भाजपा ने आर.के. सिंह को किया निलंबित, पूर्व केंद्रीय मंत्री ने तुरंत दे दिया इस्तीफा — कहा, “स्वाभिमान से बड़ा कुछ नहीं”

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/पटना, 16 नवंबर

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की भारी जीत के अगले ही दिन भारतीय जनता पार्टी ने बड़ा संगठनात्मक कदम उठाते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री और आरा से भाजपा के दिग्गज नेता आर.के. सिंह को “पार्टी-विरोधी गतिविधियों” के आरोप में छह वर्षों के लिए निलंबित कर दिया।लेकिन इस कार्रवाई के कुछ ही मिनटों बाद आर.के. सिंह ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर पार्टी नेतृत्व को करारा संदेश दिया-

“मेरे लिए स्वाभिमान सर्वोपरि है।”भाजपा से क्यों बढ़ी दूरी? सिंह कब से थे नेतृत्व के निशाने पर हाल के महीनों में आर.के. सिंह खुलकर भाजपा और एनडीए सरकार पर सवाल उठा रहे थे।

उन्होंने—बिहार सरकार पर एक पावर प्लांट की कमीशनिंग में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए,टिकट वितरण में आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों को जगह मिलने का विरोध किया,और चुनाव से ठीक पहले अपने बयान से बिहार की सियासत में हलचल मचा दी थी।चुनाव के दौरान भाजपा ने चुप्पी साधे रखी, लेकिन नतीजे आने के 24 घंटे के भीतर कार्रवाई कर दी।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, चुनाव से पहले निलंबन का जोखिम उठाने से भाजपा को नुकसान हो सकता था, इसलिए फैसला टाल दिया गया।“कौन-सी पार्टी-विरोधी गतिविधि?” —

नड्डा को लिखे पत्र में सिंह का सवाल निलंबन पत्र मीडिया के जरिये मिलने के बाद आर.के. सिंह ने भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा को एक तीखा पत्र भेजा।

उसमें उन्होंने लिखा—

पत्र में यह नहीं बताया गया है कि मुझ पर आरोप क्या हैं। मैं ऐसे आरोपों पर जवाब कैसे दूँ जिनका उल्लेख ही नहीं है?”

उन्होंने आगे लिखा—यदि कारण बताओ नोटिस मेरे उस बयान पर आधारित है, जिसमें मैंने अपराधी पृष्ठभूमि वाले लोगों को टिकट देने का विरोध किया, तो यह पार्टी-विरोधी नहीं बल्कि पार्टी और राष्ट्रहित में था।

राजनीति का अपराधीकरण रोकना हम सबकी जिम्मेदारी है।”इसके साथ ही सिंह ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से अपना इस्तीफा भी सौंप दिया।

स्थानीय बुद्धिजीवियों और वरिष्ठ पत्रकारों ने जताई चिंता, बोले—

“आर.के. सिंह जैसे स्वाभिमानी नेता को किनारे करना भारी पड़ेगा”

भाजपा के इस फैसले पर बिहार के कई वरिष्ठ पत्रकारों, राजनीतिक विश्लेषकों और स्थानीय बुद्धिजीवियों ने गंभीर प्रश्न उठाए हैं।

उनका कहना है—“यदि आर.के. सिंह ने भ्रष्टाचार और अपराधी छवि वाले उम्मीदवारों का विरोध किया, तो उन्होंने गलत क्या किया?

चुनाव के ठीक पहले भाजपा ने उन्हें निलंबित नहीं किया, क्योंकि तब इसका राजनीतिक नुकसान होता। जीत मिलते ही कार्रवाई करना नेतृत्व की असहजता दर्शाता है।”

एक वरिष्ठ पत्रकार ने तंज कसते हुए कहा—पार्टी की जीत की मदहोशी में नेतृत्व भूल रहा है कि 2029 का चुनाव दूर नहीं है। ऐसे स्वाभिमानी नेताओं को किनारे करने का असर भविष्य में दिखेगा।”उ

न्होंने यह भी कहा—निलंबन होते ही इस्तीफा देकर आर.के. सिंह ने यह साबित कर दिया कि वह पद से ज्यादा अपने स्वाभिमान के पक्षधर हैं।”

राजनीतिक संदेश साफ — बिहार भाजपा में उथल-पुथल के संकेतआर.के. सिंह का इस्तीफा केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि भाजपा के भीतर बढ़ते असंतोष और विचारधारा की दिशा को लेकर प्रश्न भी खड़ा करता है।

भ्रष्टाचार और अपराधी राजनीति पर उनकी बेबाक आवाज़ अब भाजपा संगठन के भीतर नहीं रहेगी, और यह खाली जगह बिहार की राजनीति में नए समीकरणों की भूमिका निभा सकती है।

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