बेरोजगार युवाओं को सहारा या सियासी रणनीति? ‘ युवा साथी’ योजना के बहाने बंगाल की राजनीति में नई बहस

बी के झा

NSK

कोलकाता/ न ई दिल्ली, 8 मार्च

Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली Government of West Bengal ने बेरोजगार युवाओं को आर्थिक सहारा देने के उद्देश्य से ‘युवा साथी योजना’ की घोषणा की है। इस योजना के तहत राज्य के 21 से 40 वर्ष तक के बेरोजगार युवाओं को हर महीने 1500 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। सरकार की योजना है कि यह कार्यक्रम 1 अप्रैल से लागू किया जाए और इसके लिए विशेष रजिस्ट्रेशन केंद्रों के माध्यम से आवेदन स्वीकार किए जाएं।सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य उन युवाओं को अस्थायी आर्थिक सहारा देना है जो रोजगार की तलाश में हैं या स्वरोजगार की दिशा में प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, योजना की घोषणा के साथ ही यह मुद्दा राजनीतिक बहस और आर्थिक व्यावहारिकता के केंद्र में भी आ गया है।

योजना की मुख्य शर्तें

सरकार ने इस योजना का लाभ पाने के लिए कुछ स्पष्ट मानदंड तय किए हैं:

लाभार्थी पश्चिम बंगाल का स्थायी निवासी होना चाहिए।

उम्र 21 से 40 वर्ष के बीच होनी चाहिए।

कम से कम 10वीं पास होना अनिवार्य है।

वर्तमान में किसी शैक्षणिक संस्थान में पढ़ाई नहीं कर रहा हो।

शैक्षिक छात्रवृत्ति को छोड़कर किसी अन्य सरकारी कल्याण योजना का लाभ नहीं ले रहा हो।

अधिकतम 5 वर्षों तक यह सहायता मिलेगी, जिसमें कुल राशि 90,000 रुपये से अधिक नहीं होगी।

सरकार का तर्क है कि यह राशि भले ही बहुत बड़ी न हो, लेकिन नौकरी खोजने या छोटे काम शुरू करने के शुरुआती चरण में युवाओं को बुनियादी खर्चों में मदद मिल सकती है।आवेदन के लिए जरूरी दस्तावेजइस योजना के लिए युवाओं को कुछ आवश्यक दस्तावेज जमा करने होंगे

:बैंक पासबुक

पहचान पत्र (आधार या अन्य)

कक्षा 10 का प्रमाणपत्र/मार्कशीट

पासपोर्ट साइज फोटो

आधार से जुड़ा बैंक खाता

इन दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही लाभार्थियों के बैंक खाते में राशि भेजी जाएगी।

आवेदन प्रक्रिया

योजना के लिए आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और आंशिक रूप से ऑफलाइन केंद्रों के माध्यम से होगी।

चरण 1: आधिकारिक पोर्टल banglaryuvasathi.gov.in या wb.gov.in पर जाएं।

चरण 2: मोबाइल नंबर से रजिस्ट्रेशन कर OTP से सत्यापन करें।

चरण 3: व्यक्तिगत जानकारी, शैक्षिक विवरण और आधार से जुड़े बैंक खाते की जानकारी भरें।

चरण 4: फोटो, मार्कशीट और आधार कार्ड अपलोड करें।

चरण 5: फॉर्म की समीक्षा कर जमा करें और आवेदन आईडी प्राप्त करें, जिससे आवेदन की स्थिति ट्रैक की जा सके।

राजनीतिक अर्थ: कल्याण या चुनावी गणित?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह योजना केवल सामाजिक कल्याण कार्यक्रम नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण कदम है।बंगाल में युवाओं के बीच बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा है। ऐसे में सरकार का यह कदम युवा मतदाताओं को साधने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।कोलकाता विश्वविद्यालय के एक शिक्षाविद के अनुसार,“आज की युवा पीढ़ी आर्थिक असुरक्षा और रोजगार के संकट से जूझ रही है। सरकार का यह कदम राहत तो देगा, लेकिन असली समाधान स्थायी रोजगार सृजन ही है।

”विपक्ष का हमला

राज्य की विपक्षी पार्टियों—जिनमें Bharatiya Janata Party और Communist Party of India (Marxist) प्रमुख हैं—ने इस योजना पर सवाल उठाए हैं।विपक्ष का कहना है कि 1500 रुपये मासिक भत्ता बेरोजगारी का समाधान नहीं है, बल्कि यह युवाओं को “भत्ता आधारित राजनीति” की ओर धकेलने की कोशिश है।कुछ विपक्षी नेताओं का तर्क है कि अगर सरकार वास्तव में युवाओं की मदद करना चाहती है तो उसे औद्योगिक निवेश, स्टार्टअप और रोजगार सृजन पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

सरकार का जवाब

सरकार का कहना है कि विपक्ष इस योजना को गलत तरीके से पेश कर रहा है।सरकारी सूत्रों के मुताबिक, यह योजना रोजगार का विकल्प नहीं बल्कि अस्थायी सहारा है, जिससे युवा नौकरी की तलाश या कौशल विकास के दौरान आर्थिक दबाव से बच सकें।सरकार का दावा है कि राज्य में पहले से चल रही कौशल विकास और स्टार्टअप योजनाओं के साथ यह योजना मिलकर युवाओं के लिए बेहतर अवसर पैदा करेगी।

युवा पीढ़ी का नजरिया

बंगाल के कई युवाओं के बीच इस योजना को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।कुछ युवाओं का मानना है कि बढ़ती महंगाई के दौर में यह राशि भले ही छोटी हो, लेकिन बेरोजगार युवाओं के लिए शुरुआती राहत साबित हो सकती है। वहीं कुछ युवाओं का कहना है कि उन्हें भत्ते से ज्यादा नौकरी के अवसर चाहिए।

निष्कर्ष‘

युवा साथी योजना’ ने एक बार फिर कल्याणकारी राजनीति बनाम रोजगार आधारित विकास की बहस को तेज कर दिया है।सरकार इसे सामाजिक सुरक्षा का कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे चुनावी रणनीति कह रहा है।

आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह योजना वास्तव में युवाओं के जीवन में कितनी राहत लाती है और बंगाल की राजनीति में इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

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