बी के झा
NSK

नई दिल्ली | 7 दिसंबर
2025 रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दो दिवसीय भारत यात्रा भले समाप्त हो गई हो, लेकिन दक्षिण ब्लॉक के गलियारों में कूटनीतिक हलचल थमी नहीं है। अब भारत की नज़र यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की की संभावित भारत यात्रा पर है—जो जनवरी 2026 की शुरुआत में हो सकती है। इंडियन एक्सप्रेस की जानकारी के अनुसार, दोनों देशों के अधिकारी पिछले कई हफ्तों से इस यात्रा के लिए बातचीत में जुटे हैं। दिलचस्प यह है कि पुतिन के आगमन से पहले ही नई दिल्ली ने ज़ेलेंस्की के कार्यालय से संपर्क साधना शुरू कर दिया था।यह प्रस्तावित यात्रा भारत की “संतुलित कूटनीति” की उस रेखा को और पुख्ता करेगी, जिसे पिछले ढाई वर्षों से मोदी सरकार अंतरराष्ट्रीय मंच पर दृढ़ता से निभाती आई है—
एक ऐसी नीति जिसमें भारत न तो रूस से दूरी बनाता है, न यूक्रेन से मुंह मोड़ता है; बल्कि दोनों से संवाद बनाए रखकर खुद को एक विश्वसनीय ‘शांति-सेतु’ के रूप में प्रस्तुत करता है।ऐतिहासिक यात्रा, संवेदनशील समय यूक्रेन के राष्ट्रपति अब तक केवल तीन बार भारत आए हैं—1992, 2002 और 2012 में। ऐसे में 14 वर्षों बाद होने वाली आगामी यात्रा न केवल प्रतीकात्मक महत्व रखती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के लिहाज से भी बेहद अहम होगी।
ज़ेलेंस्की का यह दौरा कई वैश्विक प्रश्नों पर निर्भर करेगा—• अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई शांति योजना किस दिशा में जाती है• युद्धक्षेत्र में हालात कैसे बदलते हैं• और यूक्रेन की घरेलू राजनीति में भ्रष्टाचार स्कैंडल से उठे दबाव का क्या असर पड़ता है यूक्रेन में हालिया राजनीतिक उथल-पुथल, ज़ेलेंस्की के प्रमुख सलाहकार आंद्रि यरमक का भ्रष्टाचार आरोपों के कारण इस्तीफा, तथा सेना के भीतर असंतोष जैसे कारण भी यात्रा की रूपरेखा पर असर डाल सकते हैं।
भारत की शांति-दूत कूटनीति भारत लगातार यह कहता रहा है कि वह “तटस्थ नहीं, बल्कि शांति के पक्ष में” है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2024 में पुतिन से मिलने के बाद यह संदेश दिया था कि:हम युद्ध के पक्ष में नहीं हैं, हम शांति को आगे बढ़ाने वाले हैं। समाधान युद्ध के मैदान में नहीं, बातचीत में खोजे जाते हैं।”इसी क्रम में 2024 में मोदी सरकार ने एक अनोखा कदम उठाया—
जुलाई में रूस यात्रा, और ठीक एक महीने बाद अगस्त में यूक्रेन यात्रा।दुनिया में कुछ ही देश ऐसे हैं जो दोनों पक्षों से इस स्तर पर संवाद बनाए हुए हैं, और भारत उन्हीं में से एक है।मोदी और ज़ेलेंस्की के बीच अब तक कम से कम आठ बार फोन पर बातचीत हो चुकी है। पुतिन और मोदी की बातचीत भी निरंतर जारी रही है। इससे भारत एक अनूठी स्थिति में आ गया है—
ऐसे देश के रूप में जिसे दोनों पक्ष सुनते भी हैं और सम्मान भी देते हैं।युद्ध का भारत पर सीधा असर भू-राजनीतिक संकट का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने लगा है।
