बी के झा
NSK


कोलकाता/ नई दिल्ली, 31 जनवरी
पश्चिम बंगाल की सियासत एक बार फिर उबाल पर है। विधानसभा चुनाव भले अभी औपचारिक रूप से घोषित न हुए हों, लेकिन राजनीतिक बयानबाज़ी, मोर्चाबंदी और प्रशासनिक हलचल बता रही है कि रणक्षेत्र सज चुका है। इसी बीच जनता उन्नयन पार्टी (JUP) के प्रमुख और तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए नेता हुमायूं कबीर के तीखे बयानों ने बंगाल की राजनीति में नया तूफान खड़ा कर दिया है।
“बीजेपी को 100 सीटें नहीं लेने दूंगा और टीएमसी को 50 से आगे नहीं जाने दूंगा”—
यह बयान सिर्फ एक राजनीतिक दावा नहीं, बल्कि तीसरे मोर्चे की खुली चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।हुमायूं कबीर का एलान: सत्ता के दोनों ध्रुवों को चुनौती मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में हुई मेगा एलायंस रैली में हुमायूं कबीर ने साफ शब्दों में कहा कि अब लड़ाई केवल ममता बनर्जी बनाम बीजेपी की नहीं है।उनका दावा है कि बंगाल के 2.82 करोड़ मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं और यदि वे “एक नाव में सवार” हुए तो राजनीतिक नक्शा बदल सकता है।उन्होंने ममता बनर्जी पर सीधा हमला करते हुए कहा—“ममता बनर्जी ने यहां कुछ नहीं किया। अब उन्हें भी हराना है और बीजेपी को भी मजबूत नहीं होने देना है।”साथ ही लक्ष्मी भंडार योजना को 3000 रुपये तक बढ़ाने का वादा कर उन्होंने यह संकेत दिया कि उनका एजेंडा केवल पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि कल्याणकारी प्रतिस्पर्धा भी होगा।
ओवैसी फैक्टर और तीसरे मोर्चे की गणित
हुमायूं कबीर का AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के साथ मंच साझा करना और ईद के बाद ब्रिगेड परेड ग्राउंड में संयुक्त रैली का ऐलान, चुनावी समीकरणों को और जटिल बना रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:AIMIM + ISF + JUP का गठजोड़ मुस्लिम बहुल इलाकों में TMC के वोट बैंक में सीधी सेंध लगा सकता है इसका अप्रत्यक्ष फायदा बीजेपी को भी मिल सकता है राजनीतिक विश्लेषक प्रो. संजय बोस कहते हैं—“हुमायूं कबीर का दावा बड़ा है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह मोर्चा सत्ता विरोधी वोटों को बांटेगा या वाकई एक वैकल्पिक शक्ति बनेगा।”
शिक्षाविदों की दृष्टि: बयानबाज़ी बनाम नीति
राजनीति के इस उग्र माहौल पर शिक्षाविद भी सवाल उठा रहे हैं।कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ. मृणालिनी घोष कहती हैं—“धर्म और पहचान की भाषा जितनी तेज होगी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दे उतने पीछे छूटते जाएंगे। बंगाल को नारों से ज़्यादा नीति की जरूरत है।”उनका मानना है कि तीसरे मोर्चे को यदि विश्वसनीय बनना है, तो उसे केवल सत्ता विरोध नहीं, बल्कि शासन का ठोस रोडमैप पेश करना होगा।
हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया: “तुष्टिकरण की नई साजिश”
हुमायूं कबीर के बयानों पर हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया तीखी रही है।एक प्रमुख हिंदू संगठन के नेता ने कहा—“यह खुलकर वोट बैंक की राजनीति है। बंगाल को फिर से धार्मिक आधार पर बांटने की कोशिश हो रही है।”हिंदू संगठनों का आरोप है कि:TMC ने पहले तुष्टिकरण कियाअब तीसरा मोर्चा उसी राजनीति को और तेज करेगा इसका जवाब हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण होगा
बीजेपी का पलटवार: “वोट कटवा मोर्चा”
भारतीय जनता पार्टी ने हुमायूं कबीर के ऐलान को गंभीरता से लेने से इनकार किया है।बीजेपी नेताओं का कहना है—“ये सभी पार्टियां वोट कटवा हैं। असली मुकाबला बीजेपी और TMC के बीच है।”बीजेपी का दावा है कि:TMC की अंदरूनी टूट कानून-व्यवस्था की खराब स्थितिऔर धार्मिक ध्रुवीकरण उन्हें सत्ता के करीब ले जा रहा है। बीजेपी इसे ‘बंगाल बदलाव’ का संकेत बता रही है।
राज्य सरकार की चाल: चुनाव से पहले पुलिस में बड़ा फेरबदल
राजनीतिक उथल-पुथल के बीच प्रशासनिक हलचल ने भी सवाल खड़े कर दिए हैं।राजीव कुमार के रिटायरमेंट के बाद पीयूष पांडे को कार्यवाहक डीजीपी बनाया गया है। इसके साथ ही कोलकाता पुलिस कमिश्नर समेत कई शीर्ष IPS अधिकारियों का तबादला किया गया।राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि:चुनाव से पहले प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत किया जा रहा है
भरोसेमंद अधिकारियों को अहम पदों पर लाया गया है विपक्ष इसे “चुनावी प्रबंधन” बता रहा है, जबकि राज्य सरकार का कहना है कि यह नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया है।
निष्कर्ष:
त्रिकोणीय मुकाबले की आहट
पश्चिम बंगाल अब:TMC बनाम BJP या तीसरे मोर्चे के उभारऔर प्रशासनिक रणनीतियों के त्रिकोणीय संघर्ष की ओर बढ़ता दिख रहा है।
हुमायूं कबीर का दावा चाहे जितना बड़ा हो, लेकिन उन्होंने इतना तो साफ कर दिया है कि इस बार चुनाव सिर्फ दो दलों की कहानी नहीं रहेगा।अब देखना यह है कि क्या उनका तीसरा मोर्चा खेल बिगाड़ने वाला साबित होगा या खुद खेल से बाहर हो जाएगा।
एक बात तय है—बंगाल का चुनाव सिर्फ सत्ता का नहीं, सामाजिक संतुलन, पहचान और भविष्य की दिशा का फैसला करेगा।
