बी के झा
NSK

नई दिल्ली:, 30 नवंबर
‘वंदे मातरम’ को लेकर देश की सियासत एक बार फिर गर्मा गई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना महमूद मदनी द्वारा देश की स्थिति पर दिए गए विवादित बयान के बाद मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (RSS संबद्ध) ने रविवार को कड़ा पलटवार किया। मंच के राष्ट्रीय संयोजक एस. के. मुद्दीन ने साफ कहा—“वंदे मातरम गाना इस्लाम के खिलाफ नहीं है, मातृभूमि की स्तुति हर धर्म का मूल संस्कार है।”मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का पलटवार — “मदनी जैसे बयान मुसलमानों को पीछे धकेलते हैं”मुद्दीन ने मदनी के बयान को “भ्रम फैलाने वाला और अलगाववादी प्रवृत्ति” बताते हुए कहा कि भारत दुनिया का सबसे सुरक्षित देश है जहाँ मुसलमान संवैधानिक अधिकारों के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
उन्होंने कहा:“मुस्लिम बेटे-बेटियाँ सेना, अर्धसैनिक बलों, पुलिस व अन्य संवैधानिक संस्थाओं में गौरव से सेवा कर रहे हैं। वंदे मातरम इस्लाम विरोधी नहीं, बल्कि देश की मिट्टी को नमन है।
ऐसे बयान मुसलमानों को विकास की मुख्य धारा से दूर करते रहे हैं। बुद्धिजीवी मुसलमानों को ऐसे विचारों से सावधान रहना चाहिए।”विहिप और हिंदू संगठनों का विरोध— भोपाल में मदनी का पुतला दहन मदनी के बयान के खिलाफ भोपाल में विश्व हिंदू परिषद व अन्य संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया।रोशनपुरा चौराहे पर मदनी का पुतला जलाकर विहिप पदाधिकारियों ने कहा—“
सुप्रीम कोर्ट पर दबाव में काम करने का आरोप राष्ट्र-विरोधी मानसिकता का परिचायक है।
वंदे मातरम का विरोध भारतीयता का विरोध है। ऐसे बयान देश को बाँटने वाले हैं।”हिंदू धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया – “मातृभूमि का सम्मान सभी का कर्तव्य”कई संतों और धर्माचार्यों ने भी मदनी के आरोपों को अनावश्यक बताया।उन्हीं में से कुछ के विचार:“भारत माता की वंदना किसी धर्म विशेष की नहीं, बल्कि संस्कृति की आत्मा है।”
“देश की पवित्रता और अखंडता सर्वोपरि है। इस पर सवाल उठाना उचित नहीं।”बीजेपी और मोदी सरकार की प्रतिक्रिया – “विपरीत धारणा फैलाना देशहित के खिलाफ”बीजेपी ने मदनी के आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा कि मोदी सरकार सबका साथ–सबका विकास की नीति पर काम कर रही है।बीजेपी नेताओं की प्रतिक्रियाएँ:“मदनी का बयान तथ्यों से परे है। सुप्रीम कोर्ट दुनिया की सबसे स्वतंत्र संस्थाओं में से एक है।”
“मुसलमानों की सुरक्षा और विकास सरकार की प्राथमिकता है, लेकिन राजनीतिक कारणों से डर का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है।
”सरकारी सूत्रों ने भी स्पष्ट किया कि—“वंदे मातरम राष्ट्रीय गीत है, न कि किसी धर्म का प्रतीक। इसे गाने या न गाने का निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता है, लेकिन इसे इस्लाम विरोधी बताना अनुचित है।”राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र— “ध्रुवीकरण की राजनीति का नया अध्याय”राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले चुनावी मौसम में यह मुद्दा तेजी से राजनीतिक आकार ले सकता है।“मदनी का बयान धार्मिक नेतृत्व बनाम राष्ट्रवाद के विमर्श को फिर हवा दे रहा है।”“बीजेपी इसको राष्ट्रभक्ति बनाम तुष्टिकरण के रूप में पेश करेगी।”“विपक्ष के लिए भी यह असहज स्थिति है।विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया – “संवेदनशील मुद्दों पर संयम ज़रूरी”कई विपक्षी दलों ने मदनी के बयान को सीधा समर्थन नहीं दिया, बल्कि कहा—“सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठाने से लोकतांत्रिक संस्थाओं का मनोबल प्रभावित होता है।”
“धर्म आधारित बहसों में संतुलित भाषा जरूरी है।”कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि—
“मुसलमानों की समस्याएँ वास्तविक हैं, पर समाधान संवाद से आएगा, टकराव से नहीं।”मदनी ने क्या कहा था?शनिवार को मदनी ने आरोप लगाया कि—देश में एक समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है सुप्रीम कोर्ट सरकार के दबाव में काम कर रहा है हालात बेहद संवेदनशील हैं
इन्हीं बयानों ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तूफ़ान खड़ा कर दिया।
निष्कर्ष‘
वंदे मातरम’ पर उठा यह विवाद सिर्फ एक बयान का मुद्दा नहीं, बल्कि भारतीय समाज में पहचान, धर्म और राष्ट्रवाद के सतत चल रहे विमर्श का प्रतिबिम्ब है।जहाँ एक ओर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच इसे इस्लाम विरोधी न बताते हुए भारतीयता का प्रतीक मानता है, वहीं मदनी इसे समुदाय के खिलाफ माहौल का हिस्सा मानते हैं।सवाल यह है कि समाज किस दिशा में आगे बढ़ेगा—संवाद और सौहार्द की ओर, या आरोपों और ध्रुवीकरण की ओर?
