बी के झा
जहानाबाद ( बिहार ) / न ई दिल्ली, 4 फरवरी
बिहार की राजधानी पटना में हुई नीट छात्रा की रहस्यमयी हत्या अब केवल एक आपराधिक मामला नहीं रही, बल्कि यह न्याय, महिला सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही का बड़ा प्रतीक बनती जा रही है। मंगलवार को जहानाबाद की धरती पर निकली 25 किलोमीटर लंबी पदयात्रा ने यह साफ कर दिया कि यह लड़ाई सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है।सुबह 10 बजे मृतका के पैतृक गांव से शुरू हुई पदयात्रा जब दोपहर बाद जहानाबाद शहर पहुंची, तो यह एक मार्च नहीं बल्कि जनआक्रोश का सैलाब बन चुकी थी। सरैया से लेकर गुलाबगंज, सकुराबाद और बभना तक रास्ते में लोगों का जुड़ना बताता है कि यह मामला अब गांव-कस्बों की चुप्पी तोड़ चुका है। करगिल चौक पर आयोजित सभा में करीब 10 हजार लोगों की मौजूदगी ने बिहार की राजनीति को एक कड़ा संदेश दिया।
पप्पू यादव का सीधा हमला: “सरकार लीपापोती कर रही है”
सभा को संबोधित करते हुए पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने नीतीश सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार बेटियों का भरोसा जीतने में पूरी तरह विफल रही है और इस हत्याकांड में सच्चाई सामने लाने के बजाय लीपापोती में जुटी है।
उन्होंने कहा—“अगर सब कुछ साफ है, तो जांच से डर क्यों?
सबूत क्यों नष्ट किए गए? सवाल उठाने वालों को चुप क्यों कराया जा रहा है?
”पप्पू यादव ने चिकित्सा तंत्र की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रभात रंजन मेमोरियल हॉस्पिटल द्वारा रेफरल समरी में निमोनिया का उल्लेख, और बिना परिजनों की अनुमति के कई जांचें कराना संदेह पैदा करता है।उन्होंने दो टूक कहा—यदि पीएमसीएच के डॉक्टर ने गलत पोस्टमार्टम रिपोर्ट दी है, तो उस पर कार्रवाई हो यदि पोस्टमार्टम और फोरेंसिक रिपोर्ट सही है, तो प्रभात रंजन हॉस्पिटल के डॉक्टर सतीश पर कार्रवाई हो उनका आरोप था कि जांच को भटकाने के लिए साक्ष्य नष्ट कराए गए, जो अपने आप में गंभीर अपराध है।
CBI जांच की मांग, लेकिन शर्त के साथ
पप्पू यादव ने सीबीआई जांच की मांग तो की, लेकिन एक अहम शर्त के साथ—“यह जांच सुप्रीम कोर्ट के किसी मौजूदा जज की निगरानी में होनी चाहिए।”उनका कहना था कि राज्य की जांच एजेंसियों ने अपराधियों पर हाथ डालने के बजाय पीड़ित परिवार को ही प्रताड़ित किया, जो लोकतंत्र और कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
कानूनविदों की राय: यह केवल हत्या नहीं, जांच में बाधा का मामला भीसंवैधानिक और आपराधिक कानून के जानकारों का मानना है कि यह केस अब हत्या से आगे बढ़कर जांच में बाधा और सबूत नष्ट करने का भी बनता जा रहा है।एक वरिष्ठ कानूनविद कहते हैं—“यदि यह सिद्ध हो जाता है कि मेडिकल दस्तावेजों में हेराफेरी हुई या साक्ष्य नष्ट किए गए, तो यह IPC और BNSS दोनों के तहत गंभीर अपराध होगा।”उनके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग कानूनी रूप से असाधारण लेकिन इस मामले में तार्किक प्रतीत होती है।
शिक्षाविदों की चिंता: प्रतियोगी परीक्षाओं की दुनिया में असुरक्षा
शिक्षाविदों और कोचिंग विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना केवल एक छात्रा की मौत नहीं, बल्कि पूरे कोचिंग-संस्कृति और छात्र सुरक्षा तंत्र की विफलता को उजागर करती है।एक शिक्षा विशेषज्ञ के अनुसार—“नीट जैसी परीक्षा की तैयारी कर रही छात्राएं पहले ही मानसिक दबाव में रहती हैं। अगर उन्हें सुरक्षा का भरोसा भी न मिले, तो यह समाज के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।”
महिला आयोग की प्रतिक्रिया: स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी
राज्य महिला आयोग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि आयोग ने इस मामले पर संज्ञान लिया है। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट कहा है कि—पीड़ित परिवार को तत्काल सुरक्षा दी जाए मेडिकल और पुलिस जांच की स्वतंत्र समीक्षा हो दोषियों को उदाहरणात्मक सजा मिले एक महिला अधिकार कार्यकर्ता ने कहा—“अगर इस केस में न्याय नहीं हुआ, तो यह संदेश जाएगा कि मेहनती, पढ़ने वाली लड़कियां भी सुरक्षित नहीं हैं।”
विपक्ष का हमला: ‘सुशासन’ के दावे पर सवाल
विपक्षी दलों ने इस मामले को लेकर नीतीश सरकार के सुशासन के दावे पर तीखा प्रहार किया है।राजद नेताओं ने इसे प्रशासनिक संवेदनहीनता बताया कांग्रेस ने कहा कि राज्य सरकार जवाबदेही से भाग रही हैवाम दलों ने इसे महिलाओं के खिलाफ संरचनात्मक हिंसा का उदाहरण कहा
वरिष्ठ पत्रकारों का विश्लेषण: यह लड़ाई लंबी होगी
वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि इस मामले में सच्चाई तक पहुंचने की लड़ाई लंबी और कठिन होगी।एक वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार—“जब किसी केस में मेडिकल, पुलिस और प्रशासन—तीनों पर सवाल उठें, तो मामला केवल अपराध का नहीं, बल्कि सिस्टम की विश्वसनीयता का बन जाता है।”
मां की लड़ाई, समाज की जिम्मेदारी संभाल के दौरान पप्पू यादव ने मृतका की मां की दृढ़ता को नमन करते हुए कहा कि—“इस मां की हिम्मत को सलाम है, जिसने डरने के बजाय लड़ने का रास्ता चुना।”यही शायद इस पूरे आंदोलन की आत्मा है—
एक मां की आवाज़, जिसने हजारों लोगों को सड़कों पर उतार दिया।
निष्कर्ष
जहानाबाद की 25 किलोमीटर लंबी पदयात्रा केवल दूरी तय करने का नाम नहीं थी, यह न्याय तक पहुंचने की कोशिश थी। यह मार्च सत्ता से सवाल पूछता है, सिस्टम से जवाब मांगता है और समाज को आईना दिखाता है।
अब सवाल यह नहीं है कि जांच किस एजेंसी से होगी,सवाल यह है कि क्या बिहार की बेटियों को न्याय मिलेगा—या यह मामला भी फाइलों में दफन हो जाएगा?
इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति और प्रशासन—
दोनों की दिशा तय करेगा।
NSK

