बी के झा
NSK


नई दिल्ली/ मास्को, 29 नवंबर
व्लादिमिर पुतिन की चार-पांच दिसंबर 2025 की भारत यात्रा से पहले, रूस की संसद के निचले सदन State Duma ने एक अहम सैन्य समझौते — Reciprocal Exchange of Logistics Agreement (RELOS) — को मंजूरी देने की प्रक्रिया अंतिम रूप देने की तैयारी शुरू कर दी है। यह समझौता 18 फरवरी 2025 को मॉस्को में साइन किया गया था। RELOS, दोनों देशों की सेनाओं को परस्पर लॉजिस्टिक सहायता, पोत/विमान तथा कर्मियों के परिवहन-आधार, आपदा राहत, संयुक्त अभ्यास आदि के लिए सुविधाजनक पहुंच देगा। इस कदम को सिर्फ एक रुटीन रक्षा समझौता नहीं, बल्कि दशकों पुराने भारत–रूस रणनीतिक साझेदारी के एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।
इस समझौते का महत्व — रणनीतिक और भौगोलिक आयामRELOS लागू होने के बाद, भारत का फ्लीट तथा विमान रूस के नौसैनिक/वायुसैनिक ठिकानों — विशेषकर आर्कटिक एवं उत्तरी फ्लीट — का उपयोग कर सकेंगे। उदाहरण के लिए, भारत की नौसेना की तलवार-क्लास फ्रिगेट्स और विमानवाहक पोत INS Vikramaditya, जो आर्कटिक जैसी कठोर जलवायु में ऑपरेशन करने में सक्षम मानी जाती हैं, अब रूस के उत्तरी आधारों पर लॉजिस्टिक सहायता ले सकती हैं। इसके उलट, रूसी नौसेना भी भारतीय बंदरगाहों और सुविधाओं का इस्तेमाल कर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी पैठ और परिचालन क्षमता बढ़ा सकती है —
जो चीन जैसे क्षेत्रीय दावेदारों के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिहाज से भारत के लिए रणनीतिक लाभ है। इसके अलावा, इस समझौते से केवल हथियार खरीद-बेच नहीं, बल्कि रख-रखाव, स्पेयर पार्ट्स, ईंधन, मरम्मत — यानी लॉजिस्टिक और परिचालन स्तर पर दीर्घकालिक सहयोग सुनिश्चित होगा।
आगे की संभावनाएं: सिर्फ RELOS नहीं — S-400, Su-57, और रक्षा उत्पादन की दिशाRELOS सिर्फ शुरुआत है। सूत्र बता रहे हैं कि पुतिन के दौरे के दौरान भारत और रूस के बीच कई अन्य बड़े समझौते — जैसे अतिरिक्त S-400 air defence system की खेप, नए लड़ाकू विमानों (संभावित Sukhoi Su-57 सहित) के सह-उत्पादन, स्पेयर पार्ट्स और रख-रखाव, आदि पर बात हो सकती है। असल में, रूस और भारत 2025 में 50 से अधिक सैन्य-तकनीकी सहयोग परियोजनाओं पर चर्चा कर रहे हैं; कई पर काम पहले से ही शुरू हो चुका है। भारत की ओर से हालांकि स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने का इरादा है — इस वर्ष लगभग 88% रक्षा खर्च घरेलू स्रोतों से हुआ है। फिर भी, रूस से लेकर नए हथियार और लॉजिस्टिक साझेदारी पूरी तरह बंद नहीं हो रही है।
राजनीतिक और रणनीतिक असर — भारत, पड़ोसी देश, चीन-पाकिस्तान, अमेरिका और पश्चिम परहिंद-प्रशांत में भारत की भूमिका मजबूत — RELOS से भारत को आर्कटिक से लेकर हिंद-प्रशांत तक अपनी समुद्री व वायुसैनिक पहुंच बढ़ाने का अवसर मिलेगा। इससे क्षेत्र में उसकी रणनीतिक भूमिका और दायरा विस्तृत होगा।चीन- पाकिस्तान के लिए खतरा — भारत-रूस सैन्य जुड़ाव, आक्रमक नहीं लेकिन प्रभावी है। रूसी नौसेना की भारतीय महासागरीय पहुंच को सहज बनाने से चीन की बढ़ती मिली-कूट गतिविधियों और पाकिस्तान के साथ उसके सुरक्षा नेटवर्क पर संतुलन बन सकता है।पश्चिमी देशों व अमेरिका के लिए रणनीतिक चुनौती —
भारत-रूस का यह नया समझौता, विशेष रूप से S-400 व Su-57 को शामिल करते हुए, अमेरिका एवं उसके पश्चिमी सैन्य गठबंधनों (जैसे NATO) के लिए एक चुनौती हो सकती है। यह संकेत देता है कि भारत अपनी विदेश नीति में “स्वतंत्रता” व “बहुपक्षीय संतुलन” की राह पर दृढ़ है। आंतरिक राजनीतिक व विपक्षी प्रतिक्रिया — देश में रक्षा मामलों पर हमेशा बहस होती रही है। कुछ विपक्षी दल इस समझौते को पूर्वाग्रह, एकतरफा रणनीतिक झुकाव व क्षेत्रीय तनाव की ओर कदम माने सकते हैं।
उन्हें सवाल करना होगा — क्या यह साझेदारी भारत को दीर्घकालिक सुरक्षा देता है या नई चुनौतियाँ लाती है?
