बी के झा
बेगूसराय (बिहार), 10 जनवरी
बिहार के बेगूसराय ज़िले का रामदीरी गांव इन दिनों केवल एक गांव नहीं, बल्कि भारत की सनातन परंपरा, सामाजिक एकजुटता और सामूहिक सेवा भावना का जीवंत प्रतीक बन गया है। स्वर्गीय राम कृपाल सिंह की स्मृति में आयोजित यह श्राद्ध महाभोज अब अपने अभूतपूर्व पैमाने के कारण देशभर में चर्चा का विषय बन चुका है।करीब 10 लाख से अधिक लोगों के भोजन की व्यवस्था, 1000 क्विंटल दही, 600 मन से अधिक घी, हजारों स्वयंसेवक, और देश के लगभग हर राज्य से आए लोग—यह आयोजन किसी सामान्य धार्मिक कर्मकांड से कहीं आगे निकलकर एक राष्ट्रीय सामाजिक महायज्ञ का रूप ले चुका है।श्राद्ध से महासम्मेलन तक का सफ़रराम कृपाल सिंह कंस्ट्रक्शन से जुड़े प्रसिद्ध उद्यमी रंजन सिंह द्वारा अपने पिता की स्मृति में आयोजित यह श्राद्ध, समाज की सहभागिता से इतना विराट बन गया कि अब इसे ‘अखिल भारतीय गौतम महासम्मेलन’ के नाम से जाना जा रहा है।पिछले दस दिनों से लगभग एक लाख से अधिक लोग केवल भोजन करने के लिए नहीं, बल्कि सेवा करने के लिए यहां जुटे हैं। कोई दाल पका रहा है, कोई सब्ज़ी काट रहा है, कोई रोटी बेल रहा है तो कोई रसगुल्ले बना रहा है। यह दृश्य किसी मेले से नहीं, बल्कि किसी वैदिक यज्ञशाला से कम नहीं लगता।
आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने पर प्रभाव
आयोजन समिति के अनुसार, बेगूसराय और आसपास के जिलों में बड़े डेयरी ब्रांड्स का दही तक समाप्त हो गया है। यह आयोजन स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी अस्थायी लेकिन बड़ा प्रभाव छोड़ गया है।
धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया
काशी से आए वरिष्ठ संत स्वामी चैतन्यानंद सरस्वती कहते हैं:“यह केवल भोज नहीं है, यह पितृऋण और समाजऋण को एक साथ चुकाने का उदाहरण है। सनातन धर्म में अन्नदान को सर्वोच्च दान कहा गया है, और यहां वह सजीव रूप में दिखाई दे रहा है।”अयोध्या के महंत रामदासाचार्य के अनुसार:“आज जब समाज जाति और राजनीति में बंटा दिखता है, ऐसे आयोजन बताते हैं कि सनातन संस्कृति अभी जीवित है और उसकी जड़ें बहुत गहरी हैं।
”हिंदू संगठनों की दृष्टि
विश्व हिंदू परिषद के एक पदाधिकारी ने इसे“हिंदू समाज की सामूहिक शक्ति और अनुशासन का प्रमाण”बताते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन वैश्विक स्तर पर भारत की सांस्कृतिक छवि को मजबूत करते हैं।
शिक्षाविदों का विश्लेषण
दिल्ली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार गौतम कहते हैं:“यह आयोजन आधुनिक भारत में पारंपरिक सामाजिक पूंजी (Social Capital) का दुर्लभ उदाहरण है। बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के इतने बड़े स्तर पर स्वैच्छिक सहयोग, अध्ययन का विषय है।”
राजनीतिक विश्लेषकों की टिप्पणी
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक आर.के. सिंह के अनुसार:“यह आयोजन दर्शाता है कि सामाजिक नेतृत्व अब केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। ऐसे आयोजन भविष्य में सामाजिक-राजनीतिक विमर्श की दिशा तय कर सकते हैं, खासकर बिहार जैसे राज्यों में।”उनका मानना है कि यह महाभोज Soft Power का स्थानीय संस्करण है—जहां परंपरा, आस्था और संगठन शक्ति एक साथ दिखाई देती है।जनभावनाओं का सैलाब
67 वर्षीय भासु सिंह भावुक होकर कहते हैं:“मैंने जीवन में इतने अनुशासन और प्रेम से भरा भोज कभी नहीं देखा। यह सिर्फ पेट नहीं, आत्मा को भी तृप्त करता है।”एक व्यक्ति की स्मृति, पूरे समाज की पहचान स्वर्गीय राम कृपाल सिंह, जो निर्माण क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित नाम थे, आज अपने कर्मों और समाज से जुड़े रिश्तों के कारण इतिहास रच रहे हैं। यह आयोजन उनकी स्मृति को केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक स्थायी सामाजिक मिसाल में बदल देता है।
निष्कर्ष
बेगूसराय का यह महाभोज अब न तो सिर्फ श्राद्ध है, न ही केवल धार्मिक अनुष्ठान। यह भारतीय समाज की सामूहिक चेतना, सनातन परंपरा की जीवंतता, और सामाजिक एकता की शक्ति का विराट उदाहरण बन चुका है। यदि इसे विश्व रिकॉर्ड का दर्जा मिलता है, तो वह केवल संख्या का नहीं, बल्कि संस्कार और संगठन का रिकॉर्ड होगा।
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