पांच किलो अनाज पर सियासी संग्राम: विधान परिषद में अशोक चौधरी–सुनील सिंह आमने-सामने, “झूठ साबित हुआ तो दे दूंगा त्यागपत्र की चुनौती

बी के झा

NSK

पटना, 12 फरवरी

बिहार विधान परिषद का सत्र उस समय गरमा गया जब सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत मिलने वाले पांच किलो अनाज के मुद्दे पर सत्ता और विपक्ष आमने-सामने आ गए। बहस इतनी तीखी हो गई कि आरोप–प्रत्यारोप के बीच एक निर्दलीय एमएलसी ने यहां तक कह दिया—“अगर मेरी बात झूठी हुई तो मैं त्यागपत्र दे दूंगा।”

मुद्दा छोटा दिखता है—पांच किलो बनाम चार किलो—लेकिन इसके पीछे गरीब की थाली, सरकारी तंत्र की जवाबदेही और राजनीति की साख जुड़ी हुई है।

कैसे भड़की बहस?

सदन में निर्दलीय एमएलसी महेश्वर सिंह ने आरोप लगाया कि राशन कार्डधारकों को पांच किलो की जगह चार किलो या उससे भी कम अनाज दिया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि यह सिर्फ शिकायत नहीं, बल्कि प्रमाणित सच्चाई है।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पूर्वी चंपारण के रामगढ़वा में आपूर्ति पदाधिकारी ने ट्रांसपोर्टर और डिलीवरी बॉय पर प्राथमिकी दर्ज की थी। लेकिन प्राथमिकी के बाद “पटना से लेकर स्थानीय स्तर तक मामले को लिपा-पोती कर दिया गया।”इसी बात पर मंत्री अशोक चौधरी ने प्रमाण मांगा। जैसे ही मंत्री मोर्चा संभालते दिखे, राजद के विधान पार्षद सुनील कुमार सिंह खड़े हो गए। उन्होंने तीखा तंज कसा—“

पूरे कुएं में भांग डाला गया हो तो कोई क्या करे?”

इसके बाद सदन में शोर बढ़ गया। अशोक चौधरी जवाब देने लगे, तो सुनील सिंह लगातार बोलते रहे। स्थिति ऐसी हो गई कि कोई पक्ष शांत होने को तैयार नहीं था। अंततः सभापति को हस्तक्षेप कर दोनों को शांत कराना पड़ा।“

पहले एक किलो भी नहीं मिलता था” बनाम “तो क्या भ्रष्टाचार जायज है?”

मंत्री अशोक चौधरी ने सरकार का बचाव करते हुए कहा—“पहले तो एक किलो भी अनाज नहीं मिलता था।”इस पर महेश्वर सिंह ने पलटवार किया—“हां, यह सच है कि पहले नहीं मिलता था, तो क्या इसका मतलब है कि अब पदाधिकारी भ्रष्टाचार करें?

सरकार अनाज खाने के लिए देती है, लूटने के लिए नहीं।”और फिर वही चुनौती—“अगर मेरी बात झूठी हुई तो त्यागपत्र दे दूंगा।

शिक्षाविद का दावा: “पांच किलो में चार या साढ़े तीन किलो”

एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा किकई जगह पांच किलो के बदले चार किलो ही दिया जाता है,कहीं-कहीं तो साढ़े तीन किलो तक सीमित कर दिया जाता है,स्थानीय प्रशासन “धृतराष्ट्र” बना रहता है।उन्होंने यह भी आरोप लगाया किराशन कार्ड बनवाने के लिए 2000 से 3000 रुपये तक की मांग की जाती है,जिसके पास पैसा नहीं, उसे न राशन मिलता है, न कोई सरकारी लाभ।

बिहार में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा शिकार गरीब ही होता है।

राजनीतिक विश्लेषण: गरीब की थाली पर सियासत

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल राशन की मात्रा का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का सवाल है।एक वरिष्ठ विश्लेषक कहते हैं—“जब सरकार ‘गरीब कल्याण’ का दावा करती है और विपक्ष ‘राशन घोटाले’ का आरोप लगाता है, तब असली परीक्षा वितरण प्रणाली की पारदर्शिता की होती है। पांच किलो में अगर एक किलो कम है, तो वह सिर्फ वजन नहीं, विश्वास की कमी है।”उनका मानना है कि आने वाले चुनावी माहौल में पीडीएस बड़ा मुद्दा बन सकता है।

पत्रकारों की पड़ताल: सिस्टम में खामी या संगठित खेल?

जमीनी रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार बताते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ सेल (e-POS) मशीनें होने के बावजूद तौर में हेरफेर की शिकायतें आती रहती हैं।कई उपभोक्ताओं को “फिंगरप्रिंट फेल” या “सर्वर डाउन” कहकर लौटा दिया जाता है।कुछ मामलों में ट्रांसपोर्टर–डीलर–स्थानीय अधिकारी के गठजोड़ की भी चर्चा होती रही है, हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं हुई है।

कानूनविदों की राय: भ्रष्टाचार साबित हुआ तो सख्त दंड

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अनाज वितरण में जानबूझकर कटौती या घोटाला साबित होता है, तो यहआपराधिक कृत्य,भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम,और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत दंडनीय है।एक वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना है—“यदि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद मामले को दबाया गया है, तो यह और भी गंभीर अपराध है। इसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।”

विपक्ष का आरोप: “गरीब के नाम पर राजनीति

”विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार गरीबों के नाम पर योजनाओं का प्रचार करती है,लेकिन जमीनी स्तर पर निगरानी कमजोर है।उनका कहना है कि“अगर पांच किलो की जगह चार किलो मिल रहा है, तो यह सीधा-सीधा गरीब के हक पर डाका है।

”निष्कर्ष:

एक किलो का फर्क, भरोसे की दरार

विधान परिषद की यह बहस भले ही शोर-शराबे में खत्म हुई हो, लेकिन सवाल अभी भी कायम है—

क्या वास्तव में पांच किलो के बदले कम अनाज दिया जा रहा है?

क्या प्राथमिकी के बाद भी कार्रवाई दबा दी गई?

और यदि आरोप सही हैं, तो जिम्मेदार कौन?

पांच किलो में एक किलो की कमी शायद कागज पर मामूली लगे,लेकिन गरीब की थाली में वही एक किलो उसकी दो वक्त की रोटी है।अब निगाहें सरकार पर हैं—

क्या वह आरोपों की निष्पक्ष जांच कराएगी,या यह मुद्दा भी राजनीतिक बयानबाजी में खो जाएगा?

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