बी के झा
NSK

पटना, 1 जनवरी
वर्ष 2025 के अंतिम दिन नीतीश सरकार के मंत्रियों द्वारा घोषित चल–अचल संपत्तियों का विवरण केवल एक औपचारिक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह बिहार की राजनीति में सत्ता, संपन्नता और नैतिकता के त्रिकोण पर गंभीर बहस का कारण बन गया है। मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग द्वारा जारी इस सूची में जहां एक ओर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपेक्षाकृत सीमित संपत्ति वाले नेता के रूप में सामने आए हैं, वहीं दूसरी ओर उनके मंत्रिमंडल के अधिकांश सदस्य करोड़ों की संपत्ति, हथियारों और भारी आभूषणों के स्वामी निकले हैं।मुख्यमंत्री सादगी की मिसाल, मंत्री वैभव के प्रतीक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कुल घोषित संपत्ति महज 1.65 करोड़ रुपये है। न कृषि भूमि, न व्यावसायिक जमीन, न कोई ऋण और न ही कर बकाया। दो साधारण अंगूठियां, सीमित घरेलू सामान और गोपालन—
यानी दस गायें और तेरह बछड़े—उनकी जीवनशैली की कहानी कहते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार आज भी लालू-युग की राजनीति से अलग सादगी की धुरी पर खड़े दिखते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सादगी उनके मंत्रियों तक भी पहुंच पाई?
पत्नी अमीर, मंत्री सामान्य:
सत्ता का नया मॉडल?
ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी की पत्नी के खातों में 22.54 करोड़ रुपये की जमा राशि ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है। खुद मंत्री के पास जहां 53 लाख रुपये बैंक में हैं, वहीं उनकी पत्नी उनसे कई गुना अधिक संपन्न हैं।
राजनीतिक शिक्षाविद प्रो. (डा.) रमेश कुमार कहते हैं,“यह केवल वैवाहिक संपत्ति का मामला नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक संरचना की ओर इशारा करता है, जहां सत्ता प्रत्यक्ष नहीं, परोक्ष रूप से पूंजी निर्माण का माध्यम बनती है।
”हथियारों और आभूषणों का बढ़ता शौक
उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पास रिवॉल्वर के साथ राइफल,
स्वास्थ्य अभियंत्रण मंत्री संजय सिंह के पास पिस्टल और राइफल, कृषि मंत्री रामकृपाल यादव के पास 315 बोर की राइफल—यह सूची लंबी है।वहीं पिछड़ा-अति पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री रमा निषाद के पास 2 किलो सोना और 6 किलो चांदी होना सामाजिक न्याय की राजनीति पर नए सवाल खड़े करता है।
वरिष्ठ समाजसेवी अनिल सिन्हा कहते हैं,“जब सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले नेता स्वयं आभूषणों और वैभव के प्रतीक बन जाएं, तो आम गरीब के मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होना स्वाभाविक है।”
विपक्ष का तीखा हमला
विपक्षी दलों ने इस संपत्ति घोषणा को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है।
राजद प्रवक्ता ने कहा,“यह सरकार सुशासन नहीं, ‘संपत्ति शासन’ चला रही है। जनता महंगाई से जूझ रही है और मंत्री करोड़ों के गहनों व गाड़ियों में घूम रहे हैं।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि संपत्ति की घोषणा पर्याप्त नहीं, बल्कि संपत्ति के स्रोतों की सार्वजनिक जांच होनी चाहिए।वाम
दलों ने इसे “संवैधानिक औपचारिकता के पीछे छिपा पूंजीवाद” करार दिया।
क्या कानून से आगे नैतिकता भी जरूरी?
संवैधानिक रूप से मंत्रियों द्वारा संपत्ति की घोषणा अनिवार्य है और अधिकांश मंत्रियों ने यह प्रक्रिया पूरी की है। लेकिन शिक्षाविदों का मानना है कि लोकतंत्र केवल कानून से नहीं, नैतिकता से चलता है।राजनीतिक विश्लेषक शंभू नाथ कहते हैं,“जब मुख्यमंत्री की सादगी और मंत्रियों की संपन्नता के बीच इतना बड़ा अंतर हो, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सत्ता का लाभ किसे और कैसे मिल रहा है।”
जनता के मन में उठते प्रश्न
बिहार की जनता के सामने आज सवाल स्पष्ट हैं—
क्या सत्ता में रहते हुए इतना वैभव नैतिक है?
क्या संपत्ति की घोषणा केवल कागजी पारदर्शिता है?
और सबसे बड़ा सवाल:
क्या सुशासन का मतलब केवल कानून का पालन है या जीवनशैली में भी उसका प्रतिबिंब दिखना चाहिए?
नीतीश कुमार की सादगी एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन उनके मंत्रियों की संपन्नता ने उस सादगी के चारों ओर एक ऐसा घेरा बना दिया है, जिसे तोड़े बिना ‘सुशासन’ की परिकल्पना अधूरी ही रहेगी।
