न तो फ्री, न ही फेयर’ भारत–न्यूज़ीलैंड ट्रेड डील पर वेलिंगटन में विद्रोह, डेयरी बना सबसे बड़ा टकराव

बी के झा

नई दिल्ली / वेलिंगटन, 23 दिसंबर

भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच सोमवार को घोषित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) भले ही काग़ज़ों पर एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में दर्ज हो गया हो, लेकिन इसके ऐलान के साथ ही न्यूज़ीलैंड की घरेलू राजनीति में तीखा भूचाल आ गया है। जिस करार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके न्यूज़ीलैंड समकक्ष क्रिस्टोफर लक्सन ने द्विपक्षीय संबंधों का नया अध्याय बताया, उसी समझौते को न्यूज़ीलैंड के विदेश मंत्री और सत्तारूढ़ गठबंधन की अहम सहयोगी पार्टी न्यूज़ीलैंड फर्स्ट के नेता विंस्टन पीटर्स ने खुलकर खारिज कर दिया है।

पीटर्स ने इस FTA को“न तो फ्री और न ही फेयर”बताते हुए इसे न्यूज़ीलैंड के लिए “खराब सौदा” करार दिया है।FTA पर भीतर से उठी बगावत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक तीखे बयान में विंस्टन पीटर्स ने कहा कि उनकी पार्टी इस समझौते का “अफसोस के साथ विरोध” करती है। उनका आरोप है कि सरकार नेआव्रजन निवेश और बाजार पहुंच के मोर्चे पर बहुत ज़्यादा रियायतें दे दी हैं, जबकि बदले में न्यूज़ीलैंड को अपने सबसे अहम निर्यात क्षेत्रों—

खासतौर पर डेयरी सेक्टर—में कोई ठोस लाभ नहीं मिला।पीटर्स ने साफ शब्दों में लिखा—“यह सौदा हमारे ग्रामीण समुदायों और किसानों के सामने बचाव योग्य नहीं है।”उनके इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह विरोध केवल तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक है।

सरकार का दावा: व्यापार दोगुना होगा

न्यूज़ीलैंड सरकार और प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन इस समझौते को देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी छलांग बता रहे हैं। सरकार के मुताबिक—अगले 5 वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार दोगुना हो सकता है

भारत को न्यूज़ीलैंड के 95% निर्यात पर शुल्क में कटौती या समाप्ति मिलेगी इनमें से आधे से ज्यादा उत्पाद पहले दिन से ड्यूटी-फ्री होंगे इसके बदले भारत के सभी उत्पादों को न्यूज़ीलैंड के बाजार में पूरी तरह शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी

न्यूज़ीलैंड ने भारत में अगले 15 वर्षों में करीब 20 अरब डॉलर निवेश का वादा किया है प्रधानमंत्री लक्सन ने कहा कि“भारत का विशाल और तेजी से बढ़ता बाजार न्यूज़ीलैंड के लिए नौकरियों, निर्यात और आर्थिक विकास के नए द्वार खोलेगा।”

भारत की प्रतिक्रिया: ऐतिहासिक मील का पत्थर

भारत ने इस समझौते को कूटनीतिक और आर्थिक दोनों लिहाज़ से बड़ी सफलता बताया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा—“सिर्फ नौ महीनों में FTA का निष्कर्ष

निकलना दोनों देशों के रिश्तों की मजबूती को दर्शाता है।”पीएम मोदी के अनुसार यह करार किसानोंMSMEsछात्रों युवाओं नवोन्मेषों और उद्यमियों के लिए नए अवसर लेकर आएगा और भारत न्यूज़ीलैंड से 20 अरब डॉलर से अधिक के निवेश का स्वागत करता है।

डेयरी सेक्टर: असली विवाद की जड़इस पूरे विवाद का केंद्र डेयरी सेक्टर है, जो न्यूज़ीलैंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।विंस्टन पीटर्स का सबसे बड़ा आरोप यही है कि—न्यूज़ीलैंड ने भारतीय उत्पादों के लिए अपना बाजार लगभग पूरी तरह खोल दिया लेकिन भारत ने दूध, चीज़, मक्खन जैसे प्रमुख डेयरी उत्पादों पर ऊंचे टैरिफ बरकरार रखे पीटर्स ने इसे“न्यूज़ीलैंड का पहला ऐसा FTA”बताया, जिसमें देश के सबसे अहम निर्यात क्षेत्र को बाहर रखा गया है।आंकड़ों के मुताबिक,नवंबर 2025 तक के एक वर्ष में न्यूज़ीलैंड का डेयरी निर्यात करीब 24 अरब डॉलर का रहा, जो देश के कुल वस्तु निर्यात का लगभग 30 प्रतिशत है।

भारत की दलील: किसानों की सुरक्षा प्राथमिकता

भारत सरकार ने साफ किया है किदेश के किसानों और घरेलू उद्योग की सुरक्षा सर्वोपरि है।इसी कारण डेयरी के साथ-साथ—कॉफीदूध और क्रीमदही और व्हेचीनीमसालेखाद्य तेल रबर जैसे संवेदनशील उत्पादों को बाजार पहुंच से बाहर रखा गया है।

भारतीय नीति-निर्माताओं का मानना है किडेयरी क्षेत्र को खोलना“करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका के लिए खतरा”हो सकता है।राजनीतिक विश्लेषण: आर्थिक करार, राजनीतिक जोखिम

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद दिखाता है किFTA अब केवल व्यापारिक दस्तावेज नहीं रह गए हैं, बल्कि—घरेलू राजनीति रोजगार किसानों की सुरक्षाऔर राष्ट्रीय हितसे सीधे जुड़े हैं।एक विशेषज्ञ के अनुसार—“भारत ने जहां अपने किसानों की लाल रेखा खींची है, वहीं न्यूज़ीलैंड की राजनीति में डेयरी किसान चुनावी ताकत हैं। यही टकराव इस विरोध का मूल है।”

निष्कर्ष:

ऐतिहासिक करार, लेकिन अधूरा संतोषभारत–न्यूज़ीलैंड FTAकूटनीतिक रूप से ऐतिहासिक जरूर है,लेकिन राजनीतिक सहमति के बिना आर्थिक समझौते कितने टिकाऊ होंगे, यह सवाल अब वेलिंगटन में खुलकर उठ खड़ा हुआ है।एक तरफनई दिल्ली इसे रणनीतिक साझेदारी की नींव मान रही है,तो दूसरी तरफ न्यूज़ीलैंड के भीतर इसे “ग्रामीण हितों के खिलाफ सौदा” कहा जा रहा है।

आने वाले समय में यह साफ होगा किक्या यह FTAवास्तव में दोनों देशों के लिए समान रूप से लाभकारी सिद्ध होता है,या फिर न्यूज़ीलैंड की घरेलू राजनीति इसे संशोधन की ओर धकेल देती है।

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