ट्रंप प्रशासन द्वारा रूसी तेल पर लगाई गई 25% दंडात्मक टैरिफ़ शुल्क से भारत को सितंबर से अपने रूसी कच्चे तेल आयात में बड़ी कटौती करनी पड़ी। इससे ऊर्जा बाज़ार में नई असुरक्षा की स्थिति पैदा हुई है।एक वरिष्ठ ऊर्जा विशेषज्ञ ने कहा—अगर रूस-यूक्रेन संघर्ष लंबा खिंचता है और अमेरिकी दबाव बढ़ता है, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। ऐसे में भारत दोनों पक्षों के साथ बातचीत बनाए रखकर अपनी रणनीतिक आज़ादी को सुरक्षित कर रहा है।”यूरोप की नज़र और भारत की भूमिका पुतिन की दिल्ली यात्रा पर यूरोप की खास नजर थी। कई यूरोपीय देशों ने भारत से आग्रह किया था कि वह अपने प्रभाव का उपयोग करके रूस को युद्ध विराम के लिए तैयार करे।
हालांकि भारत ने स्पष्ट किया—हम किसी के पक्ष में नहीं, केवल शांति के पक्ष में हैं। बातचीत ही एकमात्र रास्ता है।नई दिल्ली की यह स्थिति उसे वैश्विक ‘मध्यस्थता’ के लिए एक विश्वसनीय योग्य उम्मीदवार बनाती है—
भले ही भारत खुद को आधिकारिक मध्यस्थ घोषित न करता हो।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
1. प्रो. अरविंद प्रसाद (अंतर्राष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञ):भारत इस समय शायद दुनिया का एकमात्र बड़ा देश है जो रूस और यूक्रेन दोनों से खुलकर संवाद कर रहा है। ज़ेलेंस्की की यात्रा केवल प्रतीक नहीं, बल्कि भारत को शांति-प्रक्रिया का मंच बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।
2. डॉ. इशिता साहा (यूरोप अध्ययन विशेषज्ञ):ट्रंप प्रशासन की कठोर तेल नीति ने भारत पर दबाव बढ़ाया है। ज़ेलेंस्की की यात्रा भारत को यह दिखाने का अवसर देगी कि वह सिर्फ संतुलन नहीं, बल्कि सक्रिय कूटनीति कर रहा है।
3. कर्नल (री.) अनिल ठाकुर (सुरक्षा विश्लेषक):भारत दोनों नेताओं से मिलकर वास्तविक स्थिति को समझ सकता है। यह वैश्विक दक्षिण की उस आवाज़ को मज़बूती देता है जो महान शक्तियों की राजनीति में भी शांति और न्याय की मांग करती है।”क्या भारत संतुलन बनाए रख पाएगा?यह सवाल वैश्विक राजनीति में अब एक प्रमुख विमर्श बन चुका है।भारत जिस कुशलता से पुतिन और ज़ेलेंस्की दोनों के साथ संवाद रख रहा है, वह उसकी कूटनीतिक परिपक्वता का प्रमाण है।
लेकिन आने वाले महीनों में तीन चीज़ें महत्वपूर्ण होंगी—
1. ट्रंप की शांति योजना का स्वरूप
2. युद्धक्षेत्र में सैन्य घटनाक्रम
3. भारत की ऊर्जा और आर्थिक प्राथमिकताएँ ज़ेलेंस्की की जनवरी 2026 की संभावित यात्रा इन सभी मुद्दों पर भारत की कूटनीतिक भूमिका को नए आयाम दे सकती है।
निष्कर्ष
भारत अब केवल एक दर्शक भर नहीं है; वह विश्व राजनीति के केंद्र में एक सक्रिय, प्रभावशाली और संतुलित शक्ति के रूप में उभर रहा है।पुतिन की यात्रा के बाद ज़ेलेंस्की का स्वागत—अगर वास्तविकता बनता है—
तो यह वैश्विक इतिहास में भारत की मध्यस्थता की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में गिना जाएगा।
