बी के झा
NSK

पटना/ दरभंगा, 6 नवंबर
बिहार ने इस बार लोकतंत्र के महापर्व में वह कारनामा कर दिखाया, जिसकी कल्पना तक मुश्किल थी। गुरुवार को पहले चरण की वोटिंग ने प्रदेश के चुनावी इतिहास के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। शाम 5 बजे तक ही 60% से अधिक मतदान दर्ज हो चुका था और कई बूथों पर कतारें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं।
अंतिम रिपोर्ट आने तक अनुमान है कि कुल मतदान 65% के पार जा सकता है — और यह बिहार के विधानसभा चुनावों में अब तक का सबसे ऊँचा आंकड़ा होगा।लेकिन सवाल यह है कि यह रिकॉर्डतोड़ वोटिंग किसके पक्ष में जाएगी —
दो दशक की सत्ता संभाले नीतीश कुमार की वापसी? या तेजस्वी यादव की नई राजनीतिक आकांक्षाओं को पंख?या यह वोटिंग कहीं नतीजों में ऐसा उलटफेर कर दे जिसकी कल्पना किसी ने न की हो?
इतिहास क्या कहता है —
जब जब बढ़ी वोटिंग, तब तब पलटे समीकरण बिहार में वोटिंग प्रतिशत का उतार-चढ़ाव हमेशा राजनीति के स्वरूप को बदलता रहा है।कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव
2000 — सबसे अधिक 62.6% वोटिंगइस चुनाव में भारी वोटिंग हुई, आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन बहुमत से दूर रही।राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लगा और राजनीतिक अस्थिरता बनी रही।आखिरकार राबड़ी देवी ने सत्ता संभाली और 2005 तक शासन चला।
2005 — सबसे कम 46.5% वोटिंग कम वोटिंग होते ही परिदृश्य एकदम बदल गया।जेडीयू–बीजेपी गठबंधन ने भारी जीत दर्ज की और ‘सुशासन बाबू’ नीतीश कुमार युग की शुरुआत हुई।
2010 — वोटिंग में 5% का उछाल सुरक्षा, सड़कें, प्रशासनिक सक्रियता और महिला मतदाता—चारों ने मिलकर इतिहास रचा।पहली बार ग्रामीण वोटर बड़े पैमाने पर बूथ तक पहुँचे। नीतीश की छवि मजबूत हुई और सरकार की पुनर्वापसी आसान।
1950–1990 के दशक वोटिंग 40% से 50% के बीच ही झूलती रही।राजनीति तब जातिगत ध्रुवीकरण पर आधारित थी, संगठन और जागरूकता कम थी।क्या अधिक वोटिंग हमेशा सत्ता बदलती है?
जवाब: नहीं!डेटा कहता है:जिन 11 चुनावों में वोटिंग बढ़ी, उनमें से 5 बार सत्ता में बैठी सरकार ही वापस आई।जिन 3 चुनावों में वोटिंग गिरी, उनमें से 2 बार सत्ता बदल गई।
यानी उच्च मतदान = गुस्सा यह फॉर्मूला हमेशा सच नहीं होता।2025: आखिर रिकॉर्डतोड़ 65% वोटिंग का मतलब क्या है?यह चुनाव पिछले 15 वर्षों की स्थिरता को तोड़ता दिख रहा है।इस बार:युवा घंटों लाइन में खड़े रहे महिला वोटर बड़ी संख्या में घरों से बाहर आईं पोलराइजेशन ने ग्रामीण इलाकों में बंपर वोटिंग कराई
बीजेपी–जेडीयू का “महिला + मोदी” कॉम्बिनेशन फिर दिखातेजस्वी यादव ने बेरोजगारी और बदलाव की लहर को हवा दी
राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि यह भारी मतदान सिर्फ परिवर्तनों की भूख नहीं, बल्कि उम्मीदों की लड़ाई है।क्या 65% वोटिंग तेजस्वी की लहर है या मोदी–नीतीश की वापसी?एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक का मूल्यांकन भी ध्यान देने लायक है—महिलाओं का वोट भारी संख्या में नीतीश कुमार की ‘जीविका दीदी’ को 10,000 रुपये वाली योजना एनडीए के लिए तुरुप का इक्का साबित होती दिख रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं में इसका असर साफ देखने को मिला।
मोदी की विश्वसनीयता
हिन्दू समाज के एक बड़े हिस्से में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बरकरार है।‘
डबल इंजन’, ‘विकास’ और ‘स्थिरता’ का नैरेटिव अभी भी मजबूत है।
युवा और शहरों में तेजस्वी की हवा
युवाओं में बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है और इस वर्ग में तेजस्वी यादव का प्रभाव स्पष्ट है।आरजेडी अपने कोर वोटर पर भी मजबूत पकड़ बनाए हुए है।
रिकॉर्डतोड़ वोटिंग से किसकी नैय्या डूब सकती है?बढ़ी हुई वोटिंग उन दलों के लिए खतरा होती है:जिनका कोर वोट खिसक रहा हो जहां एंटी-इनकंबेंसी ज्यादा हो जहां कांग्रेस जैसे दल केवल गठबंधन के सहारे चुनाव लड़ रहे हों कांग्रेस पहले ही दावा कर चुकी है कि महागठबंधन की सरकार बनने जा रही है और तेजस्वी मुख्यमंत्री होंगे।
लेकिन मैदान में आंकड़े यह बता रहे हैं कि मुकाबला तगड़ा और टक्कर वाला है।
अंतिम सवाल —
किसके सिर जाएगा ताज?बढ़ा हुआ मतदान दो संकेत दे रहा है:
1. मतदाताओं में उत्साह अभूतपूर्व है
2. चुनाव एकतरफा नहीं — बेहद करीबी टक्कर हैमहिलाओं के साथ नीतीश–मोदी फैक्टर,और युवाओं के साथ तेजस्वी की हवा…दोनों मिलकर एक रोमांचक मुकाबला तैयार कर रहे हैं।
अब 14 नवंबर को ही तय होगा—बिहार फिर अनुभव को चुनता है,या इस बार युवा नेतृत्व की नैय्या पार लगती है ।
