बी.के. झा
NSK




नई दिल्ली, 18 दिसंबर
राउज़ एवेन्यू कोर्ट का फ़ैसला केवल एक चार्जशीट को खारिज करने तक सीमित नहीं है। यह निर्णय जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली, राजनीतिक मुक़दमों की वैधानिकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की सीमाओं पर गंभीर सवाल छोड़ जाता है। नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) की चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार करते हुए अदालत ने साफ़ किया है कि मनी लॉंड्रिंग जैसे गंभीर अपराधों में भी क़ानूनी प्रक्रिया की अनदेखी नहीं की जा सकती।बुधवार को कांग्रेस द्वारा अदालत के फ़ैसले का स्वागत और देशभर में प्रदर्शन, इस बात का संकेत है कि यह मामला अब केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजनीतिक विमर्श का बड़ा केंद्र बनेगा।
कानूनी प्रक्रिया की कसौटी पर ईडी
अदालत के सामने मूल प्रश्न यह था कि —क्या बिना किसी एफ़आईआर के ईडी मनी लॉंड्रिंग की जांच शुरू कर सकती है?
अदालत ने साफ़ कहा — नहीं कोर्ट के अनुसार,मनी लॉंड्रिंग की जांच तभी हो सकती है, जब पहले किसी प्रेडिकेट ऑफ़ेंस (मूल अपराध) की पुलिस जांच एफ़आईआर के ज़रिये शुरू हो किसी निजी व्यक्ति की कोर्ट में दी गई शिकायत, एफ़आईआर का विकल्प नहीं हो सकती
वरिष्ठ अधिवक्ता निज़ाम पाशा के शब्दों में,यह फ़ैसला जांच एजेंसियों को याद दिलाता है कि राजनीतिक दबाव या सार्वजनिक शोर के आधार पर क़ानून को मोड़ा नहीं जा सकता
अदालत की टिप्पणी:
जांच एजेंसियों के लिए आईना
कोर्ट ने ईडी के ही दस्तावेज़ों के हवाले से कहा कि 2014 से 2021 तक ईडी और सीबीआई के अधिकारी स्वयं मानते रहे कि बिना एफ़आईआर मनी लॉंड्रिंग का मामला नहीं बनता।
वरिष्ठ अधिवक्ता का मत सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण कहते हैं,यह दुर्लभ है कि कोई अदालत जांच एजेंसी के आंतरिक नोट्स पढ़कर यह निष्कर्षनिकाले कि एजेंसी ख़ुद अपने अधिकार क्षेत्र को लेकर आश्वस्त नहीं थी। यह फ़ैसला संस्थागत जवाबदेही की मिसाल है।”राजनीतिक विश्लेषक: ‘कानून से ज़्यादा राजनीति हावी थी’
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अपूर्वानंद मानते हैं,नेशनल हेराल्ड केस शुरू से ही क़ानून से ज़्यादा राजनीति प्रेरित रहा है। अदालत का यह फ़ैसला बताता है कि हर राजनीतिक विवाद को अपराध में बदलने की कोशिश अब न्यायपालिका की कसौटी पर टिक नहीं रही।”उनके अनुसार,यह फ़ैसला सत्ता और जांच एजेंसियों के रिश्ते पर भी सवाल उठाता है।”
सरकार का रुख: ‘क़ानूनी लड़ाई जारी रहेगी’सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह फ़ैसला तकनीकी आधार पर आया है, न कि मामले के मेरिट पर।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,कोर्ट ने यह नहीं कहा कि मनी लॉंड्रिंग नहीं हुई। केवल यह कहा है कि प्रक्रिया सही नहीं अपनाई गई। ईडी हाई कोर्ट जाएगी।”
सरकार के समर्थक इसे अस्थायी राहत मान रहे हैं, न कि अंतिम जीत।कांग्रेस और विपक्ष: ‘संवैधानिक जीत’कांग्रेस ने इसे “सत्य की जीत” और “राजनीतिक प्रतिशोध पर न्यायपालिका की रोक” बताया।
कांग्रेस प्रवक्ता के अनुसार,यह फ़ैसला साबित करता है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्ष को डराने के लिए किया जा रहा था।”
राजद, टीएमसी और वाम दलों ने भी इसे‘जांच एजेंसियों के दुरुपयोग पर करारा तमाचा’ बताया।शिक्षाविदों की दृष्टि: लोकतंत्र के लिए चेतावनी संवैधानिक मामलों के जानकार और शिक्षाविद प्रो. फौज़िया ख़ान कहती हैं,यह मामला बताता है कि अगर प्रक्रिया ही कमज़ोर हो, तो सबसे शक्तिशाली एजेंसी भी अदालत में टिक नहीं सकती। यह लोकतंत्र के लिए राहत और सत्ता के लिए चेतावनी है।”
वरिष्ठ समाजसेवी:
‘न्यायपालिका ने भरोसा बचाया’वरिष्ठ समाजसेवी अन्ना हज़ारे आंदोलन से जुड़े एक सामाजिक चिंतक का कहना है,अगर अदालतें भी एजेंसियों के दबाव में आ जाएं, तो आम आदमी का भरोसा टूट जाएगा। इस फ़ैसले ने बताया कि न्यायपालिका अभी ज़िंदा है।”
आगे क्या?
ईडी दिल्ली हाई कोर्ट में अपील कर सकती है हाल में दर्ज दिल्ली पुलिस की एफ़आईआर के आधार पर नई जांच संभवअभियुक्त ‘डबल जियोपर्डी’ का तर्क उठा सकते हैं
डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की 2014 की शिकायत अब भी अदालत में लंबित
वहीं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद कुमार सिंह, वकील प्रतीक चड्डा के अनुसार,कांग्रेस को फिलहाल राहत मिली है, लेकिन यह केस अभी समाप्त नहीं हुआ। अगली लड़ाई हाई कोर्ट और संभवतः सुप्रीम कोर्ट में होगी।
निष्कर्ष:
प्रक्रिया ही लोकतंत्र की रीढ़नेशनल हेराल्ड केस में आया यह फ़ैसला याद दिलाता है किलोकतंत्र भावनाओं से नहीं, प्रक्रिया से चलता है।यह फ़ैसला न तो कांग्रेस को पाक-साफ़ घोषित करता है, न ही सरकार को दोषी —
यह सिर्फ़ इतना कहता है कि क़ानून की लड़ाई, क़ानून के रास्ते से ही लड़ी जाएगी।
और शायद, यही किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत होती है।
