मतदाता सूची विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में गरमा-गरमी: EC को ‘निरंकुश’ कहने पर CJI ने टोका, SIR प्रक्रिया पर कानूनी और राजनीतिक सवाल तेज

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 3 दिसंबर

देश के निर्वाचन तंत्र की निष्पक्षता पर छिड़ी बहस मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के भीतर उस वक्त और तीखी हो गई, जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने चुनाव आयोग की कार्यशैली को “निरंकुश” करार दे दिया। कोर्टरूम में यह टिप्पणी इतना बड़ा प्रतिध्वनि लेकर लौटी कि मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को तुरंत हस्तक्षेप करते हुए कहना पड़ा—“

कृपया खुद को दलीलों तक सीमित रखें। ऐसे व्यापक और गंभीर बयान न दें।”यह कहना गलत नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट की यह बहस भारत की चुनावी अखंडता के केंद्र में जाकर सवाल खड़ा कर रही है—

क्या SIR प्रक्रिया एक ज़रूरी प्रशासनिक सुधार है, या मतदाता सूची को नए सिरे से लिखने का विवादित कदम?SIR पर उठी भारी आपत्तियाँ: “तेज़ शहरीकरण” का तर्क टिकाऊ नहीं सिंघवी याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने चुनाव आयोग द्वारा दिए गए तर्कों को कड़ी चुनौती देते हुए कहा कि:“तेज़ी से शहरीकरण

लोगों का लगातार प्रवास”जैसे कारण SIR की “राष्ट्रीय स्तर पर sweeping exercise” को उचित ठहराने लायक तार्किक आधार नहीं हैं।उन्होंने कहा—“शहरीकरण कोई नई परिघटना नहीं। यह दशकों से जारी प्रक्रिया है। यह कैसे तय किया गया कि अब ही पूरे राज्य या देश में सूचियाँ नए सिरे से बनाई जाएँ?

”सिंघवी का मुख्य तर्क:EC को किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में विशेष संशोधन का अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ सभी निर्वाचन क्षेत्र या पूरे देश में एक साथ ऐसा करना नहीं होता।उनके अनुसार यह कदम कानूनी सीमाओं का अतिक्रमण है।प्रशांत भूषण का हमला—

“SIR अभूतपूर्व, तानाशाही कदम”सुनवाई के अंतिम हिस्से में प्रशांत भूषण ने SIR को“अभूतपूर्व”,“जल्दबाज़ी भरा”,और “जमीनी कर्मचारियों पर दबाव से भरा”बताया।उन्होंने हवाला दिया कि—“

30 बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) की आत्महत्याओं” की खबरें चिंता का संकेत हैं।एक मीडिया जांच में पाया गया कि “SIR के बाद भी पाँच लाख से अधिक डुप्लीकेट वोटर सूची में मौजूद हैं”।और इसी संदर्भ में उन्होंने कहा—“कई लोग मानते हैं कि आयोग तानाशाह की तरह काम कर रहा है।”इसी टिप्पणी ने कोर्टरूम में असहज खामोशी पैदा कर दी, जिसके बाद CJI ने भूषण को रोकते हुए स्पष्ट कहा:“

इस तरह का बयान रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बन सकता। केवल कानूनी और तथ्यात्मक दलीलों तक ही रहें।

कानूनविदों की प्रतिक्रिया: क्या भूषण की टिप्पणी जायज़ थी?

1. प्रो. अरविंद के. मिश्र (संवैधानिक विशेषज्ञ)EC लोकतांत्रिक संस्थाओं का चौथा स्तंभ है। ‘तानाशाह’ कहना एक गंभीर आरोप है। पर SIR जैसी असामान्य प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाना पूरी तरह उचित है।”

2. वरिष्ठ अधिवक्ता वी. नटराजनCJI का हस्तक्षेप बिल्कुल सही था। कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड में भाषा का अनुशासन अनिवार्य है। लेकिन यह भी सच है कि EC को SIR के फैसले की वैधता पर विस्तार से स्पष्टीकरण देना होगा।”

3. पूर्व CEC टी.एस. कृष्णमूर्ति मतदाता सूची का सुधार ज़रूरी है, पर इसका दायरा इतना बड़ा हो तो संदेह स्वाभाविक है। EC को लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए अधिक खुलापन दिखाना चाहिए।”राजनीतिक विश्लेषकों की किरण—

क्या यह चुनावी भूगोल बदलने की कवायद?

1. प्रो. संदीप शुक्ला (राजनीतिक विश्लेषक)चुनाव नज़दीक हों और मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर फेरबदल शुरू हो जाए—तो राजनीतिक संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। यह विवाद आने वाले महीनों में चुनावी विमर्श को भी प्रभावित करेगा।”

2. प्रतीक त्रिवेदी (चुनावी रणनीति विशेषज्ञ)वोटर लिस्ट में गहन पुनरीक्षण हमेशा लाभ-हानि की राजनीति को जन्म देता है। विपक्ष EC पर उंगली उठाएगा, सत्ता पक्ष इसे ‘शुद्धिकरण’ कहेगा। विवाद बढ़ना तय है।”विपक्ष का पलटवार — “EC सरकार के दबाव में?

”कुछ विपक्षी दलों के नेताओं ने इसे“शासन-प्रेरित अभ्यास”,“चयनित निर्वाचन क्षेत्रों में बदलाव की तैयारी”,“शहरी क्षेत्रों में वोटर रि-एलाइनमेंट का खेल”बताया है।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा—SIR सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक भूगोल को प्रभावित करने वाला कदम है। इसमें पारदर्शिता की कमी है।”

EC की प्रतिक्रिया — “पूरी प्रक्रिया नियमों के मुताबिक”EC ने पहले भी यह कहा है कि—SIR नियम 25 और 26 के अंतर्गत राज्यवार जनसंख्या परिवर्तन और व्यापक प्रवास डेटा के आधार पर किया जा रहा है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद आयोग पर अपनी प्रक्रिया स्पष्ट करने का दबाव और बढ़ गया है।और अब गुरुवार को होगी अगली सुनवाई—

सबकी निगाहें भूषण की दलीलों पर

CJI सूर्यकांत की पीठ ने कहा है कि गुरुवार को प्रशांत भूषण अपनी कानूनी दलीलें आगे रखेंगे।यह सुनवाई आने वाले महीनों की चुनावी राजनीति और EC की विश्वसनीयता—दोनों पर निर्णायक प्रभाव डाल सकती है।

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