बंगाल के सीमावर्ती जिलों में वोटरों की विस्फोटक बढ़ोतरी; राजनीतिक हलकों में खलबली तेज, ECI के आंकड़ों के बाद बंगाल की सियासत में मचा हड़कंप, आरोप–प्रतिआरोपों का दौर शुरू

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/ कोलकाता, ,29 नवंबर

पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की संख्या में पिछले दो दशकों के दौरान हुई रिकॉर्ड बढ़ोतरी ने राज्य की राजनीति में गर्मी ला दी है। चुनाव आयोग (ECI) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राज्य में वर्ष 2002 में 4.58 करोड़ मतदाता थे, जो 2025 आते-आते बढ़कर 7.63 करोड़ तक पहुंच गए।

यह 66% की भारी वृद्धि है—और इसका अधिकतर हिस्सा सीमावर्ती जिलों में केंद्रित है।सीमा से सटे जिलों में असामान्य उछाल ECI डेटा दर्शाता है कि मतदाता वृद्धि के शीर्ष 10 जिलों में 9 जिले बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं। सबसे अधिक वृद्धि उत्तर दिनाजपुर में 105.49% दर्ज की गई है।अन्य जिले जहां मतदाता तेजी से बढ़े

:मालदा – 94.58%

मुर्शिदाबाद – 87.65%

दक्षिण 24 परगना – 83.30%

जलपाईगुड़ी – 82.3%

कूच बिहार – 76.52%

उत्तर 24 परगना – 72.18%

नादिया – 71.46%

दक्षिण दिनाजपुर – 70.94%

इनमें केवल बीरभूम (73.44%) एक ऐसा जिला है जो सीमा से नहीं सटा है।

कोलकाता में सिर्फ 4.6% वृद्धि—हर कोई अपने तर्क दे रहाराजधानी कोलकाता में मात्र 4.6% वृद्धि दर्ज हुई है। इसका कारण क्या है, इस पर राजनीतिक दलों की अलग-अलग राय है।

TMC का तर्क – यह वृद्धि हिंदू शरणार्थियों की वजह सेतृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता अरुप चक्रवर्ती का दावा है कि मतदाता संख्या में बढ़ोतरी बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों की वजह से हुई है। उन्होंने कहा:“1951 में पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू आबादी 23% थी, जो 2022 में घटकर 8% रह गई। ये लोग कहीं और नहीं गए, सबसे ज़्यादा बंगाल आए।”भाजपा पर उन्होंने आरोप लगाया कि “मुस्लिम घुसपैठ” की कहानी चुनावी लाभ के लिए फैलाई जा रही है।

BJP का पलटवार – ‘यह मुस्लिम घुसपैठ का सबसे बड़ा सबूत’भाजपा नेता राहुल सिन्हा ने इसे चेतावनी देने वाला संकट बताया।उनका आरोप है कि:सीमावर्ती जिलों में असामान्य वृद्धि “योजनाबद्ध मुस्लिम घुसपैठ” का नतीजा है।

घुसपैठिए कोलकाता में नहीं बसते क्योंकि खर्च ज्यादा है, इसलिए दूसरे जिलों में सस्ते में बस जाते हैं।सिन्हा के अनुसार, कई जिले अब मुस्लिम-बहुल होने की कगार पर हैं। CPI(M) ने भी मानी सीमा-पार आबादी का असर सीपीएम के राज्य अध्यक्ष मोहम्मद सलीम ने कहा कि मतदाताओं की संख्या बढ़ने में सीमा-पार से आने वालों का योगदान तो है,लेकिन वह भाजपा के दावों की तरह इसे “धार्मिक रंग” देने के खिलाफ हैं।उन्होंने बताया:बड़ी संख्या में हिंदू शरणार्थी भी आए हैं।कोलकाता में कम वृद्धि का कारण यह है कि वाम सरकार के समय जिला व छोटे शहर सशक्त हुए, इसलिए लोग सीधे कोलकाता नहीं आए।

SIR प्रक्रिया पर सबकी निगाहें राज्य के 23 जिलों में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया यह साफ करेगी कि:मतदाता सूची में वास्तव में कितने नए नाम जुड़े,और कितने पुराने हटाए गए।आने वाले महीनों में यह मुद्दा तेज होगा क्योंकि 2026 के विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं।

राजनीतिक घमासान: ममता बनर्जी और मुस्लिम नेताओं पर विपक्ष का हमला सीमा जिलों में मतदाता वृद्धि ने बंगाल की सियासत को और भड़का दिया है।विपक्ष का आरोप है कि:कई “सेक्युलर नेता” और “मुस्लिम संगठन” 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद मुद्दे को हवा देकर माहौल गर्म करना चाहते हैं।मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी लगातार ऐसे बयान दे रही हैं, जिनसे देश में तनाव बढ़ने का खतरा है।

एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने तो यहां तक कहा कि:ममता बनर्जी एक संवैधानिक पद पर रहते हुए जिस तरह देश में आग लगाने वाले बयान दे रही हैं, वह देश की संप्रभुता को चुनौती है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना चाहिए और ऐसे नेताओं पर कार्रवाई होनी चाहिए।”इसमें आरोप लगाया गया कि ममता बनर्जी और उनके समर्थक बाबरी मस्जिद का हवाला देकर 1947 जैसा वैमनस्य पैदा करने की कोशिश में हैं।

निष्कर्ष

पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में मतदाताओं की तेज वृद्धि महज आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि राजनीतिक विस्फोट का केंद्र बन चुकी है।TMC, BJP और CPI(M) तीनों इसे अपने-अपने तरीके से देख रहे हैं—लेकिन यह तय है कि:

2026 के चुनाव से पहले बंगाल की राजनीति में यह “वोटर विस्फोट” सबसे बड़ा मुद्दा बनेगा।

SIR रिपोर्ट आने के बाद राजनीतिक हलचल और तेज होगी।

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