बिहार चुनाव की जीत के लिए 1200 किलोमीटर दूर श्मशान में तंत्र साधना! उज्जैन से बिहार तक तंत्र का तार — अमावस्या की रात श्मशान में गूंजे ‘विजय मंत्र’

बी के झा

पटना / नई दिल्ली , 24 अक्टूबर

बिहार में विधानसभा चुनाव का रण चरम पर है। एक ओर उम्मीदवार सड़कों पर पसीना बहा रहे हैं, घर-घर जाकर वोट मांग रहे हैं, तो दूसरी ओर लगभग 1200 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के उज्जैन के श्मशान घाटों में जीत की जुगत साधी जा रही है — तंत्र-मंत्र और भैरव साधना के जरिए!

सूत्रों के मुताबिक, उज्जैन के प्रसिद्ध चक्रतीर्थ श्मशान घाट में इन दिनों बिहार के कई प्रत्याशियों की जीत के लिए “विजय अनुष्ठान” चल रहे हैं। यह वही जगह है जहाँ कहा जाता है कि “श्मशान जाग्रत” है — यानी यहाँ किए गए तंत्र साधना और अनुष्ठान फलदायी माने जाते हैं।‘

विजय प्राप्ति’ के लिए भैरव और बगलामुखी साधना उज्जैन के प्रसिद्ध तांत्रिक भय्यू महाराज का कहना है कि बिहार चुनाव के प्रत्याशी टिकट फाइनल होते ही उनसे संपर्क करने लगे हैं।

उनके अनुसार —राजनीति में अब सिर्फ भाषण नहीं, भक्ति और साधना का भी दौर चल रहा है। कई उम्मीदवारों ने ‘भैरव साधना’ और ‘बगलामुखी मिर्ची अनुष्ठान’ करवाए हैं ताकि चुनाव में विजय प्राप्त हो सके।”

भय्यू महाराज ने यह भी बताया कि उज्जैन से करीब 100 किलोमीटर दूर नलखेड़ा स्थित बगलामुखी पीठ में भी इन दिनों साधना चरम पर है। यहाँ धनतेरस से लेकर अमावस्या तक लगातार विशेष तांत्रिक क्रियाएं की जा रही हैं।कितना खर्च होता है ‘विजय अनुष्ठान’ परएक साधारण ‘भैरव साधना’ या ‘विजय अनुष्ठान’ में 25 से 30 हजार रुपये का खर्च आता है। इसमें राई, लाल खड़ी मिर्च, सरसों, शराब, घी, कपूर, लोंग, इलायची, जटामांसी, नींबू, नारियल, फूल-माला जैसी सामग्री का प्रयोग किया जाता है।

अनुष्ठान की समाप्ति ‘पूर्णाहुति’ के साथ होती है — जहाँ कपूर और गूगल से विशेष हवन किया जाता है।

असम से उज्जैन तक तंत्र की परंपरा भय्यू महाराज बताते हैं कि भारत में सबसे अधिक तंत्र साधना असम के कामाख्या पीठ में होती है।

वहाँ के भूतनाथ श्मशान में हर साल बड़ी संख्या में तांत्रिक जुटते हैं।उनके अनुसार, “उज्जैन का चक्रतीर्थ श्मशान भी उसी तरह का पवित्र स्थल है। यहां की साधना में अपार शक्ति है। कहा जाता है कि पांडवों ने भी बगलामुखी पीठ में हवन किया था, जिसके बाद उन्होंने महाभारत युद्ध में विजय पाई थी।

”कौन करा रहा है ये साधना

भय्यू महाराज का दावा है कि इन दिनों बिहार से सबसे अधिक संपर्क राजद (RJD) के प्रत्याशियों का है। हालांकि, एनडीए के कुछ उम्मीदवार भी विजय अनुष्ठान के लिए संपर्क में हैं।पहला अनुष्ठान दिवाली की रात हुआ था, अब अमावस्या की रात को दूसरा अनुष्ठान होना है। श्मशान में यह साधना करीब सात घंटे तक चलती है।

राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रियाएक

राजनीतिक विशेषज्ञ ने व्यंग्य करते हुए कहा —जहाँ नेताओं को जनता के बीच अपने काम का रिपोर्ट कार्ड लेकर जाना चाहिए, वहाँ आज वे श्मशान में तांत्रिकों के पास पहुंच रहे हैं। राजनीति अब ‘लोक सेवा’ नहीं, ‘तंत्र सेवा’ बनती जा रही है।”

उन्होंने कहा कि “तंत्र राजनीति का नया चेहरा नहीं है”, बल्कि इंदिरा गांधी, लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे कई बड़े नेताओं के दौर में भी तांत्रिक अनुष्ठान चुनाव जीतने का ‘गुप्त हथियार’ रहे हैं।

श्मशान में सन्नाटा, पर गूंजते हैं विजय मंत्र रात के सन्नाटे में जब चारों ओर केवल धुएं की लकीरें और दीपक की लौ होती है, तब तांत्रिक अपने जजमान के नाम का जाप करते हैं। कहा जाता है कि तंत्र साधना के इन क्षणों में “राजनीतिक भविष्य की रूपरेखा” तय होती है — बिहार के लिए, सत्ता के लिए, और ‘विजय’ के लिए।

निष्कर्ष:

जहाँ एक ओर लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व — चुनाव — जनता की भागीदारी से तय होना चाहिए, वहीं दूसरी ओर सत्ता की कुर्सी पाने के लिए श्मशान के तंत्र-मंत्र भी सक्रिय हैं। यह आधुनिक राजनीति का वह अदृश्य पक्ष है, जहाँ ‘जनता का विश्वास’ और ‘तंत्र की शक्ति’ दोनों आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।

NSK

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