बी के झा
NSK


पटना/ न ई दिल्ली, 4 फरवरी
बिहार की राजनीति में जब भी बजट आता है, तो सवाल सिर्फ आंकड़ों का नहीं होता—नीयत, क्रियान्वयन और भरोसे का होता है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में नीतीश सरकार ने गांवों की अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखकर जो खाका पेश किया है, उसने एक बार फिर बहस छेड़ दी है कि क्या बिहार अब कल्याण से आगे बढ़कर उत्पादन और बाजार की ओर जा रहा है?
सरकार का दावा है—ग्रामीण हाट, महिला उद्यम, डेयरी और मत्स्य पालन के जरिए गांवों में रोजगार और आय दोगुनी होगी।विपक्ष सवाल उठा रहा है—क्या यह ज़मीन पर उतरेगा या फाइलों में सिमट जाएगा?
‘ग्रामीण हाट’: गांव से बाजार तक की सीधी राह?
बिहार सरकार के सात निश्चय-3 की प्राथमिकताओं में शामिल ग्रामीण हाट योजना को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताया जा रहा है। योजना का मकसद है—स्थानीय उत्पादों को स्थायी और संगठित बाजारगांव में ही रोजगार और उद्यमिताबिचौलियों पर निर्भरता कम करनाविधानसभा में वित्त मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने बताया कि प्रखंड स्तर पर कृषि विभाग की जमीन चिह्नित कर आधुनिक ग्रामीण हाट विकसित की जाएंगी। इसके लिए बजट में संसाधनों का प्रबंध भी कर लिया गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह योजना मनरेगा आधारित मजदूरी मॉडल से अलग है और स्थायी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर इशारा करती है।“अगर यह मॉडल सही से लागू हुआ, तो गांव उपभोक्ता नहीं, उत्पादक केंद्र बन सकते हैं।”—
एक राजनीतिक विश्लेषक ग्रामीण विकास विभाग को बड़ा बजटीय बल सरकार के इरादे का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि—2025-26 में बजट: ₹16,093 करोड़2026-27 में बजट: ₹23,701 करोड़ यानी करीब ₹7,500 करोड़ की बढ़ोतरी, जिसके साथ ग्रामीण विकास विभाग शिक्षा के बाद दूसरा सबसे बड़ा विभाग बन गया है।
शिक्षाविदों का मानना है कि यह बदलाव इस बात का संकेत है कि सरकार अब ग्रामीण रोजगार को चुनावी वादे से निकालकर नीति का केंद्र बनाना चाहती है।
महिला रोजगार योजना: अनुदान या आत्मनिर्भरता?
सीएम महिला रोजगार योजना को बजट का अहम स्तंभ बताया जा रहा है।जीविका से जुड़ी 1.56 करोड़ महिलाओं को पहले ही ₹10,000 का अनुदानसफल उद्यम चलाने वाली महिलाओं को आगे ₹2 लाख तक की सहायता यह राशि अनुदान है, वापस नहीं ली जाएगी वित्त मंत्री के अनुसार, 2026-27 में यह योजना और विस्तारित होगी।
एक सामाजिक अर्थशास्त्री के अनुसार—“अगर यह पैसा सही प्रशिक्षण, बाजार और निगरानी से जुड़ा, तो यह माइक्रो-एंटरप्रेन्योरशिप का बड़ा उदाहरण बन सकता है।”हालांकि विपक्ष सवाल उठा रहा है कि बिना बाजार और तकनीकी सहायता के अनुदान टिकाऊ नहीं होता।
GI टैग उत्पाद: बिहार की पहचान को बाजार ग्रामीण हाट का फोकस खास तौर पर GI टैग उत्पादों पर होगा—कतरनी चावल जर्दालु आमशाही लीची मगही पान मिथिला मखाना हाजीपुर का चीनिया केला इसके लिए बिहार कृषि एक्सीलेरेशन मिशन के गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
शिक्षाविदों का कहना है कि—“GI टैग तभी फायदेमंद है, जब उसके साथ ब्रांडिंग, पैकेजिंग और सप्लाई चेन हो।”हर गांव में दुग्ध उत्पादन समिति, हर पंचायत में सुधा केंद्रडेयरी क्षेत्र को लेकर सरकार ने आक्रामक लक्ष्य रखा है—हर गांव में दुग्ध उत्पादन समितिहर पंचायत में सुधा बिक्री केंद्र मधेपुरा में 50 KLPD क्षमता का शीतक केंद्र चतुर्थ कृषि रोडमैप के तहत डेयरी और मत्स्य पालन को ग्रामीण रोजगार का मुख्य इंजन बताया गया है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक—मत्स्य उत्पादन में बिहार देश में चौथे स्थान पर प्रति व्यक्ति उपलब्धता: 12.21 किलोग्राम वार्षिक मत्स्य बीज उत्पादन: 2044 मिलियन पशुपालन में तकनीक: डिजिटल एक्स-रे से लेकर अल्ट्रासाउंड तक बजट में पशुपालन के लिए भी तकनीकी उछाल का वादा है—पशु अस्पतालों में 24×7 सेवा डिजिटल एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड
बिहार पशु प्रजनन विनियमन अधिनियम 2025 लागू
इसके अलावा—बकरी विकास योजनासूकर विकास योजना सीमेन स्टेशन, प्रशिक्षण संस्थान और फेडरेशन का गठन
विपक्ष का हमला: “घोषणाएं बहुत, ज़मीन कम
”विपक्षी दलों ने बजट पर तीखा सवाल खड़ा किया है।राजद का आरोप: ग्रामीण हाट पहले भी थीं, बस नया नाम दिया गया कांग्रेस का कहना: बजट में निगरानी और भ्रष्टाचार नियंत्रण पर चुप्पी वाम दलों ने इसे कॉर्पोरेट सप्लाई चेन के लिए रास्ता बताया
समाजसेवी और ज़मीनी चिंता
एक वरिष्ठ समाजसेवी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा—“घोषणा स्वागतयोग्य है, लेकिन जब तक ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक गांव तक असली फायदा नहीं पहुंचेगा।
”सरकार की प्रतिक्रिया: “यह शुरुआत है, परिणाम दिखेंगे”
सरकार का कहना है कि—योजनाएं चरणबद्ध लागू होंगी पंचायत और स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी होगी पारदर्शिता के लिए डिजिटल निगरानी तंत्र विकसित किया जा रहा हैएक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार—“यह सिर्फ बजट नहीं, बिहार के ग्रामीण भविष्य की नींव है।
”निष्कर्ष
ग्रामीण हाट, महिला उद्यम, डेयरी और मत्स्य पालन—नीतीश सरकार का यह मॉडल कल्याण से उत्पादन की ओर बदलाव का संकेत देता है।लेकिन बिहार की राजनीति और प्रशासन का इतिहास यह भी सिखाता है कि—
घोषणा और धरातल के बीच की दूरी सबसे बड़ी परीक्षा होती है।अब सवाल यही है—क्या यह बजट गांवों में सचमुच रोजगार पैदा करेगा,या फिर यह भी एक और नीति पुस्तिका बनकर रह जाएगा?इसका जवाब आने वाले वर्षों में बिहार के गांव खुद देंगे।