भारत की रणनीति: “स्वतंत्र विदेश नीति” बनाम “बहुविवेक” — हालाँकि भारत पश्चिम और अमेरिका के साथ रक्षा-सहयोग भी बढ़ा रहा है, लेकिन RELOS व अन्य रूस से जुड़े समझौते इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत अपनी रक्षा व विदेश नीति में संतुलन बनाए रखना चाहता है।
संभावित विपक्षी एवं अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं — क्या हो सकते हैं सवाल?
1. कम स्पष्टता व पारदर्शिता — विपक्ष यह पूछ सकता है कि यह समझौता देश की रक्षा व कूटनीति का भविष्य किस आधार पर तय करेगा; सार्वजनिक बहस / संसद में चर्चा क्यों नहीं हुई; जनता को कैसे भरोसा दिलाया जाएगा कि इसके दुष्प्रभाव नहीं होंगे।
2. कार्यक्षमता और विश्वसनीयता पर शंकाएं — पिछली दौड़ में रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते रूस की रक्षा-उद्योग व आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है। इस आधार पर, क्या RELOS व नए हथियारों की आपूर्ति व रख-रखाव नियमित रूप से हो पाएगी?
3. पड़ोसी व क्षेत्रीय स्थिरता — पाकिस्तान, चीन व अन्य पड़ोसी देश इस कदम को भारत-रूस गठबंदन के रूप में देखेंगे, जो क्षेत्रीय तनाव बढ़ा सकता है। क्या भारत ने पर्याप्त कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा है?
4. पश्चिमी मुल्कों की प्रतिक्रिया — अमेरिका व उसके सहयोगी इस समझौते को “भारत का रूस से झुकाव” समझ सकते हैं। इससे भारत-पश्चिम संबंधों पर असर पड़ सकता है, विशेष रूप से रक्षा व तकनीकी साझेदारी में।
निष्कर्ष — दोस्ती की नई इबारत, या रणनीतिक संतुलन का नया अध्याय RELOS और उससे जुड़ा रक्षा ढांचा — S-400, Su-57, संयुक्त रक्षा उत्पादन — सिर्फ एक सैन्य समझौता नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत अब अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और बहुआयामी विदेश नीति को दृढ़ता से आगे बढ़ा रहा है। यह समझौता, यदि सही तरह से लागू हुआ, तो भारत की सैन्य ताकत, समुद्री व वायुसैनिक पहुंच, और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संतुलन —
तीनों को मजबूत कर सकता है।लेकिन, हर बड़े कदम की तरह — इसके साथ बड़े सवाल भी जुड़े हैं: स्थिरता, विश्वसनीयता, पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ। विपक्ष और सामरिक विश्लेषकों को इसे बिंदुवार देखना चाहिए — सिर्फ यह नहीं कि कितने हथियार मिल रहे हैं, बल्कि यह भी कि यह समझौता भारत को दीर्घकालिक सुरक्षा, स्वतंत्रता और सम्मान दिला पाएगा या नहीं।
