बी के झा
नई दिल्ली/ पटना, 29 नवंबर
पटना हाईकोर्ट ने बिहार में शराबबंदी कानून के दुरुपयोग और पुलिसिया मनमानी पर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा—“कानून जनता के खिलाफ हथियार नहीं, न्याय का साधन है।”
मामला 1: चोरी हुई कार और उसके बाद शराब बरामदअली अशरफ सिद्दीकी की कार 6 मई 2024 को चोरी हो गई थी।एक माह दस दिन बाद वही कार शराब के साथ सीवान में बरामद की गई।इसके बावजूद अधिकारियों ने—भारी जुर्माना जमा कराने का आदेश दिया,गाड़ी नीलामी प्रक्रिया आगे बढ़ाने का फैसला भी कर लिया,अपीलीय अधिकारी ने भी इस गैरकानूनी आदेश को सही ठहरा दिया।हाईकोर्ट ने इन आदेशों को कानून, तर्क और न्याय—तीनों के विपरीत करार दिया।कोर्ट ने निर्देश दिया—तीन दिनों के भीतर गाड़ी छोड़ दी जाए,₹10,000 बतौर मुकदमा खर्च दिया जाए,और राशि की वसूली जिम्मेदार अधिकारियों से की जा सकती है।यह टिप्पणी अपने आप में संकेत है कि न्यायपालिका अब कानून के नाम पर चल रही अवैध कार्रवाई को सहन करने के मूड में नहीं।
मामला 2: मोटरसाइकिल में शराब ‘डालकर’ फँसाने की कोशिश करनाल कुमार का मामला तो कोर्ट के सामने मनमानी का एक और जीवंत प्रमाण बनकर आया।उनकी मोटरसाइकिल को शराब तस्करी में शामिल बताकर जब्त कर लिया गया, जबकि—ना बाइक से शराब मिली,ना आवेदक का कोई संबंध साबित हुआ,उल्टा यह साबित हुआ कि झूठे फंसाने के लिए किसी गोलू कुमार ने बाइक में शराब रखवा दी थी।ट्रायल कोर्ट ने धारा 60 का हवाला देते हुए वाहन छोड़ने की अनुमति नहीं दी थी।लेकिन हाईकोर्ट ने इसे स्पष्ट अन्याय बताते हुए बाइक वापस करने का आदेश दिया।
कानूनविद क्या कहते हैं?
वरिष्ठ अधिवक्ता रजनीश ठाकुर का कहना है—“शराबबंदी कानून उद्देश्य में पवित्र, लेकिन उसकी क्रियान्वयन व्यवस्था भ्रष्टाचार और अत्यधिक कठोरता से दूषित हो चुकी है। हाईकोर्ट का यह फैसला पुलिस-प्रशासन पर एक आवश्यक ‘चेतावनी’ है।”सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील (पटना मूल) अनिल उपाध्याय के शब्दों में—“जब वाहन चोरी की एफआईआर दर्ज है और मालिक की कोई भूमिका नहीं, तब प्रशासनिक कार्रवाई न सिर्फ अवैध बल्कि अधिकारों का खुला उल्लंघन है।”
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ:विपक्ष ने बोला हमला
RJD ने कहा—“नीतीश सरकार में पुलिस बेलगाम है। शराबबंदी का इस्तेमाल वसूली व प्रताड़ना के लिए हो रहा है। हाईकोर्ट हर बार सरकार की गलतियां पकड़ रहा है।
”कांग्रेस का बयान—“शराबबंदी कानून के नाम पर हजारों निर्दोष परेशान हैं। यह कानून सामाजिक सुधार कम, राजनीतिक दिखावा ज्यादा बन गया है।”
लेफ्ट पार्टियों ने कहा—“हर छापेमारी का अंत ‘जबरन जब्ती’ पर होता है। कोर्ट के फैसले से सरकार की नीयत और नाकामी दोनों उजागर हुईं।”सत्ता पक्ष का रुख
जेडीयू ने बचाव में कहा—“कुछ मामलों में अधिकारी गलती करते हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि पूरी शराबबंदी व्यवस्था गलत है।”BJP, जो अब सरकार का हिस्सा है, ने अपेक्षाकृत संतुलित बयान दिया—“हम कानून के दुरुपयोग के खिलाफ हैं। गलत करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।”
राजनीतिक विश्लेषणइस फैसले का व्यापक राजनीतिक अर्थ है—
1. शराबबंदी कानून को सुधारने की मांग तेज होगी।
2. पुलिस की जवाबदेही बढ़ेगी, क्योंकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि गलत जब्ती पर अधिकारियों से ही वसूली की जा सकती है।
3. यह फैसला 2026 बिहार चुनावों से पहले विपक्ष को बड़ा हथियार दे सकता है।
4. हाईकोर्ट के दो हालिया फैसले बताते हैं कि न्यायपालिका कानून के नाम पर हो रही ज्यादतियों को गंभीरता से ले रही है।
जनता की प्रतिक्रिया
जनता की प्रतिक्रिया दो शब्दों में—“मनमानी अब नहीं चलेगी।”बिहार में लाखों लोग इस कानून की गिरफ्त में आए हैं। कई बार—चोरी की गाड़ियों,झूठे फंसाने,पड़ोसियों की दुश्मनी,पुलिस की ‘रिकवरी’के चलते निर्दोष लोग महीनों तक गाड़ियों और संपत्ति की जब्ती से परेशान होते हैं।हाईकोर्ट का यह आदेश ऐसे सभी पीड़ितों को उम्मीद का कारण देता है।
निष्कर्ष
:पटना हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश दिया है—कानून चाहे कितना भी कठोर हो, वह न्याय के बिना नहीं चल सकता।शराबबंदी अगर सामाजिक सुधार का अभियान है, तो उसे अधिकारों के सम्मान के साथ लागू करना होगा।यह फैसला बिहार की कानून-व्यवस्था, पुलिसिया कार्यप्रणाली और शराबबंदी कानून के भविष्य—तीनों पर गहरी छाप छोड़ेगा।
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