बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 5 दिसंबर
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के बीच राजनीतिक गलियारे उस वक्त गर्म हो उठे जब यह सामने आया कि राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष डिनर (बैंक्वेट) में कांग्रेस सांसद डॉ. शशि थरूर को तो निमंत्रण मिला, लेकिन विपक्ष के शीर्ष नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को नहीं।थरूर ने निमंत्रण की पुष्टि करते हुए कहा—
हाँ, मुझे आमंत्रण मिला है और मैं इस कार्यक्रम में अवश्य जाऊँगा।”यह खबर आते ही दिल्ली के राजनीतिक बायस्फीयर में नए सवालों, नई व्याख्याओं और नए समीकरणों की गूंज सुनाई देने लगी।कांग्रेस में हलचल: क्या यह संदेश है या संयोग?कांग्रेस के अंदर इस घटना ने असहजता पैदा कर दी है। राहुल गांधी ने पिछले सत्रों में कई बार शिकायत की थी कि—“
सरकार विपक्ष को सभी संवैधानिक और राजनयिक आयोजनों में नजरअंदाज कर रही है।”ऐसे में पुतिन जैसे वैश्विक नेता के सम्मान में आयोजित डिनर से राहुल और खरगे की अनुपस्थिति कांग्रेस नेतृत्व के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकेत मानी जा रही है।एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा—“जब ओबीसी, लोकसभा नेता और पार्टी अध्यक्ष को छोड़कर केवल एक कांग्रेस सांसद को बुलाया जाता है, तो यह प्रोटोकॉल नहीं, राजनीति होती है।”
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया:
“यह चयनित प्रतिनिधित्व है”टीएमसी नेता डेरेक ओ’ब्रायन“जिस कार्यक्रम में राष्ट्रपति कई देशों के प्रमुखों का स्वागत कर रहे हों, वहाँ विपक्ष के नेता को न बुलाना लोकतांत्रिक परंपरा के खिलाफ है। यह सरकार की ‘exclusive diplomacy’ है।”सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी“जब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को भी घरेलू राजनीति का हथियार बना दिया जाए, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। राहुल गांधी को न बुलाना दुर्भावना का संकेत है।”
शिवसेना (उद्धव) के संजय राउत“अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों की गेस्ट लिस्ट देखकर भी राजनीति की बू आती है। यह सत्ता की अहंकारी शैली है।”
शशि थरूर के लिए क्या मतलब?
‘स्वीकृति या स्ट्रैटेजिक सिग्नल?
’थरूर पुराने राजनयिक हैं, संयुक्त राष्ट्र में उच्च पदों पर रह चुके हैं। उनकी वैश्विक समझ और कूटनीतिक छवि अलग पहचान रखती है। पुतिन जैसे नेता के सम्मान में डिनर के लिए उनका चयन एक प्रतीकात्मक संदेश भी माना जा रहा है
:1. सरकार के लिए — थरूर एक ‘सहज संवादकर्ता’ हैं।विपक्ष के नेताओं के उलट, थरूर सरकार पर आलोचना तो करते हैं, लेकिन उनका स्वर ‘टकराव’ की बजाय ‘विचार-विमर्श’ का होता है।
2. विदेश मंत्रालय के लिए — थरूर एक ग्लोबल फिगर हैं।उनकी उपस्थिति अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के बीच भारतीय राजनीतिक ‘सॉफ्ट पावर’ की छवि भी प्रस्तुत करती है।
3. कांग्रेस के लिए — यह आंतरिक असहजता का संकेत है।पार्टी के अंदर पहले से ही थरूर को लेकर ‘अलग लाइन’ चलने की चर्चा है — मोदी कार्यक्रम में उपस्थित होना, संसद रणनीति बैठक से गैरहाज़िर रहना, अब यह डिनर निमंत्रण।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
कूटनीति और राजनीति दोनों को समझने वाला विश्लेषण
प्रो. अशोक कुमार सिंह (विदेश नीति विशेषज्ञ)“यह निमंत्रण केवल सामान्य प्रोटोकॉल नहीं है। थरूर की राजनयिक पृष्ठभूमि उन्हें ऐसे आयोजनों में ‘प्राकृतिक फिट’ बनाती है। यह विदेश मंत्रालय का व्यावहारिक निर्णय है, राजनीति नहीं।”
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक स्वाति चतुर्वेदी“यह न बुलाना भी एक संदेश है और बुलाना भी। सरकार विपक्ष की शीर्ष नेतृत्व को हाशिए पर दिखाना चाहती है, जबकि थरूर जैसे ‘non-confrontational’ चेहरे को प्राथमिकता दी जा रही है।”प्रो. संजय बारू (पूर्व प्रधानमंत्री सलाहकार)“भारत की विदेश नीति में निरंतरता रहती है। ऐसे आयोजन में विपक्ष के शीर्ष नेताओं का न होना ‘नए राजनीतिक दौर’ का संकेत है। सरकार यह दिखाना चाहती है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर विपक्ष की उपयोगिता सीमित है।
”क्या यह कांग्रेस के भीतर ‘नई राजनीति’ का इशारा है?कई विश्लेषकों का मानना है कि इस घटना का एक आंतरिक राजनीतिक आयाम भी है —थरूर का बढ़ता कद उनकी प्रधानमंत्री और विदेश नीति कार्यक्रमों में उपस्थिति पार्टी के भीतर उनके प्रति बढ़ती सतर्कताऔर अब यह उच्च स्तरीय निमंत्रण कुछ कांग्रेस नेताओं के अनुसार—“
थरूर पार्टी के अंदर एक ‘वैकल्पिक चेहरा’ की तरह भी उभर रहे हैं और यह कुछ नेताओं को असहज करता है।
”निष्कर्ष
:‘पुतिन डिनर’ सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बहुआयामी राजनीतिक संकेत**यह केवल एक डिनर का निमंत्रण नहीं, बल्कि—कूटनीति विपक्षीय राजनीति कांग्रेस की आंतरिक समीकरणऔर सरकार की पसंद–नापसंद—सबका सम्मिलित प्रतिबिंब है।कह सकते हैं कि यह कार्यक्रम एक डिनर कम, राजनीतिक संदेश अधिक है।
