न दौलत, न कारोबार… पत्नी आंगनबाड़ी सेविका — बिहार चुनाव के सबसे गरीब उम्मीदवार बने मिसाल

बी.के. झा

NSK

, पटना / न ई दिल्ली, 30 अक्टूबर

बिहार विधानसभा चुनाव के शोर-शराबे, पोस्टरों और बड़े-बड़े वादों के बीच एक ऐसा नाम उभरा है, जिसने राजनीति की चमक-दमक को सादगी और ईमानदारी से चुनौती दी है।

यह नाम है कयामुद्दीन अंसारी — भाकपा (माले) के उम्मीदवार, जो इस बार आरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं।कयामुद्दीन अंसारी की पहचान सिर्फ एक उम्मीदवार के रूप में नहीं, बल्कि एक संघर्षशील आम आदमी की उम्मीद के रूप में बन चुकी है।

उनकी संपत्ति देखकर कोई भी हैरान रह जाएगा —

उनके पास न कोई जमीन है, न कोई मकान, न कारोबार और न ही वाहन।पत्नी हैं आंगनबाड़ी सेविका, वही घर का सहारा50 वर्षीय कयामुद्दीन की पत्नी खुशबु एक आंगनबाड़ी सेविका हैं, और यही उनके घर की एकमात्र स्थायी आय का स्रोत है।हलफनामे के मुताबिक, कयामुद्दीन के पास सिर्फ 20 हजार रुपये नकद और बैंक में 5 हजार रुपये हैं।

यह वही व्यक्ति हैं, जो आज के दौर में राजनीति को “पैसों का खेल” कहने वालों के बीच ‘जनता के भरोसे की राजनीति’ का जिंदा उदाहरण बन गए हैं।शिक्षित और सादगीभरा जीवनकयामुद्दीन ने एम.एच.डी. जैन कॉलेज, आरा से उर्दू में एमए की डिग्री ली है। वे जाति से अंसारी (जुलाहा) हैं, यानी अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं।

उनकी सादगी और स्वाभिमान ही उन्हें भीड़ में अलग बनाते हैं।

राजनीति में वे पहली बार नहीं हैं — वे 2020 में भी आरा से चुनाव लड़ चुके हैं और भाजपा के अमरेन्द्र प्रताप सिंह से महज 3,002 वोटों से हार गए थे। उस चुनाव में भी उनके संघर्ष और सादगी की खूब चर्चा हुई थी।‘जनता के भरोसे जीतेंगे’, बोले कयामुद्दीनजब उनसे पूछा गया कि “बिना पैसे के प्रचार कैसे करेंगे?”, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा —हम जनता के भरोसे जीतेंगे। कोई 50 रुपये देता है, कोई 100 रुपये।

इन्हीं पैसों से पोस्टर छपवाते हैं और साइकिल पर बैठकर गांव-गांव, घर-घर जाते हैं।कयामुद्दीन का कहना है कि राजनीति सेवा का माध्यम है, व्यापार नहीं। “अगर नेता जनता की आंखों में आंख डालकर बात नहीं कर सकता, तो वह जनप्रतिनिधि नहीं व्यापारी है,”

उन्होंने कहा।कठिन राह पर सच्चाई का सफरआरा सीट पर इस बार उनका मुकाबला भाजपा के संजय सिंह टाइगर और जन सुराज के डॉ. विजय कुमार गुप्ता जैसे दिग्गजों से है।स्थानीय लोगों का कहना है कि “ऐसे दौर में, जब चुनाव में नोटों की बारिश होती है, कयामुद्दीन जैसे लोग लोकतंत्र की असली पहचान हैं।

”एक स्थानीय शिक्षाविद ने टिप्पणी की —आज संसद या विधानसभा वही पहुंचते हैं, जिनके खाते में करोड़ों हों या जिनके पीछे बाहुबल हो। ऐसे में कयामुद्दीन जैसे उम्मीदवार इस व्यवस्था के खिलाफ एक उम्मीद की तरह हैं।”गरीबी में भी उम्मीद की मशाल बिहार की राजनीति में जहां जाति, पैसा और ताकत ही अक्सर जीत का समीकरण तय करते हैं, वहीं कयामुद्दीन अंसारी जैसे उम्मीदवार यह साबित कर रहे हैं कि जनता के दिल तक पहुंचने के लिए न बैंक बैलेंस चाहिए, न काफिला — बस ईमानदारी और भरोसा चाहिए।

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