बी के झा
NSK

नई दिल्ली/उडुपी, कर्नाटक , 28 नवंबर
आध्यात्मिक नगरी उडुपी में शुक्रवार का दिन राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से ऐतिहासिक रहा। श्रीकृष्ण मठ में आयोजित भव्य ‘लक्ष कंठ गीता परायण’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल गीता के पुरुषोत्तम अध्याय का पाठ किया, बल्कि जनसभा में ऐसा भाषण दिया जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा, आध्यात्मिकता, नेतृत्व और आधुनिक भारत की आत्मा—सभी को एक सूत्र में पिरो दिया।“गीता युद्धभूमि पर मिली थी, इसलिए अन्याय का अंत भी धर्म है” — प्रधानमंत्री
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन की शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण के उस गूढ़ संदेश से की जो आज भी भारत की सुरक्षा नीति की रीढ़ है। उन्होंने कहा:भगवद गीता हमें सिखाती है कि शांति और सत्य की स्थापना के लिए अत्याचारियों का अंत भी आवश्यक है।पीएम मोदी ने इस सिद्धांत को सीधे भारत की समकालीन सुरक्षा नीति से जोड़ा—देश की सीमाई चुनौतियों से लेकर आतंकी हमलों तक, हर मोर्चे पर निर्णायक और निडर कदम उठाना ही नए भारत का स्वभाव है।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा:“पहले आतंकी हमलों पर सरकारें हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाती थीं।
यह नया भारत है—ना किसी के सामने झुकता है, ना अपने नागरिकों की सुरक्षा से पीछे हटता है।”ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख—“हम शांति के दूत भी हैं और शांति के रक्षक भी”हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि भारत अब प्रतिक्रियाशील नहीं, बल्कि सक्रिय सुरक्षा नीति अपनाता है।उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए देशवासियों को याद करते हुए कहा कि:नया भारत शांति स्थापित करना भी जानता है और शांति की रक्षा करना भी।यह बयान न केवल विपक्ष, बल्कि वैश्विक समुदाय के लिए भी एक संदेश माना जा रहा है—
कि भारत शांति चाहता है, कमजोरी नहीं।आध्यात्मिकता से नीति तक—
गीता एक राष्ट्रीय दर्शन प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पूरे भाषण में गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रनीति के मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत किया।उन्होंने कहा:“भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षा केवल व्यक्ति की नहीं, राष्ट्र की नीति को भी दिशा देती है…
हमारी योजनाएँ—सबका साथ, सबका विकास, आयुष्मान भारत, पीएम आवास—गरीबों के कल्याण की वही शिक्षाएँ हैं जो गीता से मिलती हैं।”नारी शक्ति वंदन अधिनियम का संदर्भ प्रधानमंत्री ने महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाले ऐतिहासिक अधिनियम को भी श्रीकृष्ण से प्रेरित बताया:कृष्ण हमें नारी सुरक्षा और नारी सशक्तिकरण का ज्ञान देते हैं—देश ने उसी प्रेरणा से नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया है।”
प्रधानमंत्री के नौ राष्ट्रीय संकल्प—जनभागीदारी का विस्तृत खाका सभा में प्रधानमंत्री मोदी ने जनता को 9 संकल्प दिलाए, जो न केवल व्यक्तिगत सुधार बल्कि राष्ट्रीय विकास की दिशा तय करते हैं
:1. जल संरक्षण
2. एक पेड़—मां के नाम
3. कम से कम एक गरीब का जीवन सुधारना
4. स्वदेशी को अपनाना
5. प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना
6. स्वस्थ जीवनशैली—मिलेट, कम तेल
7. योग को दैनिक जीवन में शामिल करना
8. भारत की पांडुलिपियों का संरक्षण
9. भारतीय विरासत से जुड़े 25 स्थलों का दर्शनराजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये संकल्प नागरिकों की सहभागिता को राष्ट्रीय नीति के केंद्र में लाने का प्रधानमंत्री का प्रयास है।उडुपी-कृष्ण परम्परा से मोदी का गहरा भावनात्मक जुड़ाव प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में गुजरात और उडुपी के बीच आध्यात्मिक संबंध का उल्लेख किया:“मान्यता है कि श्रीकृष्ण का यह विग्रह पहले गुजरात में माता रुक्मणी की पूजा में था, बाद में माधवाचार्य ने इसे उडुपी में स्थापित किया।”उन्होंने यह भी कहा कि राम मंदिर आंदोलन में उडुपी की भूमिका ऐतिहासिक महत्व रखती है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
BJP नेता:केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा:प्रधानमंत्री ने आज सुरक्षा और आध्यात्मिकता का वह संगम प्रस्तुत किया है जो भारत के भविष्य का मार्ग है।
कांग्रेस:
कांग्रेस ने भाषण पर टिप्पणी करते हुए कहा:आध्यात्मिकता के नाम पर राजनीति करना भाजपा की आदत है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा पर बात गंभीर और स्वागत योग्य है।”
JDS:कर्नाटक की धरती से प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया है—यह पूरे देश के लिए प्रेरणादायक है।
राजनीतिक
विश्लेषक:दिल्ली स्थित वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रो. धनंजय कुलकर्णी का कहना है:मोदी आज गीता को सिर्फ धार्मिक ग्रंथ नहीं, राष्ट्रीय चरित्र के दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इससे उनका नैरेटिव सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से सुरक्षात्मक राष्ट्रवाद की ओर शिफ्ट होता दिख रहा है।
निष्कर्ष
उडुपी में दिया गया प्रधानमंत्री मोदी का भाषण केवल एक धार्मिक मंच का संदेश नहीं था।यह भारत की सुरक्षा नीति, भारत की आध्यात्मिक विरासत और भारत के नागरिकों को भविष्य के संकल्पों से जोड़ने वाला एक व्यापक और प्रभावशाली दृष्टिकोण था।इस भाषण ने एक बार फिर स्पष्ट किया—
नया भारत शांति चाहता है, पर शांति की रक्षा के लिए कठोर निर्णय लेने से पीछे नहीं हटता।
