ब्रिगेड ग्राउंड में आध्यात्मिक शक्ति का महा–संगम ‘पाँच लाख कंठों से गीता पाठ’ ने बदला बंगाल का सियासी तापमान

बी के झा

कोलकाता / नई दिल्ली, 7 दिसंबर

ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड रविवार को आध्यात्मिकता, संस्कृति और राजनीति—तीनों के संगम का विशाल मंच बन गया। सनातन संस्कृति संसद द्वारा आयोजित ‘पंच लाख कंठे गीता पाठ’ कार्यक्रम में लाखों लोगों के जुटने के दावे के साथ बंगाल ने एक बार फिर देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। आयोजकों का कहना है कि यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि “बंगाल की आध्यात्मिक आत्मा का पुनर्जागरण” है।कार्यक्रम की भव्यता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि पूरे मैदान में तीन विशाल मंच, हजारों स्वयंसेवक, सुरक्षा के व्यापक इंतज़ाम और मेडिकल–रेस्क्यू यूनिट्स तैनात किए गए।

यह आयोजन ऐसे समय हो रहा है जब पश्चिम बंगाल में धर्म और राजनीति का समीकरण लगातार गर्म हो रहा है।राज्यपाल की संभावित मौजूदगी से बढ़ी उत्सुकता

सूत्रों के अनुसार, राज्यपाल सीवी आनंद बोस को कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया है और वे शामिल भी हो सकते हैं। हालांकि, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की उपस्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।इसके विपरीत, बीजेपी के कई शीर्ष नेताओं—सुवेंदु अधिकारी, दिलीप घोष, समित भट्टाचार्य और केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार—के इसमें शामिल होने की पूरी संभावना है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सामूहिक गीता पाठ का मंच अब बंगाल में हिंदुत्व बनाम धर्मनिरपेक्षता की नई राजनीतिक रेखा खींच रहा है।मुर्शिदाबाद की ‘बाबरी शैली’ मस्जिद का शिलान्यास—और बढ़ा विवाद केवल एक दिन पहले मुर्शिदाबाद में निलंबित टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर द्वारा “बाबरी मस्जिद शैली” की मस्जिद का शिलान्यास ने माहौल को और अधिक राजनीतिक बना दिया है।

वहीँ दूसरी ओर, मथुरा के विश्व हिंदू परिषद के महानगर अध्यक्ष कन्हैया लाल अग्रवाल ने तीखे शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा—अब देश में दूसरी बाबरी मस्जिद बनने नहीं देंगे। अगर किसी ने ऐसा प्रयास किया, तो कार्यकर्ता धावा बोल देंगे।”उनके बयान ने सियासी बहस को और अधिक तीखा बना दिया है।आयोजकों का संदेश: “बंगाल की आध्यात्मिक परंपरा का पुनर्जीवन”सनातन संस्कृति संसद से जुड़े स्वामी प्रदीप्तानंद महाराज (कार्तिक महाराज) ने कहा—

आज का कार्यक्रम केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज में शांति, सौहार्द और आंतरिक ऊर्जा जगाने का प्रयास है।”वे कहते हैं कि अशांत राजनीतिक माहौल में आध्यात्मिक साधना ही समाज को स्थिरता और सकारात्मक दिशा दे सकती है।क्या यह धार्मिक आयोजन है या चुनावी

रणनीति?विशेषज्ञों की राय

राजनीतिक विश्लेषक प्रो. शंखनाद मुखर्जी कहते हैं—ब्रिगेड ग्राउंड बंगाल की राजनीति के लिए वही है जो दिल्ली में रामलीला मैदान या यूपी में अयोध्या है।यहाँ ‘पाँच लाख कंठ’ का गीता पाठ चुनाव से पहले एक बड़ा धार्मिक–राजनीतिक संकेत है।”संवैधानिक अध्ययन

विशेषज्ञ डॉ. मीरा बनर्जी की टिप्पणी—सार्वजनिक धार्मिक आयोजन संविधानिक रूप से वैध हैं, पर जब राजनीतिक दल इस आयोजन को चुनावी मंच में बदल देते हैं, तब संवैधानिक तटस्थता की बहस उठती है।सामाजिक इतिहासकार डॉ. तपन रे कहते हैं—बंगाल लंबे समय से सांस्कृतिक उदारवाद का केंद्र रहा है।लेकिन पिछले दशक में धार्मिक पहचान की राजनीति यहाँ पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई है।यह कार्यक्रम उसी बदलाव का एक और संकेत है।”

ब्रिगेड ग्राउंड का इतिहास—और क्यों महत्वपूर्ण है यह स्थान?ब्रिगेड परेड ग्राउंड बंगाल की राजनीति का प्रतीक स्थल रहा है।

यहाँ—1950 के दशक से लेकर नक्सल आंदोलनज्योति बसु और ममता बनर्जी जैसी बड़ी रैलियाँ2023 में ‘एक लाख कंठ से गीता पाठ’वाममोर्चा और टीएमसी की शक्ति–प्रदर्शन सभाएँ—सब हो चुकी हैं।यही कारण है कि यहाँ आयोजित हर बड़ा कार्यक्रम राजनीतिक संकेत देता है।भीड़… संदेश… और उससे उपजा सियासी असरआयोजन में अनुमानित लाखों की भीड़ से बीजेपी के खेमे में उत्साह है, जबकि टीएमसी इसे“धर्म के नाम पर विभाजनकारी राजनीति”बताने की तैयारी में है।

राजनीतिक पंडितों का मत है कि यह कार्यक्रम—हिंदू वोट का बड़ा ध्रुवीकरण कर सकता है मुस्लिम बहुल इलाकों में टीएमसी का माइक्रो–मैनेजमेंट तेज करेगा वाम और कांग्रेस को और हाशिये पर धकेल सकता है

2026 के विधानसभा चुनाव की हवा बदल सकता है

निष्कर्ष:

ब्रिगेड में गूँजी गीता—संदेश आध्यात्मिक, असर राजनीतिक एक ओर जहाँ पाँच लाख कंठों से गूंजता गीता का पाठ बंगाल की आध्यात्मिक धरोहर को जगाने का दावा कर रहा है,वहीं दूसरी ओर यह आयोजन आगामी विधानसभा चुनावों की राजनीतिक जमीन पर नए समीकरण भी बुन रहा है।धर्म, संस्कृति, राजनीति और चुनाव—

सभी की आँखें अब इस ऐतिहासिक आयोजन के परिणामों पर टिक गई हैं।

NSK

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