बिहार से दिल्ली तक श्रमिक आक्रोश: नए श्रम कानूनों के विरोध में देशव्यापी हड़ताल, सियासत, कानून और अर्थव्यवस्था के त्रिकोण में फंसी सरकार

बी के झा

NSK

पटना/नई दिल्ली , 12 फरवरी

देश एक बार फिर बड़े श्रमिक आंदोलन का साक्षी बना है। केंद्र सरकार द्वारा 29 श्रम कानूनों की जगह लाए जा रहे चार नए श्रम कोड के विरोध में मंगलवार को बिहार सहित देशभर में बैंककर्मी, बीमा कर्मचारी, बिजली कर्मी, परिवहन, खनन और अन्य क्षेत्रों के श्रमिक हड़ताल पर चले गए। ट्रेड यूनियनों का दावा है कि करीब 38 करोड़ श्रमिकों ने इस राष्ट्रव्यापी हड़ताल में भाग लिया, जिससे यह स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े औद्योगिक आंदोलनों में से एक बन गया है।

बिहार में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कामकाज पूरी तरह ठप रहा। बैंक ऑफ इंडिया एम्प्लॉइज़ यूनियन के महासचिव प्रफुल्ल कुमार ने कहा कि यह हड़ताल केवल वेतन या सेवा शर्तों का प्रश्न नहीं है, बल्कि “श्रमिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई” है।

क्या है विवाद की जड़?

केंद्र सरकार चार श्रम संहिताओं —मजदूरी संहिताऔद्योगिक संबंध संहितासामाजिक सुरक्षा संहिताव्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता— के जरिए पुराने 29 श्रम कानूनों को समेटना चाहती है। सरकार का तर्क है कि इससे “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” बढ़ेगा और रोजगार सृजन होगा।लेकिन ट्रेड यूनियनों, श्रम विशेषज्ञों और विपक्षी दलों का आरोप है कि इससे हड़ताल का अधिकार कमजोर होगा, स्थायी रोजगार घटेगा और ठेका प्रथा को वैधता मिलेगी।

10 सूत्री मांगें: निजीकरण से लेकर पेंशन तक

हड़ताल पर गए बैंककर्मियों और अन्य श्रमिक संगठनों की प्रमुख मांगों में शामिल हैं—सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, एलआईसी और जीआईसी को मजबूत किया जाएबैंक और बीमा क्षेत्र में निजीकरण पर रोकबीमा क्षेत्र में 100% एफडीआई का फैसला वापस हो आउटसोर्सिंग और कॉन्ट्रैक्ट जॉब पर रोक पुरानी पेंशन योजना (OPS) बहाल की जाएं नियमित पदों पर सीधी भर्ती चारों श्रम संहिताएं रद्द की जाएं ऑल इंडिया बैंक एम्प्लॉइज़ एसोसिएशन (AIBEA), AIBOA और BEFI ने 12 फरवरी की हड़ताल में भागीदारी की अपील की थी।

राजनीतिक विश्लेषण: श्रम बनाम पूंजी

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह आंदोलन केवल ट्रेड यूनियनों का नहीं रह गया है, बल्कि सरकार की आर्थिक दिशा पर जनमत संग्रह का रूप लेता जा रहा है।वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रो. आर.एन. चौधरी कहते हैं—“सरकार जिस आर्थिक मॉडल को आगे बढ़ा रही है, उसमें श्रमिक सुरक्षा को लागत माना जा रहा है। यही वजह है कि विरोध केवल वेतन का नहीं, बल्कि विकास के दर्शन का है।”

कानूनविदों की चेतावनी

श्रम कानून विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अजय कुमार मिश्रा का कहना है कि नए श्रम कोड संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 की भावना के विपरीत हैं।“हड़ताल का अधिकार अप्रत्यक्ष रूप से निष्प्रभावी किया जा रहा है। स्थायी नौकरी की अवधारणा को कमजोर कर देना सामाजिक अस्थिरता को जन्म देगा।”

विपक्ष का हमला: ‘कॉरपोरेट इंडिया के लिए कानून’

कांग्रेस, वाम दलों और क्षेत्रीय पार्टियों ने सरकार पर तीखा हमला बोला है।कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा—“यह सरकार श्रमिकों के लिए नहीं, बल्कि कॉरपोरेट घरानों के लिए कानून बना रही है।”सीपीआई (एम) ने इसे “नवउदारवादी अर्थव्यवस्था का सबसे आक्रामक चेहरा” करार दिया।

बिजली और बीमा क्षेत्र में उबाल

ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (AIPEF) के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे ने बताया कि करीब 27 लाख बिजली कर्मचारी निजीकरण, विद्युत संशोधन विधेयक 2025 और राष्ट्रीय विद्युत नीति 2026 के विरोध में हड़ताल पर हैं।उनका कहना है कि बिजली क्षेत्र का निजीकरण गरीब उपभोक्ताओं और छोटे उद्योगों के खिलाफ है।बीमा क्षेत्र के कर्मचारी भी 100% एफडीआई के फैसले के विरोध में सड़कों पर उतरे।

संयुक्त किसान मोर्चा की एंट्री

इस आंदोलन को नया राजनीतिक आयाम तब मिला जब संयुक्त किसान मोर्चा ने ट्रेड यूनियनों को समर्थन दिया। किसानों और कृषि श्रमिक संगठनों ने एमजीएनआरईजीए की बहाली ग्रामीण रोजगार कानून 2025 की वापसी बीजेपी विधेयक और विद्युत संशोधन विधेयक रद्द करनेकी मांग उठाई।

सरकार की चुप्पी, रणनीति या मजबूरी?

सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आई है। श्रम मंत्रालय का रुख यह है कि “संहिताएं अभी पूरी तरह लागू नहीं हुई हैं”।लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार और श्रमिक संगठनों के बीच संवाद का अभाव आंदोलन को और तेज कर सकता है।

निष्कर्ष

12 फरवरी की हड़ताल केवल एक दिन का विरोध नहीं, बल्कि आने वाले समय में श्रम, कृषि और सार्वजनिक क्षेत्र को लेकर बड़े टकराव का संकेत है।यह सवाल अब केंद्रीय है—

क्या भारत का विकास मॉडल श्रमिकों को साथ लेकर चलेगा या उन्हें हाशिये पर छोड़ देगा?

यह आंदोलन उसी सवाल का सशक्त उत्तर मांग रहा है।

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