोधी के पक्ष में क्यों न हो, मानने का साहस हो।नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का यह छोटा-सा अनुभव, साफ-सफाई का यह साधारण-सा प्रयास, दरअसल बड़े संकेत दे रहा है। यह संकेत है कि भारत का आम नागरिक केवल बहस नहीं चाहता—वह बदलाव देखना चाहता है। और जब बदलाव दिखे, तो उसका स्वागत करना चाहिए, चाहे करने वाला कोई भी हो।
