भारत में ‘अंसार गजावत-उल-हिंद’ को पुनर्जीवित करने की साजिश: डॉक्टरों के नेटवर्क, इस्लामी कानून की मंशा और आतंकी मॉड्यूल का खुलासा

बी के झा

NSK

नई दिल्ली / श्रीनगर, 1 फरवरी

दिल्ली के लाल किले के पास हुए विस्फोट की साजिश ने देश की सुरक्षा एजेंसियों को एक बार फिर चौंका दिया है। जांच में सामने आया है कि इस साजिश का सूत्रधार एक डॉक्टर था, जो वैश्विक आतंकी संगठन अल-कायदा से जुड़े प्रतिबंधित संगठन अंसार गजावत-उल-हिंद (AGuH) को भारत में दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रहा था। सूत्रों के अनुसार, आरोपी न केवल आतंकी नेटवर्क को पुनर्जीवित करना चाहता था, बल्कि भारत में इस्लामी कानून (शरिया) लागू करने की मंशा भी रखता था।

AGuH की स्थापना कुख्यात आतंकी जाकिर मूसा ने की थी, जो वर्ष 2019 में दक्षिण कश्मीर के त्राल में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया था। इसके बाद संगठन लगभग निष्क्रिय हो गया था। वर्ष 2021 में इसके अंतिम ज्ञात कमांडर मुजम्मिल अहमद तांत्रे के मारे जाने के बाद इसे खत्म माना जा रहा था। अब पहली बार इस संगठन को दोबारा जिंदा करने का गंभीर प्रयास उजागर हुआ है।

पर्चे से विस्फोट तक: साजिश की परतें

लाल किले के पास कार में विस्फोट की घटना से पहले, जम्मू-कश्मीर पुलिस ने जैश-ए-मोहम्मद (JeM) और अंसार गजावत-उल-हिंद की गतिविधियों की जांच शुरू की थी। इसकी शुरुआत श्रीनगर में मिले एक पर्चे से हुई, जिसमें—स्थानीय लोगों से पुलिस से सहयोग न करनेऔर सुरक्षाबलों को दुकानों में प्रवेश न देनेकी अपील की गई थी।इसी पर्चे के आधार पर जांच शोपियां तक पहुंची, जहां एक मौलवी से पूछताछ हुई। इसके बाद 9-10 नवंबर 2025 को फरीदाबाद में छापेमारी के दौरान कथित आतंकी साजिश का पर्दाफाश हुआ। जांच एजेंसियों ने यहां से 2,900 किलोग्राम विस्फोटक पदार्थ और अत्याधुनिक हथियार बरामद करने का दावा किया है।

पाकिस्तान की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान की शह पर आतंकी संगठन अलग-अलग मॉड्यूल के जरिये—कश्मीर घाटी मेंऔर देश के अन्य हिस्सों मेंहमलों की योजना बना रहे थे।जांच में यह भी सामने आया है कि दिल्ली बम धमाकों में शामिल आतंकी एक ग्लोबल कॉफी चेन को भी निशाना बनाना चाहते थे, जिसके मालिक यहूदी बताए जाते हैं। इससे साजिश के वैश्विक वैचारिक चरित्र की ओर इशारा मिलता है।जम्मू-कश्मीर के आरोपी डॉक्टर मुजम्मिल अहमद गनई, आदिल अहमद राथर और उत्तर प्रदेश के शाहीन सईद ने पूछताछ में बताया कि टारगेट चुनने को लेकर उनके बीच आपसी मतभेद भी थे।

राजनीतिक विश्लेषक: ‘लो-प्रोफाइल, हाई-रिस्क’ नेटवर्क

राजनीतिक और सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला “लो-प्रोफाइल लेकिन हाई-रिस्क” आतंकी नेटवर्क की ओर इशारा करता है, जहां—शिक्षित पेशेवरों और छोटे-छोटे मॉड्यूल के जरिए कट्टरपंथ को फैलाने की कोशिश की जाती है।विश्लेषकों के अनुसार, यह रणनीति सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

शिक्षाविदों की राय: धर्म नहीं, कट्टरपंथ समस्या

समाजशास्त्र और धार्मिक अध्ययन के शिक्षाविदों ने स्पष्ट किया है कि—इस्लाम या किसी भी धर्म को आतंकवाद से जोड़ना बौद्धिक और सामाजिक रूप से खतरनाक है।उनका कहना है कि यह मामला राजनीतिक-वैचारिक कट्टरपंथ का है, न कि किसी समुदाय का।

कानूनविद: सख्ती के साथ संवैधानिक संतुलन जरूरी

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि—यूएपीए और अन्य कठोर कानूनों का इस्तेमाल सबूतों की मजबूत श्रृंखला के साथ किया जाना चाहिए, ताकि दोषियों को सजा मिले और निर्दोषों के अधिकार सुरक्षित रहें।

मुस्लिम संगठनों की राय

मुस्लिम संगठनों ने इस साजिश की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि—आतंकवाद का इस्लाम से कोई संबंध नहींऔर ऐसे तत्व मुस्लिम समाज को बदनाम करते हैं।उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों से दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की।

हिंदू संगठनों और धर्म गुरुओं का रुख

हिंदू संगठनों और कुछ धर्म गुरुओं ने कहा कि—देश की आंतरिक सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए लेकिन साथ ही समाज में आपसी सौहार्द बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

विपक्षी दल: जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग

विपक्षी दलों ने सरकार से—जांच में पारदर्शिताऔर संसद में विस्तृत जानकारी देने की मांग की है। उनका कहना है कि सुरक्षा चूक हुई है या नहीं, इसका स्पष्ट जवाब देश को मिलना चाहिए।

निष्कर्ष

लाल किला विस्फोट साजिश और अंसार गजावत-उल-हिंद को पुनर्जीवित करने की कोशिश ने यह साफ कर दिया है कि भारत को अब नई पीढ़ी के कट्टरपंथी नेटवर्क से सतर्क रहना होगा।

यह लड़ाई सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि—वैचारिक कानूनीऔर सामाजिक स्तर पर भी लड़ी जानी है।

आतंक के खिलाफ सख्ती और समाज में सौहार्द—

दोनों साथ-साथ चलें, यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।

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